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शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018


क्यों अनजान रखा,उन काले अक्षरों से........??????
तू..तो माँ...थी.....
तेरे लिए क्या..बेटा,क्या...बेटी .....
तेरी ममता तो बिना भेदभाव के थी.....
परिवार की गाडी चलाने वाली तू........
फिर कैसे,भेदभाव कर गी तू.......
मेरी आँखें पूछती,क्या दोष था मेरा...??
क्या सिर्फ इतना,मैं एक लड़की हूँ.......????
तू तो समझदार थी,पर,क्या..,तूने ये सोचा भी..
अपने परिवार को कैसे,मैं शिक्षित कर पाऊँगी.....
तूने घर गृहस्थी की हर शिक्षा में पारंगत किया,
पर शिक्षित होने से क्यों ..वंचित किया????
क्यों पाठशाला की ओर बढ़ते कदमों को रोका????
क्यों उन आड़े-टेड़े,काले अक्षरों से अनजान रखा ?????
अगर,किसी कोने में किताब रखी मिल जाती,
उलटती,पलटती,फिर,एकटक टकटकी लगाये निहारती,
हल्क होती,कैसे लिखते ??,पढ़े जाये कैसे????
या मरहूम रही शब्दों को ,जान पाऊँगी कैसे????
जिज्ञासा हैं मन में,इन स्ज्ब्दों को उकेरने की,
सपना बुना हैं,अक्षरों की दुनियां में खोने की,
कैसे माँ तू,उन गहरें शब्दों को,
‘एक लड़की की शिक्षा,पूरे परिवार की शिक्षा’,
क्या कोई गुरु बन,अक्षरों की पहचान करेगा????
या फिर जीवन भर, ‘काला अक्षर भैंस बरावर’रहेगा,
ठान ली,रोढ़े बने रास्तों में, ‘अपना रास्ता’ खुद बनाऊँगी,
बस,माँ, ‘बुने सपनों को आकार’ दे, ‘अक्षरों की उड़ान’ भरूँगी.

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