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शुक्रवार, 28 जून 2019

जीवन के अध्याय

छोटी-छोटी घटनाओं का पुलंदा एक किताब का रूप ले लेता हैं.हमें संकीर्णता के दायरे में रहकर जीवन नहीं गुज़ारना चाहिए जैसा कि विवेकानंद जी ने कहा हैं, ‘जीवन का पहला और अपष्ट लक्षण हैं-विस्तार.यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो तुम्हें फैलाना ही होगा.जिस समय तुम जीवन का विस्तार बंद कर दोगे,उसी क्षण जान लेना कि मृत्यु ने तुम्हें घेर लिया.               विपत्तियाँ तुम्हारे सामने हैं.जीवन ही सफलता-असफलता कि सीधी का बना हुआ हैं.अगर विफलता हमारे हाथ लगती हैं तो सफलता प्राप्त करने का वह सुअवसर प्रदान करती हैं.वह यह संदेश देती हैं कि अबकी बार पहले की अपेक्षा और समझदारी से चढ़ना होगा.असफलता के घेरे में रहकर व्यक्ति असमंजस्य कि स्थिति में आ जाता हैं,तब अज्ञात ने कहा, ‘जीवन में जब असमंजस्य कि स्थिति घेरने लगे तो तीन अक्षर याद कर लीजिये-कृ.पृ.उ.क्षण भंगुर जिंदगी में हमें गले शिकवे को गले नहीं लगाना चाहिए क्योकि एस करने से जीवन और भी दूभर हो जाता हैं.हमारा जीवन प्रकृति कि दी हुई नेमत हैं.बचपन हमारा दूसरों की ओट में पलता हैं जिसकी शिकायत निरर्थक हैं कि मुझे भगवान ने गरीब घर में जन्म दिया पर बड़े होकर आप इसी दरिन्द्रगी का जीवन जीकर परलोक सिधार जाते हो तो यह आपकी सबसे बड़ी गलती होती हैं.सबसे बड़ी विडम्बना हैं,व्यक्ति स्वतंत्र जीवन यापन करना चाहता हैं लेकिन व्यक्ति सामाजिक प्राणी हैं,सहयोगिता और सहभागिता पर ही पूरा जीवन टीका हुआ हैं,फिर भी हमें दूसरों पर पूर्णतया पर निर्भर रहकर अपनी स्वतन्त्रता पर किसी का अंकुश नहीं लगाना चाहिए.इसलिए स्वतंत्र केवल वही हो सकता हैं जो अपना काम अपने आप कर लेता हैं.जीवन को परिभाषित करते हुये थामस मूर कहते हैं कि पारिवारिक जीवन उतार-चढ़ाव से भरपूर होता हैं.सुख-दुख,शिकस्त,कामयाबी और हर तरह के चरित्र इसके सफर में जीवन से गुजरते हैं.यह स्थान घटनाओं और इतिहास का जंकसन होता हैं.इन सबके सहारे जीवन में व्यक्तित्व और स्मृतियों का निर्माण होता हैं.दैनिक समस्याओं से घिरे व्यक्ति को अब्दुल कलाम के अनुसार उन चीजों को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे अंदर में हैं.वैसे मनुष्य अपने आप को बड़ा जोधा समझता हैं पर उसे यह भी सदा ध्यान में रखना चाहिए कि एक शक्तिशाली से शक्तिशाली मानुषी भी एक दिन कमजोर होता हैं.मानुषी को अपने जीवन का महत्व समझना चाहिए अतीत कि यादों के झरोखों से बाहर निकालकर अपने भविष्य का निर्माण करना चाहिए.जीवन हैं तो सफलता-असफलता,सुख-दुख सभी से व्यक्ति घिरा रहता हैं, लेकिन यह भी सती हैं कि असफल व्यक्तियों में से निन्यानवे प्रतिशत वे लोग होते हैं जिनकी आदत बहाने बनाने कि होती हैं इसलिए ईमानदारी से कारी को अंजाम देकर परिणाम को भगवान भरोसे छोड़ देना चाहिए.सबसे अधिक समझदार ,ज्ञानी,विवेकी व्यक्ति तो वही होता हैं जो अपनी कमियों को सम्झक्र उनमें सुधार कर सकता हैं.इसलिए हमें कोरी झल्लेवाजी नहीं मारना चाहिए नहीं अपनी बलशीलता का परिचय देना चाहिए.अगर ताकत का प्रदर्शन करना हैं तो उसका सही जगह इस्तेमाल करना चाहिए.निष्क्रिय जीवन गुजारने से बेहतर हैं अपने अनिवार्य कार्य करना.सही सोच के साथ उठाया गया सही कदम आपको सफलता के करीब ले जाता हैं.सफलता कि कुंजी अपने चेतन मन को उन चीजों पर केन्द्रित करना होता हैं जिनहे हम चाहते हैं न कि उन पर जिंका भाय होता हैं.हमें सफलता पाने का सिरमौर दूसरों के सिर काट कर आगे बढ्ने में नहीं होना चाहिए क्योकि बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो स्वयं अंधेरे में रहने के कारण प्रकाश को सहन नहीं कर पाते हैं.वैसे व्यक्ति को सरल,स्वतंत्र जीवन गुज़ारना चाहिए.कहते हैं ना कि छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से जिंदगी बोझ बन जाती हैं लेकिन मनुष्य को हर छोटी बात पर भी ध्यान देना चाहिए क्योकि अल्वर्ट आइंस्टीन ने कहा हैं कि जो छोटी-छोटी बातों में सच को गंभीरता से बही लेता हैं,उस पर बड़े मसलों में भी भरोसा नहीं किया जा सकता.जीवन अनुभवों का खजाना होने के कार्न आपसी तालमेल सामंजस्य सामाजिकता अत्यंत आवश्यकता होती हैं.जितना हम व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं उतना ही हम हर क्षण हर दिन नया अनुभव प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में उनका उपयोग करके लाभान्वित होते हैं क्योकि चीनी कहावत हैं, ‘व्यक्ति किसी अक़्लमंद से एक बार की बातचीत में उतना पा सकता हैं,जितना उसे महीनों किताबें पढ़ने से भी न मिले.संबंध ही जीवन की भाषा बनाते हैं और रिश्ते उस भाषा के शब्द और वाकई हुआ करते हैं.हमारा पूरा जीवन प्रयोग कि तरह होता हैं.राल्फ इमर्सन कहते हैं कि जितना अधिक प्रयोग करेगे ,उतने ही ज्यादा सफलता प्रपट करने के अवसर बढ़ेगे.एक समझदार व्यक्ति कि सारस कि तरह होश से काम लेना चाहिए और जगह,बचत और अपनी योग्यता को समझते हुये अपने कार्य को सिद्ध करना चाहिए,जैसा कि खलील जिब्रान का मानना हैं.इंसान कि आंखे माइक्रोस्कोप कि तरह हैं,ये दुनियाँ को उसके वास्तविक आकार से बहुत बड़ा कर देखती हैं,यानि बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं.जीवन हमें निकृष्ट होकर नहीं गुज़ारना चाहिए.कहते हैं,जिंदगी में कोई बेकार नहीं होता.बंद घड़ी भी दिन में दो बार सही समय देती हैं.सुकून पाने का सबसे सटीक पाठ हैं,कार्य करते जाईए,परिणाम कि उम्मीद लगाए बिना.अगर उम्मीद ही करना  हैं तो ईश्वर से करना चाहिए.अगर कभी कोई आपके साथ अच्छा सुलूक करता हैं तो समझना चाहिए,हमारे अच्छे कार्यों का फल ईश्वर ने दिया हैं.जीवन का रूप कैसा भी हो ,हमें उससे हर हाल में स्नेह करना चाहिए.इस संबंध में वाइसेंट पाल कहते हैं कि खुद को पसंद करने के लिए आपको व्यावहारिक गुणों को सीखने की जरूरत हैं,क्योकि जितना ज्यादा समय आप खुद के साथ व्यतीत करेगे,उतनी ही ज्यादा तसल्ली आपकों अपने रिश्तों में मिलेगी.क्योकि जिंदगी में सबसे मजबूत रिश्ता हैं-हमारी मुश्कराहटें.इसलिए कभी-कभी ऐसा भी करे.आसमान से जब बूंदों का संगीत बिखर रहा हो,तब अपने बीते हुये बचपन को पास बुला ले और कागज कि एक कश्ती को जीवन की लहरों पर तैरा दे और फिर देखे मुस्कानों की दोस्ती...... जारी हैं....... 
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