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सोमवार, 18 जून 2018

असमंजस

आधुनिकता की दौड़ में डगमगाती....
संक्रमण के दौर से गुजरती...
मंझधार में फंसी. ...
निस्सार जीवन में
जर्जर पीत पर्ण सा
 बिखरा उजडा मन
एकाकी राही पथिक की
धुंधले सपने जेहन में समाए
आशा- निराशा के भंवर में
मन में टीस
दिल में आस
कुछ कर गुजरने की चाह
असमंजस मन के किसी कोने में
बदलते परिवेश में
क्या सही,  क्या गलत
किसका समावेश करू
किसका अलगाव
मन कचोटता है
उद्वेलित हो विचलित होता कभी कभार
विक्षिप्त सी कुण्ठित दशा
सच को नकारू या
झूठ का चोला ओढू.......
विषम परिस्थतियां बन गई हैं...
एक तरफ परिपाटी है तो
दूसरी तरफ सपनों की उडान. ....
स्वार्थी बनती हूँ तो
अंतर्मन कोसता है
मन असमंजस में हैं. .....
क्या करूँ,  क्या ना करू. .....
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