पुरुषवादी सोच ने गांधीजी को सर्वोच्च स्थान जरूर दिया पर बा के त्याग और आत्मबलिदान की गाथा का इतिहास गवाह हैं.गांघी जी को राष्ट्रपिता और बा को राष्ट्रमाता क्योकि अनगिनत महिलाओं में वो प्रतिबिम्बित स्वतत्रता का पर्याय बनी.हर पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ होता हैं,इस कहावत को चरितरार्थ करने बा,गांधीजी के कदम-से-कदम मिलाकर स्वतत्रता कार्यो मेन महान योगदान देने वाली बा युवा,सरल,कुशल नेतृत्व धारदार पर स्वतत्र विचार व दृष्टिकोण और तटस्थ नजरिए के कारण किसी को भी क्या,गांधीजी के दवाब को हावी नही होने देती थी,गांधी जी पुरुषोचित हेकड़ी,कठोर आदर्श भी ढीले पड़ जाते.मानना था कि जब तक गलती करने की स्वतन्त्रता न मिले,वो सच्चे अर्थों में स्वतन्त्रता नही.अपने अन्तर्मन की सुने न कि दूसरों से प्रभावित.सद्भाव से किए कार्य खुशी देते हैं.जीवन में प्यार बाटते हुये अपनी शक्ति को हजार गुना कर सकते हैं.बदलाव को देखना हैं तो सर्वप्रथम अपने आपमे कीजिये.अनवरत सीखने की प्रवृति हमेशा अपने साथ रखने की तरह हो.आत्मबलिदान की व्यक्तित्व की धनी व अहिंसक प्रयासों में अग्रणी बा का कहना थ कि डरा कर किसी पर विजय प्राप्त नही की जा सकती,क्षमावान बनना आपको ताकतवर बनाता हैं.सशक्तिकरण की मिशाल व स्वतन्त्रता सेनानी बा सामाजिक अन्याय व बुराई के विरूद्ध डटकर सामना थी.गुणों की खान व अच्छे-बुरे की समझ वाली बा शिक्षा को महिलाओं के लिए प्रगति का साधन मानती थी,भारतीय बागानो को स्वस्थ विज्ञान,अनुशासन,पढ़ना-लिखना सिखाया.विवाह का प्रारम्भिककाल पारंपरिक बंधनों में व्यतीत हुआ.आत्मसम्मानी बा को,गांधीजी की कड़वी बात,आओछे व्यवहार आघात जरूर करते थे पर निःस्वार्थता उनकी सलाहकार बन विकट परिस्थितियों में संबल बनकर हौसला बढ़ाया और कार्यों की परिणति में सहभागी बनी.सहनशील प्रवृति के कारण,गांधीजी की वैचारिक कसौटी पर खरी उतरने लगी,जिससे गांधीजी भी कायल हो गए,अपने दुर्व्यवहार पर शर्मिंदगी होती.अपनी तमाम कमजोरियों के साथ परछाई की तरह साथ खड़ी बा के विषय में गांधीजी ने साफ़गोई से कहा कि वो सहधर्मिणी,सहचारिणी,सुख-दुख की साथी.
स्वतन्त्रता कुमुद की प्रथम प्रतिभागी बा ने भारतीयों के विरूद्ध हो रहे अत्याचारों के खिलाफ और रंगभेद की नीति के खिलाफ आवाज उठाई.भेदभाव को घृणित व निंदनीय कार्य मानते हुए,सभी को ईश्वरीय संतान मानती थी,असहयोग,सविनय अवज्ञा आंदोलन की सहभागी बा,जीवटता और संस्कारों की परिचायक तब बनी जब दक्षिण अफ्रीका में सं 1813 में विवाह पंजीकरण कानून के विरोध में,महिलाओं को सत्याग्रह में शामिल होने आह्वान किया तथा जेल में अखाद्य भोजन का विरोध कर अपनी बात मनवा,अधिकारियों को झुकवा दिया.महिलाकओं को सत्य,अहिंसा का नारा देने वाली बा ने कोलोनियल के विरुद्ध अहिंसक आंदोलन व चंपारण आंदोलन में अपनी ताकत साबित करने का जोश भरा.आजीवन जिम्मेदारियों का निर्वाह व कर्तव्यों का पालन,धार्मिक पारंपरिक संस्कारों में रची-बसी बा,गांधीजी की अनुपस्थिति में सत्याग्रहियों की सेवा व सहायता कर,आंदोलन की अगुवा बन अमिट योगदान दिया.
आजादी की लड़ाई में बा का त्याग गांधीजी पर भारी था.आंदोलन में जोड़ने में स्वातत्य व अहम भूमिका,कर्मठता,कार्यक्षमता,आपदाओं से जूझती,देशसेविका,संचालिका,मातृत्व भावना वाली बा के काल गांधीजी ने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुये उनके विषय में कहा था कि वो मेरी आत्मप्रेरणा थी,अगर बा का साथ न होता तो मैं इतना ऊंचा न उठ पाता.......मेरी पत्नी मेरे अंदर को जिस तरह हिलाती थी,उस प्रकार दुनिया की कोई स्त्री नही हिला सकती.