' संक्रमित दौर से गुजरती आज की नारी'
स्त्री, सुन्दरी, कांता, कलत्र, वनिता, नारी, महिला, अबला, ललना, औरत, कामिनी, रमणी स्त्री वर्ग को दर्शाता नारी शब्द संसार।महिला शब्द में 'म' अक्षर से ममत्व, मृदुलता, मानवता जैसे शब्दों से उसकी महिमा उजागर होती हैं।सत्य भी है, महिला ही संस्कृति का उत्थान और उत्कर्ष करती हैं।लेकिन भारत में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते इस भावनात्मक मूरत को नकार कर अपनी कठमुल्ला वादी सोच को ही प्रधानता दी जाती रही हैं।पुरूष अभी भी महिलाओं को 'सजावट का गुलदस्ता' मानता है।इस संबंध में सिमोन द बोडवर का कथन है कि' स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती हैं'।औरत और गहना एक दूसरे के पर्याय होने के कारण, गहना सौंदर्य का सामान कम, गुलामी की नकेल बन कर रह गया है।अशिक्षा और पर आत्मनिर्भरता के कारण नारी की स्थिति ' सजायाफ्ता कैदी ' की तरह थी।घर की धुरी होने के कारण भी उसके योगदान को कही भी रेखांकित नहीं किया जाता है।
अहंकारी पुरूष शासक और शासित के रूढिवादी रिश्तों में प्रगतिशील महिलाओं के लिए आज भी रोढा बना हुआ है, लेकिन अब नारीवाद के तूफानी झकझोर देने वाली हवाओं की फडफडाहट विकराल सूनामी बन रही हैं।आर्थिक स्वतंत्रता को सुख की पूंजी मानने वाली पावर लेस वुमन, अब पावर फुल बन गई हैं।साथ ही उत्थान कार्यक्रमो ने स्वतंत्रता और रचनात्मक संतुष्टि के मुददे को उठाकर स्त्री जीवन के अंधेरों पर रोशनी डालकर उसे सजग किया ।सृष्टि के अधूरे पन की पूरक हालांकि औरतों ने अपने विश्वास व कर्मठता से वर्जित क्षेत्रों में कदम रखकर वर्जनाओं की ढेर सारी दीवारों को ढहाया हैं और अपमान के खानों में अपने लिए सम्मान अर्जित कर, अंधेरे में विश्वास का दीया जलाया।नक्शे पर बनी योजनाओं को साकार कर अस्तित्व की लकीरें खींची है।उसने गुलामी को नियति न मानकर, अपने कर्मठ गूंज से 'नारीवाद का झंडा' गाढकर हौसले बुलंद किए हैं।संकोच को दर किनार कर नारी, स्वतंत्रता की संकटमोचक ढाल बनी और परम्परावादी आईना तोडकर प्रगति की राह में समझदारी की राह पहुँचाई हैं।उसने साबित कर दिया है कि 'वह बहू नहीं, बहुमत हैं......'।
नारी ने पुर्वाग्रही पीडित सोच रूपी पिंजरे की सलाखों को अपने मजबूत इरादों से तोडकर एक नया आयाम स्थापित कर खुद को गढा है।नारी आन्दोलन से समाज और नारी के बीच जो विकास की, अस्मिता की खाई है, उसे अपनी नई पहचान के साथ पाटने पर दृढ संकल्पित है।वह पुरूष की परछाई वाली छवि से निकल कर न केवल आगे ही बढी है, बल्कि अपने में चैतन्यता को उत्पन्न कर कर्ण धार बनी और विकास में साधक नहीं, विकसित की भूमिका निर्वाह कर पचास फीसदी वोट बनीं।विभिन्न क्षेत्रों में नए- नए मापदंड स्थापित कर अपनी सहानुभूति व सहनशीलता की ताकत पर सामाजिक क्रांति लाने में पुरुषों से पीछे नहीं।अपने बेहतरीन प्रदर्शन से पुरूषों को पीछें खदेङ दिया।बबूल के शूलों जैसे बन्धनों को अधिकार रूपी ऊर्जा स्रोत से परिमार्जन कर अपने अस्तित्व के निशान छोड रही हैं।नारी के पुरातन स्वरूप को तोडने के इस अथक प्रयास के तहत कुछ अलग करने की चाहत में, जुल्म के प्रतिकार में आवाज उठाने की हिम्मत के बीज बोकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।फिर चाहे उसने विद्रोह में अपनी कलम को ताकत बनाया हो या कूची से केनवास पर अपनी व्यथा को उजागर किया हो।वह अपने जीवन को दाव पर लगाकर अपने लक्ष्य को हासिल करने में निरन्तर संघर्षरत है।
लेकिन आज भी महिलाओं के लिए दिल्ली दूर है क्योंकि वह 'नक्कारखाने की तूती' बन कर रह गई हैं।शोषित दमित नारी समाज में नव चेतना का संचार होने पर भी वह शिकार ग्रस्त हैं।पुरूषों ने सत्ता के गलियारे में सत्ता की कुंजी पिछले दरवाजे से अपने हाथ में ले रखी है।अरस्तु ने कहा हैं कि 'महिलाओं की सफलता की कुंजी पुरुषों के हाथों में हैं|'नारीवाद को ढकोसला मानने वाले, शोषित सोच वाले पुरुषों की संसद में महिला संसद को 'परकटी महिलाओं की संसद' कहते हैं।प्राचीन निर्मित सामाजिक ढांचे में सुधारात्मक प्रयास होने के बावजूद नवयुग की निर्मात्री, घर परिवार की नींव नारी की वर्तमान में दशा कुऐ से निकलकर खाई में गिरने जैसी हो गई है।महिलाओं का विकास में स्थान विषय परक न होकर, वस्तु परक बन गया है।उपभोक्ता वादी संस्कृति की तरह ही स्त्री को वस्तुओं में गिना जाने लगा है।कानून की नजरों में समानाधिकार होने पर भी रक्षण शक्ति वान रूपी स्त्री स्वयं अपने संरक्षण के लिए कानून का दरवाजा खटखटा रही हैं,तो कहीं पुरूषों के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए दर- व -दर भटकती हैं।स्त्री दकियानूसी अंधे गलियारे की भटकन से बाहर निकली जरूर है पर वह तार्किक विहीन सोच में भटक गई हैं, जिससे उसके स्त्रीत्व पर साबंलिया प्रश्न चिन्ह लग गया है।सैकडों- हजारों निगाहें उस पर पहरेदारी करती हैं।उसके पास अपनी पहचान को, अस्तित्व को गढने वाली परिभाषा हैं और न ही अपने योगदान को सार्थक करने वाले शब्द है।संक्रमित दौर से गुजरती नए जमाने की स्त्री की स्थिति चक्की के दो पाटों के बीच शोषित व पीडित सी बनकर रह गई हैं।ग्लैमर की दुनिया में गुम सी हो गई स्त्री समाज में अपना नेतृत्व स्थापित करने में कोसों दूर छिटक गई हैं।आधुनिकता के चश्मे से इस चकाचौंध दुनिया में वह वास्तविक ता से मीलों दूर आभासी दुनिया में भटकती सी प्रतीत होती नजर आती हैं।जैसा कि चन्द्र कांत देवताले कहते हैं कि 'एक औरत का धड भीड में भटक रहा है, उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं, उसके पांव कब से सबसे अपना पता पूछ रहे हैं।'
अत:आज भी नारी शब्द पर 'नर' शब्द की अपेक्षा दो -दो बडी मात्राएं होने पर भी साहित्यिक भाषा में ही नर के ऊपर भारी है लेकिन वास्तविकता में नहीं।यह सत्य है कि पुरुष के समकक्ष दर्जा हासिल कर वह परिवार की मुखिया जरूर बन रही हैं लेकिन शक्ति का पुंज मानें जाने वाली औरतें आजादी के सार्थक मायने नहीं समझ पा रही हैं। 'वह स्वतंत्र जरूर हुई है, पर जागरूक नहीं।'
स्त्री, सुन्दरी, कांता, कलत्र, वनिता, नारी, महिला, अबला, ललना, औरत, कामिनी, रमणी स्त्री वर्ग को दर्शाता नारी शब्द संसार।महिला शब्द में 'म' अक्षर से ममत्व, मृदुलता, मानवता जैसे शब्दों से उसकी महिमा उजागर होती हैं।सत्य भी है, महिला ही संस्कृति का उत्थान और उत्कर्ष करती हैं।लेकिन भारत में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते इस भावनात्मक मूरत को नकार कर अपनी कठमुल्ला वादी सोच को ही प्रधानता दी जाती रही हैं।पुरूष अभी भी महिलाओं को 'सजावट का गुलदस्ता' मानता है।इस संबंध में सिमोन द बोडवर का कथन है कि' स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती हैं'।औरत और गहना एक दूसरे के पर्याय होने के कारण, गहना सौंदर्य का सामान कम, गुलामी की नकेल बन कर रह गया है।अशिक्षा और पर आत्मनिर्भरता के कारण नारी की स्थिति ' सजायाफ्ता कैदी ' की तरह थी।घर की धुरी होने के कारण भी उसके योगदान को कही भी रेखांकित नहीं किया जाता है।
अहंकारी पुरूष शासक और शासित के रूढिवादी रिश्तों में प्रगतिशील महिलाओं के लिए आज भी रोढा बना हुआ है, लेकिन अब नारीवाद के तूफानी झकझोर देने वाली हवाओं की फडफडाहट विकराल सूनामी बन रही हैं।आर्थिक स्वतंत्रता को सुख की पूंजी मानने वाली पावर लेस वुमन, अब पावर फुल बन गई हैं।साथ ही उत्थान कार्यक्रमो ने स्वतंत्रता और रचनात्मक संतुष्टि के मुददे को उठाकर स्त्री जीवन के अंधेरों पर रोशनी डालकर उसे सजग किया ।सृष्टि के अधूरे पन की पूरक हालांकि औरतों ने अपने विश्वास व कर्मठता से वर्जित क्षेत्रों में कदम रखकर वर्जनाओं की ढेर सारी दीवारों को ढहाया हैं और अपमान के खानों में अपने लिए सम्मान अर्जित कर, अंधेरे में विश्वास का दीया जलाया।नक्शे पर बनी योजनाओं को साकार कर अस्तित्व की लकीरें खींची है।उसने गुलामी को नियति न मानकर, अपने कर्मठ गूंज से 'नारीवाद का झंडा' गाढकर हौसले बुलंद किए हैं।संकोच को दर किनार कर नारी, स्वतंत्रता की संकटमोचक ढाल बनी और परम्परावादी आईना तोडकर प्रगति की राह में समझदारी की राह पहुँचाई हैं।उसने साबित कर दिया है कि 'वह बहू नहीं, बहुमत हैं......'।
नारी ने पुर्वाग्रही पीडित सोच रूपी पिंजरे की सलाखों को अपने मजबूत इरादों से तोडकर एक नया आयाम स्थापित कर खुद को गढा है।नारी आन्दोलन से समाज और नारी के बीच जो विकास की, अस्मिता की खाई है, उसे अपनी नई पहचान के साथ पाटने पर दृढ संकल्पित है।वह पुरूष की परछाई वाली छवि से निकल कर न केवल आगे ही बढी है, बल्कि अपने में चैतन्यता को उत्पन्न कर कर्ण धार बनी और विकास में साधक नहीं, विकसित की भूमिका निर्वाह कर पचास फीसदी वोट बनीं।विभिन्न क्षेत्रों में नए- नए मापदंड स्थापित कर अपनी सहानुभूति व सहनशीलता की ताकत पर सामाजिक क्रांति लाने में पुरुषों से पीछे नहीं।अपने बेहतरीन प्रदर्शन से पुरूषों को पीछें खदेङ दिया।बबूल के शूलों जैसे बन्धनों को अधिकार रूपी ऊर्जा स्रोत से परिमार्जन कर अपने अस्तित्व के निशान छोड रही हैं।नारी के पुरातन स्वरूप को तोडने के इस अथक प्रयास के तहत कुछ अलग करने की चाहत में, जुल्म के प्रतिकार में आवाज उठाने की हिम्मत के बीज बोकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।फिर चाहे उसने विद्रोह में अपनी कलम को ताकत बनाया हो या कूची से केनवास पर अपनी व्यथा को उजागर किया हो।वह अपने जीवन को दाव पर लगाकर अपने लक्ष्य को हासिल करने में निरन्तर संघर्षरत है।
लेकिन आज भी महिलाओं के लिए दिल्ली दूर है क्योंकि वह 'नक्कारखाने की तूती' बन कर रह गई हैं।शोषित दमित नारी समाज में नव चेतना का संचार होने पर भी वह शिकार ग्रस्त हैं।पुरूषों ने सत्ता के गलियारे में सत्ता की कुंजी पिछले दरवाजे से अपने हाथ में ले रखी है।अरस्तु ने कहा हैं कि 'महिलाओं की सफलता की कुंजी पुरुषों के हाथों में हैं|'नारीवाद को ढकोसला मानने वाले, शोषित सोच वाले पुरुषों की संसद में महिला संसद को 'परकटी महिलाओं की संसद' कहते हैं।प्राचीन निर्मित सामाजिक ढांचे में सुधारात्मक प्रयास होने के बावजूद नवयुग की निर्मात्री, घर परिवार की नींव नारी की वर्तमान में दशा कुऐ से निकलकर खाई में गिरने जैसी हो गई है।महिलाओं का विकास में स्थान विषय परक न होकर, वस्तु परक बन गया है।उपभोक्ता वादी संस्कृति की तरह ही स्त्री को वस्तुओं में गिना जाने लगा है।कानून की नजरों में समानाधिकार होने पर भी रक्षण शक्ति वान रूपी स्त्री स्वयं अपने संरक्षण के लिए कानून का दरवाजा खटखटा रही हैं,तो कहीं पुरूषों के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए दर- व -दर भटकती हैं।स्त्री दकियानूसी अंधे गलियारे की भटकन से बाहर निकली जरूर है पर वह तार्किक विहीन सोच में भटक गई हैं, जिससे उसके स्त्रीत्व पर साबंलिया प्रश्न चिन्ह लग गया है।सैकडों- हजारों निगाहें उस पर पहरेदारी करती हैं।उसके पास अपनी पहचान को, अस्तित्व को गढने वाली परिभाषा हैं और न ही अपने योगदान को सार्थक करने वाले शब्द है।संक्रमित दौर से गुजरती नए जमाने की स्त्री की स्थिति चक्की के दो पाटों के बीच शोषित व पीडित सी बनकर रह गई हैं।ग्लैमर की दुनिया में गुम सी हो गई स्त्री समाज में अपना नेतृत्व स्थापित करने में कोसों दूर छिटक गई हैं।आधुनिकता के चश्मे से इस चकाचौंध दुनिया में वह वास्तविक ता से मीलों दूर आभासी दुनिया में भटकती सी प्रतीत होती नजर आती हैं।जैसा कि चन्द्र कांत देवताले कहते हैं कि 'एक औरत का धड भीड में भटक रहा है, उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं, उसके पांव कब से सबसे अपना पता पूछ रहे हैं।'
अत:आज भी नारी शब्द पर 'नर' शब्द की अपेक्षा दो -दो बडी मात्राएं होने पर भी साहित्यिक भाषा में ही नर के ऊपर भारी है लेकिन वास्तविकता में नहीं।यह सत्य है कि पुरुष के समकक्ष दर्जा हासिल कर वह परिवार की मुखिया जरूर बन रही हैं लेकिन शक्ति का पुंज मानें जाने वाली औरतें आजादी के सार्थक मायने नहीं समझ पा रही हैं। 'वह स्वतंत्र जरूर हुई है, पर जागरूक नहीं।'