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मंगलवार, 30 जनवरी 2018

           किसी ने सही ही कहा हैं कि-‘माँ’ शब्द स्वयं अपने आप में काव्य हैं जिसे किसी कलम से नहीं लिखा जा सकता. ममता का संसार,शाश्वत अनुराग,श्रद्धा,समर्पण,त्याग,निजता,मूर्तिमान,संस्कारो की ऊर्जा,साधु संत सी सीधी सरल ज्ञान का स्रोत,दुलार भरी अन्नपूर्णा,जादू की थपकी,दुआओं की वर्षा करती ,तू दुनियां की नायाव तस्वीर हैं.माँ एक फरियाद हैं ,माँ एक हकीम हैं,माँ एक जादूगर हैं,माँ एक तसल्ली हैं,परिवार की रीढ़ की हड्डी होती हैं ‘माँ’.जैसा कि – टी.टाल्मेज ने कहा हैं कि ‘माँ उस बैंक की तरह होती हैं जहां हम सारे दुःख-दर्द और परेशानियां जमा कर सकते हैं’.सही ही कहा हैं जब हम अकेले पड़ जाते हैं,दुनियां की भीड़ में कही खो से जाते हैं तो बस उस माँ का चेहरा याद आता हैं जब हम चिंता ग्रस्त होते थे,उलझनों से घिरा मन होता था तो वो अपनी ममतामयी छाया से चिंतामुक्त कर देती थी.वह अपनी हल्की-हल्की थपकियों से मीठी-मीठी लोरी गा कर चिंता मुक्त कर चैन की नींद सुला देती हैं.जीवन की लडखडाती डगर में डगमगाते हैं,समस्याओं से इतना घिर जाते हैं कि चारों ओर बस अन्धेरा-ही-अन्धेरा ही दिखाई देता हैं कही से भी बहार निकलने का रास्ता नहीं सूझता,तब तू अद्रश्य रूप से सहारा बन हौसलाअफजाई करती हैं और अँधेरे में जाने की रौशनी दिखाती हैं.माँ ही हैं जो विषम परिस्थितियों से कैसे निपटना हैं,सब जानती हैं.जीवन को सुगम बनाने वाली तेरी सीखे हैं,टू हम बच्चों की प्रेरणा हैं,अपना सर्वस्व नौछावर करने वाली माँ का विश्वास और प्रशंसा ही जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करना सिखाता हैं.किसी ने कहा हैं कि ‘जन्नत का हर लम्हा दीदार किया था,माँ तूने गोद में उठाकर जब प्यार किया था’.तू दया-प्रेम-क्र्रुना का अनूठा संगम तुझमे समाया हुआ हैं.माँ तेरी याद तब बहुत आती हैं जब पेट भरा होने पर भी मन तृप्त नहीं होता था,तो तेरे हाथों की वो चूल्हे की सोंधी-सोंधी रोटी और बुझे हुए आलू की महक याद आते.भूखा पेट होने पर भी उस परोसी हुई थाली में, तेरे हाथों का प्यार उस बेली हुई रोटी में स्म जाता था तो उस खाने की सुगंध से बिना खाए ही तृप्त हो जाते थे.जब तू हम बच्चों को खाते देखती तो तेरे चेहरे को वो संतोषी हम भूल ही नहीं पाते.कभी कभी जब हम नासमझ बच्चे स्वाद में पूरा खाना ही खा जाते,तो डेगची में खाना तेरे लिए नहीं बचता था, तो तू बस पानी पीकर ऐसे डकार लेती कि तूने भरपेट खाया हो. या फिर कभी ऐसा हो जाता की जब एक रोटी के चार टुकड़ों को खाने वाले पांच हो,तब ‘मुझे भूख नहीं’ऐसा कहने वाली इन्सान भी तू हैं माँ.माँ आज वो सब समझ आता जब तुमने मेरी हजार गलतियों को अपनी शीतल मुस्कान से माफ़ कर,सर पर ममताभरा हाथ फेर कर गले से लगा लेती.थके –हारेहोने पर तेरी लोरी से दिन भर की थकान मिट जाती. आज तेरे आंसू व मुस्कान का भेद समझ आता हैं.तूने अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा,हमेशा मुस्कराते हुए दुआएं लुटाई हैं.सही भी हैं,संसार का सबसे महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ ज्ञान हमे माँ से ही मिला हैं माँ से बड़ा कोई गुरु नहीं.माँ में ब्रह्माण्ड की गहराई हैं.दुनियां की काली नजरों से बचाने वाली माँ का आंचल ही तो होता हैं.
                   रघुवीर सही ने माँ के विषय में उल्लेखित किया ‘मैं माँ की भावना की कद्र करता हूँ तो मुझे वह नाचती हुई नहीं,बाग़ में बेले छांटने की मजूरी करती हुई दिखती हैं’.देवी स्वरूपा माँ एक भावना से भरा भाव हैं.इस भाव का मन में आविर्भाव होते ही हम अपने आप को सुरक्षात्मक कवच के अंदर पाते हैं.माँ एज जादुई आत्मा की तरह होती हैं जो बिना कुछ कहे बच्चों के अंतर्मन को समझकर उनकी जरूरतों को पूरा करती रहती हैं.माँ की प्रवर्ती नैसर्गिक होती हैं.जैसे धरा अपने स्वरूप को संभाले रहती हैं वैसे ही माँ अपने बच्चों को संभाले रहती हैं.अनगिनत गुणों की खान माँ जिसे उपमाओं में नहीं बांधा जा सकता.सम्पूर्ण संसार की जन्मदात्री माँ स्रष्टि कर्ता हैं जिसने ईश्वर को भी जन्म दिया हैं.माँ धरा सी हैं जैसे धरती अपने में समाई एक एक बूंद से पेड़-पौधों को सींचती हैं वैसे ही माँ भी अपनी आँखों की एक-एक बूंद से अपने बच्चों की परवरिश करती हैं.माँ का प्यार अनंत हैं इसे न तो परिभाषित किया जा सकता हैं और न ही शब्दों में बांधा जा सकता हैं.फिर भी हम माँ की इस घनीभूत छत्र-छाया को किसी न किसी रूप में प्रदर्शित करने का प्रयत्न करते हैं जिससे माँ-बच्चों के बीच एक भरोसे लायक रिश्ता कायम होता हैं और आपसी रिश्तों की डोर मजबूत होती हैं.इसलिए ममता का आभार व्यक्त करने के लिए प्रतिवर्ष मदर्स डे मनाते हैं.उसका स्नेहभाव हमेशा हम बच्चों को द्रश्य-अद्रश्य रूप से सरावोर करता रहता हैं.मातृत्व सुख स्त्री के जीवन के अधूरेपन को सम्पन्न करता.वह बिना किसी दवाब के अपनी ममता शिशु पर न्यौछावर करने वाली भरनी हैं,वह बच्चे के हर खालीपन को भर्ती रहती हैं.बच्चे माँ की छत्र-छाया में एक सुंदर सम्भावना से भरा जीवन जीते हैं.हमेशा वो हमारे आस-पास आजीवन रहती हैं.  
                   ‘माँ धरती की हरी दूब –सी माँ केसर की क्यारी हैं,पूरी स्रष्टि निछावर जिस पर माँ की छवि न्यारी.ये पंक्तियाँ जगदीश व्योम ने सही ही लिखा हैं क्योंकि माँ के विषय में कहना असम्भव ही नहीं नामुमकिन भी हैं उसकी ममता को किसी कवि की पंक्तियों ले लयबद्ध नहीं किया जा सकता और न ही उसके उपकारों को किसी कथाकार की कहानियों में उतारा जा सकता. स्रष्टि रचियता ब्रह्मा,पालनहार विष्णु और जीवन का उद्धार करने वाले शिव ये तीनो ही रूप में मानव को जन्म देने वाली माँ  हैं.इसलिए अगर इस जगत में सबसे बढकर हैं तो वो माँ ही हैं.जो एक सफल इन्सान बनाने के लिए अपने सारे अनुभवों को बच्चों के जीवन में डाल देती हैं.वह बिना किसी सीमा में बंधे पाठ्यक्रम की शिक्षा नहीं देती.उसकी शिक्षा तो बिना किसी अनुशासनबद्ध तरीके से पूरी होती हैं.हर दिन एक नया अनुभव सिखाने वाली माँ इसीलिए प्रथम शिक्षिका होती हैं.  उसके लाड-प्यार दुलार ,डाट-डपट में भी जीवन का सबक छिपा रहता हैं.माँ की शिक्षा में किसी डिग्री की जरूरत नहीं होती,उसका बच्चों को संस्कारवान बनाने में किसी शिक्षा की जरूरत नहीं होती.बच्चे का परिवार ही उसकी पाठशाला होता हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिले संस्कार,समस्त परिजन से मिले अनुभव ही पाठ्यक्रम होता हैं.जिन्दगी जीने का फलसफा सिखाने वाली माँ के सम्बन्ध में मुनब्बर राणा का कहना हैं कि- ‘कुछ नहीं होगा तो आंचल में छुपा लेगी मुझे माँ ,कभी सर पे खुली छत्त नहीं रहने देगी.’भगवान का हम भजन करते हैं ,य्नको हर जगह ढूढने की कोशिस करते हैं तो भगवान ने इसी कमी को पूरा करने के लिए माँ के रूप में भगवान को भेज दिया.माँ-बच्चे के इस अनमोल रिश्ते में एक अलग सा विश्वास होता हैं.गिर कर उठाना चलना सिखाती माँ बच्चें की किलकारियों में ही अपना सुकून ढूढ़ लेती हैं.वह अद्रश्य रूप में सदा ही हमारे आस-पास विद्यमान रहती हैं.इसकी ममता में इतनी गहराई होती हैं जिसे न तो किसी शब्दों में बयाँ किया जा सकता और ना ही परिभाषा में बांधा जा सकता.अनगिनत गुणों की खान्वाली उस माँ के सामने नत मस्तक हैं जो अपनी जन की प्रवाह किये बिना ही हम बच्चों को हर विकट परिस्थिति से निजात दिलाती हैं.प्यार का झरना बहाने वाली इस माँ का ममतामयी सागर कभी रिक्त नहीं होता.उदारमयी भावना वाली माँ आपदाओं से बचाने के लिए बच्चों के सिर पर आकाश रूपी संकटमोचक ढाल बन जाती हैं.बहुतेरे रूप वाली माँ बहु गुणों में पारंगत तो होती ही हैं साथ ही वह बच्चो की आदतों,क्रियाकलापों को पहचान कर उसके व्यक्तित्व का विकास करती हैं.उसकी हर सीख जीवन का पथ प्रदर्शक होता हैं.उसके विकास में अहम भूमिका निभाने वाली व भावनात्मक रूप से बच्चे से जुडी होने के कारण हमेशा सचेत रहती हैं.इस सम्बन्ध में जौहर कानपुरी कहते हैं कि ‘हमें इन झुर्रियों में आयतों का अक्स दिखता हैं.हम अपनी माँ के चेहरे की तिलावत करते रहते हैं.बच्चा क्या हैं?एक कच्ची माटी का लौंदा और माँ जिसे अपने निर्मल निःस्वार्थ भाव से दुलारत-फटकारती हुई उसे सच्चा,ईमानदार इन्सान बनती हैं.’ उसके इस प्यार को एहसान मानकर,कर्ज चुकाने की गुस्ताखी करना ही ध्रष्टता हैं.क्योकि यह ऐसा ऋण हैं जिसे हम कभी भी नहीं चुका सकते.अगर उसके ऋण चुकाने की कोशिस भी करे तो कौन-कौन से ऋण चुकायेंगे?इस दुनियां में हमे लाने से पहले जो उसने कष्ट उठायें,यहाँ तक कि अपनी म्रत्यु को भी दांव पर लगा दिया या उसकी ममता का कर्ज ,जो तुम्हारी ध्वनियों में बह रहा हैं जिसे उसने अपने दूध की अमृत मयी बूंदों से तुझे सींचा.या उन रातों का जो तेरी दुःख-तकलीफों में गुजारी.तेरी चिंता में अपने माथे की शिकनों को छिपा कर ,अपनी पीढा के अश्रुओं को पीकर सदैव अधरों पर मीठी-सी मुस्कान बिखेरती रहती हैं.हम माँ के ऐसे ममतामयी लुटाने वाले ऋणों की कड़ीयों में जकड़े हुए हैं,जिन्हें हम इस जन्म में क्या अगले साथ जन्म में भी कर्ज नहीं चुका सकते.हम कितने भी बड़े क्यों न हो जाए ,उसका हाटन हमेशा आशीर्वचनों के लिए उठा रहता हैं और मुख से हमेशा धीरज भरे बोल फूटते रहते हैं.हमारे ऊपर हाथी समान दुखों के पहाड़ को क्षण भर में भगा देती हैं.उसकी डांट में भी प्यार झलकता हैं और अधर हमेशा दुआओं में बुदबुदाते रहते हैं.विलक्ष्ण सहन शील के परिचायक माँ का ममत्व हमेशा हमारे जीवन में झांकता रहता हैं.किसी ने सही भी कहा हैं-
     ‘जिसमे होने से मैं खुद को मुकम्मल मानता हूँ,
     मेरे रब के बाद ,मैं बस ,मेरी माँ को जानता हूँ.’












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