नारी : स्रष्टि की ऊर्जावान स्रोत
का बिन सूनी काया ?
का बिन सूनी माया?
उपर्युक्त पंक्ति का अर्थ हैं –नारी [नाड़ी ].आज समाज में औरतों की भूमिका
में सवाल गृहस्थ और कामकाजी महिलाओं के बीच मूल्यांकन का सवाल बन गया हैं.सर्वप्रथम
औरतों की गुलामी,आर्थिक गुलामी से परिभाषित होने के कारण तथा पुरुषों की अहंकारी प्रवृति
जैसे औरत जात पर राज करना,औरत शोषण के लिए पैदा हुई हैं,होने के कारण,वह गुमनामी सीमित
दायरे और परिवार की चहारदीवारी में कैद होकर रह गई हैं.जबकि नारी चाहरदीवारी नहीं,बल्कि
मोती की तरह सहेजने-संवरने वाले जीवन के रिश्ते को अपने भीतर से गुजरने वाली एक दरवाजा
हैं.परिवार की वह धुरी हैं,जो गुमनामी सीमित दायरे में कैद होकर,परिवार व बच्चों के
जीवन की सुख-सुविधाओं का चिन्तन करते हुए अपने अमूल्य-अतुल्यनीय,नम्रता और करूणा की
मूर्ति हैं.ताउम्र अपने को गला –गलाकर खुशहाल घर की ईंटे संवारती हैं लेकिन उसका योगदान
पुरुष प्रधान समाज में कही भी रेखांकित नहीं करता.कानून की नजरों में बराबर का स्थान
होने पर भी वह तर्क पूर्ण लड़ाईयों के स्थान पर भावुकता और दूसरों की सहायता के बीच
न्याय पाने के बीच छटपटाने के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ता हैं.नारी स्रष्टि
की पर्याय,धरा सी उदार,सूर्य की दमकती किरणों की तरह,उसकी मेहर्वानियों,नेमतों,सैगातों
की पहुच अनंत हैं.उसका कोमल निर्मल ह्रदय बिना किसी नफा-नुक्सान के अनदेखा भरोसे पर
फैसला लेकर उगती हैं और मुट्ठी भर सुख-सुविधाओं और अधिकारों की उम्मीद में तिल-तिल
कर अपने को नष्ट करती हैं.स्वयं पर भावनाओं का अनियन्त्र्ण और चिरकाल बनी छवि को सत्यापन
कर पुरुषों के सामने अबला,असहाय,वेबश,मजबूर,लज्जाशील मानने लगती हैं.अरस्तु ने भी स्त्री
को पुरुष के शरीर की अतिरिक्त हड्डी माना हैं.’पुरुष महिलाओं को सजावट का गुलदस्ता
मानता हैं.स्त्री की छवि हमेशा से ही ‘आँखों में पानी,आंचल में दूध और शरीर उसका अग्नि
का ही रहा हैं.’
स्त्री यानि समाज का
आधा हिस्सा और राजनीतिक भाषा में कहा जाय ‘पचास फीसदी वोट’.पत्नी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व
पर अधिकार जमाने वाला पुरुष अपनी शासक और शोणित के रूढ़िवादी रिश्ते में अपने को प्रथक
रखने में असमर्थ रहने के कारण उसे दोयम या भोग्या मानता हैं.उसके प्रति उसकी निरीह
भावना व सम्वेदना के स्तर पर प्रमुख महिला के बिच वोट देना सत्य नहीं बल्कि सम्वेदित होना व्यक्ति की पहचान हैं, न पुरुष
की या स्त्री की.इस सदी में ही नहीं,बल्कि सदियों से अंगारों पर चलने के साथ जलती हैं.वह
राख का ही इतिहास हैं जिसे घर को संवारने के लिए,गंदे-जूठे बर्तनों को चमकाने वाली
राख की तरह,या फिर बची राख को खेतों के कीडेमकोडे को साफ करने के लिए उपयोग किया जाता
हैं नहीं तो नालियों में कूड़े-करकट के ढेर में सड़ने के लिए फेक दिया जता हैं.आज भी
नारी की स्थिति सजायाफ्ता कैदी की तरह हैं जो पारे की दीवारों वाली ढंडी जेल में अपने
को मुक्त होने की प्रतीक्षा में रहती हैं.मुस्लिम समाजों में पुरुषों को चार विवाह
करने की इजाजत ने महिलाओं की स्थिति दयनीय कर दी हैं.बाईविल में स्त्री के लिए कहा
गया कि पुरुष की पसली से स्त्री को निकाला गया हैं.फिर भी नारी द्वारा पुरातन स्वरूप
को तोड़ने के अथक प्रयास का कारण कुछ अलग करने की चाहत या जुल्म के प्रतिकार में आवाज
उठाने की हिम्मत ने उसने विद्रोह के बीज बोये हैं,जिसके परिणाम सामने भी आये.फिर चाहे
समाज का उसे वागी कहा जाए या अपनी मनमर्जी का मालिक.उसके विद्रोह में उसने अपनी कलम
को ताकत बनाया हो या बंदूक उठाकर अपने दमन की आग से बगावत का धुआं निकाला हों.अपने
जीवन को दाँव पर लगाकर अपने लक्ष्य के लिए मर मिटने के उसका संघर्ष आज भी जारी हैं.
नारी की काबलियत
पर सदैव संशकित रहने वाला पुरुष समाज,उसकी अपूर्व क्षमताओं से दमकते व्यक्तित्व और
उसकी कामयाबियों को अपवादों में भले ही न गिने,उसकी कामयाबी को अपने पूर्वाग्रही,अनुमान
रूपी चश्मे से अनदेखा करता हैं.लेकिन आज महिलाओं की कामयाबियों को भाग्यवादी न कहकर
नकारा नहीं जा सकता हैं.आज जो मुकाम हासिल किया हैं वह दिन-रात की मेहनत रूपी साधना,उसके
लक्ष्य में हर कदम पर उसकी तपस्या हैं जिसने एक मुकाम हासिल करने में उसकी यात्रा को
निरन्तरता प्रदान करने में खुद को विकसित किया हैं और अपनी एक पुरजोर कोशिस,मौजूदगी
के रूप में एक मुकम्मल पहचान दी हैं.कामयाबी का चश्पा लगवाने में व्यक्तित्व किसी का
भी हो,पुरुष हो या स्त्री,वह अपने अप में अनूठा होता हैं जिससे बंधन मुक्त,संशय रहित
व्यक्तित्व की पहचान स्वीकार की जाए.उसे पूर्वाग्रहों के विचारों से मुक्त क्यों नहीं
किया जाता?उसके योगदान को नतमस्तक कर एक पर्व की तरह उल्लासित होकर क्यों नहीं मनाया
जाता?आखिर कब तक महिलाओं की क्षमता पर ऊँगली उठती रहेगी?जबकि ऊँगली उठाने वाले को यह
सोचना चाहिए कि बाकी की चार ऊँगली खुद की ओर इशारा करती हैं कि पुरुष का व्यक्तित्व,सफलता,काबलियत
सब कुछ नारी बिना अधूरा हैं.महिला व्यक्तित्व को एक संवेदना रूपी जीवट स्पन्दित से
भरपूर व्यक्तित्व की संज्ञा दे.महिला अपनी उपलब्धियों के निशां छोड़ती हुई अग्रसर हो
रही हैं,तमाम विपरीत माहौल के बावजूद भी.प्रत्येक क्षेत्र में उसकी पदचाप गौरव तलब
पहचान दर्ज करा रही हैं,गुजरे दशक में.निःसंदेह समाज के समतुल्य महिला-पुरुष राष्ट्र
के विकास में भागीदार बन रही हैं.यह प्रवर्ति उत्तरोत्तर बढ़ रही हैं.नक्शे पर बनी योजनाओं
को साकार कर,अस्तित्व की लकीरें खींच रही हैं.
कुछ महिलाएं
अपने विशेष व्यक्तित्व की गरिमा और अनुभव से प्रभामंडल के आधार पर समाज को एक नई दिशा
देने में सफल हुई हैं.नये भारत के निर्माण में योगदान देने वाली महिलाओं को विकास के
राजदूत नाम से जाना जा रहा हैं.महिलाओं की उत्प्रेरक भूमिका को वर्णित नहीं किया जा
सकता.वह समाज में परिवर्तन लाने के लिए दिए गये अधिकारों का सदपयोग कर कार्य और परिणाम
आधारित एक ऐसी कार्यरत छवि प्रस्तुत कर रही हैं जिसमे उनका योगदान विभिन्न क्षेत्रों
में रेखांकित हो रहा हैं.महिलाओं के प्रेरणा बिन्दुओं का अवलोकन करने पर ज्ञात हो रहा
हैं कि समाज के विकास को एक नया आयाम मिल रहा हैं.अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित
महिलाओं का उद्धेश्य भावी पीढ़ी यानि की महिलाओं के लिए एक ऐसी मजबूत नींव स्थापित करना
हैं कि आगे किसी महिला को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष न करना पड़े.एक नई सोच के साथ
लक्ष्य हासिल करने के लिए अविरल गति से बढती हुई चहुँ दिशा में अपना अस्तित्व सुनिश्चित
करने के लिए प्रयत्नशील हैं.अपनी भागीदारी को प्रेरित करके एनी महिलाओं को जुड़ने के
लिए प्रलोभित करती हैं.महिला कल्याण सम्बन्धी विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श करने
के लिए सामाजिक कार्य कर्ताओं,प्रबुद्ध वर्ग से सम्पर्क स्थापित कर अपनी गुणवत्ता को
बढ़ा रही हैं.सम्मेलनों के द्वारा महिला विकास व उत्थान सम्बन्धी अवधारणा पर विस्तार
से प्रकाश डालकर महिलाओं को जागरूक कर रही हैं.समय-समय पर उत्थान कार्यक्रमों की प्रगति
पर सक्रिय भूमिका निर्वाह करते हुए रिपोर्ट प्रस्तुत करती हैं कि आशाजनक परिणाम न मिलने
के अवरूद्ध कारों से कैसे निपटा जाए.इस सम्बन्ध में अपनी उल्लेखनीय भूमिका निर्वाह
कर महिला विकास सम्बन्धी विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करके सभी का ध्यान आकर्षित करती
हैं कि समितियों को,सरकार को महिला विकास के कार्य की सौद्धेश्य देखभाल के लिए क्या
करना चाहिए,जिससे महिलाओं को और अधिक शक्ति सम्पन्न बनाया जाय.विवादित सन्दर्भों में
किस तरह प्रासंगिक भूमिका निभाई जाए.महिला-पुरुष के बीच जो असमानता की खाई सरीखी बनी
हुई हें उसे पाटने के लिए पारस्परिक विवादों को मिटाकर महिलाओं को दिए गये अधिकारों
में पुरुषों द्वारा अडचन पैदा न करे बल्कि रचनात्मक रूप से सक्रियता दिखाए.इससे महिला
उत्थान में पुरुषों की भूमिका का एक नया आयाम उभरकर आयेगा.अब नारी की आँखों में पानी
नहीं,बल्कि अग्नि प्रज्ज्वलित हो रही हैं.
नारी स्रष्टि रचयिता,पालनहार,कर्तव्यपरायण
सभी में पुरुषों से आगे होने पर भी उसे अक्षम व नेतृत्व हीं बनाकर चुपके से सत्ता के
गलियारे में सत्ता की कुंजी पिछले दरवाजे से अपने हाथों में रखे हैं.फिर भी कई महिला
नेत्रियों ने अपनी प्रेरणादायी छवि से अमित छाप छोड़ी हैं.नये-नये मापदंड स्थापित कर
अपनी सहानुभूति व सहनशीलता की ताकत पर,सामाजिक क्रान्ति लाने में पुरुषों से पीछे नहीं.अपने
बेहतर प्रदर्शन से पुरुषों को पीछे खदेड़ दिया हैं. अत:नारी जीवन भर ढलकती बूंदों से
पलों को जीती-जागती,लगाव-अलगाव के बीच डूबते ह्रदय होने को मजबूर होने के बाद भी ‘स्रष्टि
की ऊर्जावान स्त्रोत’हैं.