जिन्दगी एक जुआँ हैं
हमारी जिन्दगी
एक जुआँ की तरह हैं जिसमें ताश के पत्तों की तरह जीवन की खुशियाँ बिखर जाती हैं .जब तक जीवन में सुखों का अम्वारलगा रहता हैं ,तब तक हमें उन लम्हों का एहसास ही
नहीं होता हैं जो हमारी हंसती,मुस्कराती,रंग-विरंगी दुनियां में घुस पेठकर बैठे और जीवन की खुशनुमा
लम्हों की लड़ी विखर कर छितरा कर गम नहीं हो जाती.जैसे जुआँ में
इन्सान जब तक जीतता रहता हैं तब तक उसे जिन्दगी का एक अरसा गुजर जाने का पता भी नही
चलता.लेकिन जब हार का आभास होने पर भी वह आखिरी समय तक खेलना
नहीं छोड़ता ,जब तक उसका सब कुछ नही लुट जाता.ईएसआई तरह हम भी जीवन में आखिरी श्वास तक झूझते हुए डीएम तोड़ देते हैं.हम अपने जीवन के प्रति दुखों के आते ही हम अपने जीवन को दांव पर लगाते रहते
हैं.और सोचते हुए ,प्रवाह किए बगैर हम दुखों
के अन्धकार में धंसने लगते हैं.एक जुआरी की तरह जीवन का नजरियाँ
बना लेते हैं.