“पदचाप नव वर्ष के आगमन की”
प्रति वर्ष की तरह हम सभी नव वर्ष का स्वागत करने को आतुर रहते हैं.साल के तीन
सौ पैसंठ दिन या तीन सौ छियासठ कब इस आगम भरी जिन्दगी से कब बंद मुट्ठी में बंधी रेट
की तरह फिसलते चले गये,पता ही नहीं चला.होशोहवास तब आया,जब साल का आखिरी दिन की संध्या
बेला ह्म्मसे विदा हो रही और इस उम्मीद से हम सब उसे विदा भींगी पलकों से जिसमें पूरे
वर्ष का ब्यौरा मन मस्तिष्क में उभर कर आँखों में चलचित्र बनकर सामने आ गया कि हमने
क्या कुछ अपने लिए किया और क्या दूसरों के लिए.कितने पल हमने खुशियों के गुजारे तो
कितने दिन गम में गुजारें?कितनों की झोली को हमने खुशियों से भरा तो कितनों को निराश
किया........इसी उधेड़बुन में हम नई उम्मीद के साथ इन यादों के सफर को भी नव वर्ष आगमन
की गर्त में दबा देते हैं और नव भोर की प्रस्तुति होती रवि करणों की चमक में बीते वर्ष
के अवसरों को विस्मृत करने की भरपूर कोशिस करते हैं.
जिन्दगी हैं तो चलने का नाम लेकिन की पडाव पर हमारी जिन्दगी में अल्पविराम जैसे
मोड़ आ जाते हैं,जो ऐसे पल होते हैं जहां कुछ बातों को,घटनाओं को पूर्ण विराम देना होता
हैं और एक नये सिरे से उस निर्णय को स्वीकृत कर अपने जिंदगीनामा सफर को एनी दिशा में
मोड़ लेना होता हैं.जिन्दगी में आया ठहराव अल्प समय के लिए होता हैं जो हमे नये-नये
अंदेशों से घेर लेता हैं और नये विकल्पों के साथ जिन्दगी की शुरुआत करने के मौके देता
हैं.इन्हें न गवांकर अपना सफर जारी रखना चाहिए.बीते वर्षों के पन्नें ,नई साल के दिन-रात
को धूल-धूसरित कर देंगें.हर बीती दिन नये सबेरे को आमंत्रित कर अपने अनबूझे सवालों
का जबाव ढूढने को विवश करता हैं.हमारी बुद्धि समस्याओं से निपटने का रास्ता ढूढती हैं.आँखों
में आदमी विश्वास और मन की धैर्यता हमे विचलित नहीं होने देती.हम अपनी अक्षमता को चुनौती
देते हुए विपरीत परिस्थितियों में भी सदैव चलते रहेगे.जीवन ही निरंतर चलने का नाम हैं.गिरकर
फिर उठना,इस तरह सम्भल कर चलने से ही अनुभव प्राप्त होते हैं.हर नया भोर हमें चनौती
देता हुआ नजर आता हैं.असफलता,हताशा,निराशा,भी,दुःख ये सब हमारे जीवन के विभिन्न अंग हैं.इन्ही बाधाओं से सफलता की राह निकलती हैं.इन
दोंनों में अटूट बंधन हैं .एक ही सिक्के के दो पहलु हैं.ये एक दूसरे के पर्याय हैं
,इन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता.
जिन्दगी में बाधा डालने वाले शब्दों से दूरस्थता बनाये रखना चाहिए.अपनी असफलता
पर स्वयं से सवाल पूछकर अगली बार बेहतरीन प्रदर्शन करने का संकल्प ले, प्रयास करना
चाहिए.कार्य की असफलता के कारणों को ढूढ़,सटीकता से समाधान करना चाहिए.कार्यप्रणाली
को योजना बद्ध तरीके से लागू करने में अपने विचारों पर अडिग रहना चाहिए.सपनों को साकार
करने के लिए एक स्पष्ट रचना की जानी चाहिए.अवसर पहचान कर आत्म विशवास व साहस के साथ
अपनी योजना को कार्य रूप देने के लिए एक नई ऊर्जा का संचार कर देना चाहिए.हमे हमेशा
स्मरण रखना चाहिए की हम सब इस अंधियारी दुनिया का एक हिस्सा हैं.अपने आत्मविश्वास के
साथ इस अंधियारी गलियों से निकलकर हर विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के बिंदु ढूँढना
चाहिए.एक बात विशेष रूप से ध्यान में रखना चाहिए कि हताश होकर या झुंझलाकर आज का कामम
कल पर नहीं थोपना चाहिए.भाग्य के भरोसे छोड़े गये काम से कभी भी लक्ष्य की प्राप्ति
नहीं हो सकती.कर्म शील बनकर ,बंधी बंधाई जिन्दगी से निकलके अपने सोच को एक नया आयाम
दे कर अपने में एक नई ऊर्जा का संचार कर चाहिए.स्वाभिमानी बनों,आत्मविश्वासी बनों पर
अभिमानी नहीं बनना चाहिए.अतिआत्मविश्वासी भी कार्य की सफलता का घोतक होता हैं.सहयोगिता
का भाव होना चाहिए.सहयोगियों का आभार प्रगट करने से ही आगे बढने के मार्ग आगे बढ़ते
हैं.सुखद यादें जीवन में आगे बढने के लिए प्रेरित करती हैं जो हमारे मानवीय तनाव को
मिटाने में मानसिक पोषण देती हैं.एक नई संचरण प्रदान करती हैं.
\कठिनाईयां जीवन का अभिन्न अंग हैं अगर जीवन में कठिनाईयां नहीं होगी तो
सुखद यादें भी नहीं रहेगी.क्योकि जिन्दगी का हर दिन का पन्ना सुख-दुःख,संघर्ष,से छिपा
हुआ हैं.ये सब अनिश्चित हैं इनसे डर कर पीछे हटकर भावी दिनों को बेकार नहीं करना चाहिए.हम
अपनी सकारात्मक मानसिक सोच की सबलता से हर
दिन की कठिनाई का संघर्ष से सामना कर सकते हैं.जीवन स्थिरता का नाम नहीं हैं,वह अनवरत
बहती धारा हैं.कब किस पल जीवन आश्चर्य भरा मिल जाए जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते.तनाव
भरी दुखद यादों पर सुखद यादों का धूल या गर्त जमा देनी चाहिए.अनिश्चतता में गुजरे दौर
को अलविदा कह देना चाहिए क्योंकि समय रहते इन निराशा भरे क्षणों से विदाई नहीं ली तो
यह हमारे जीवन के अभिन्न अंग बन जाते हैं और हम विवश होकर इनका बोझ लादे हुए जीवन ढोते
रहते हैं.इस असहज भरी जिन्दगी का प्रतिपल घोर निराशा,डर,शंकाओं में व्यतीत होने लगता
हैं क्योंकि जीवन कोई निश्चित बद्ध तरीके से बंधा हुआ नहीं होता हैं.उसमे बदलते दौर
चलते रहते हैं.बंधी बंधाई रोजमर्रा की जन्दगी में हम उसके आगे सपने हथियार दाल देते
हैं.पल-प्रतिपल बदलती जिन्दगी को पूर्ण विराम नहीं देना चाहिए.इसलिए जीवन में आये जोखिमों
को उठाकर एक नये सिरे से जीवन जीने का फरमान जारी कर देना चाहिए.हमें आनन-फानन में
गलत निर्णय लेकर बोझिल नहीं बनाना चाहिए.साहस के साथ एक नई जीवन को एक नई ज्योति से
आगाज करना चाहिए.हताश जीवन को नियति न मानकर उससे जूझना चाहिए.जिन्दगी बढने का नाम
हैं.किसी भी विपदा से निपटने के लिए प्रयास को आखिरी प्रयास नहीं मानकर बैठना चाहिए.निरंतर
प्रयास करते रहने से नये-नये रास्ते व राहे बनते हैं.अगर कभी जिन्दगी में ठहराव आ भी
जाये तो वह महज एक अल्पावधि में आया हुआ ऐसा रोड़ा हैं वह अपने आपको आत्म निरीक्षण,आत्मावलोकन
करने वाला क्षण हैं जो भूलों को सुधारकर तनावग्रस्त उभरती रेखाओं और दुखों के बादलों
को छाटकर ,नव किरन बिखेरने के लिए मन में आत्म विश्वास से भरने वाला पल होता हैं.अतीत
में हुए गलतियों को विस्म्रस्त कर फिर नये सिरे से लक्ष्यों का द्वार खोलना चाहिए जिसमे
भविष्य के सपनों को,सफलताओं को पाने ,खुशियाँ बटोरने ,लक्ष्यों को पाने के लिए नवीन
विचारों को सहेजने वाले झरोखे होते हैं.
अंत: जीवन को अतीत की यादों से
ठहरा हुआ तालाब मत बनने दीजिये.यह ठहराव ,दुखद की दुर्गन्ध बिखेरकर जीवन को नष्ट करने
में क्षणिक भी वक्त नहीं लगाएंगी इसलिए जीवन को बहती नदी बनाईये.अतीत की गर्त में समाता
बीते वर्ष सुखद यादों की कडिया को जोडीये और आने वाले नव दिवसों को आनन्दमयी पलों के
मनको से सुखों की लडियो को पिरोईयें.