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गुरुवार, 9 अगस्त 2018

मैं कठपुतली नहीं.........

                                   मैं कठपुतली नहीं............
मक बनी हाड़मांस की कठपुतली नहीं
गर्वीले रॉब वाली आज की नारी हूँ
पलक झपकते नयनों में धूमिल सपने नहीं
उसमे कामयाबी का संसार समाया हैं
भावभंगिमा पूछती ????
कहाँ  ढूँढू अपना अस्तित्व ????
संतोषी मुख मुद्रा में छिपाती आक्रोश का भाव
हक की फरियाद में
अधखुला मुंह ,लरजती जुवान
बंद मुट्ठी में सपनों की उड़ान भरती
फिर भी आसमान में सिर उठाकर कहती
'पूजयनीय कल थी,आज और कल सदा रहूँगी'.
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