उड़ान
बहुत जी ली,अब उसे वो सब गवारा नहीं,
बीता वो त्रासदी युग,बंदिशे ढीली पड़ी
सुख जागा मन में साबित करने को,
स्वप्नों की ऊँची उड़ान भरने को,
छटपटा रही हूँ,आजादी की श्वांस लेने को,
स्वतन्त्रता की आंधी में
तोड़ दी बंदिशों की जंजीरे
शक्तिहीन से शक्तिस्वरूपा बनी
स्वप्नों की हकीकत का झंडा गाड़ दिया
चेहरा चमक गया,मंजिल हासिल होने पर
चुटकी काटी,कही ये सपना तो नहीं।
ऐसा क्यों ?????
सृष्टि करता जीवन रचयिता
पा लनहार जीवन की संरक्षक
स्नेहसिक्त बहती निर्मल धारा
दुनिया में आने से पहले ही मुझे
कोख में ही अस्तित्व मिटा देते हो
या जद्दोजहद में आ भी गई तो
कूड़े में फेक या अनाथालय में
कैसे पत्थर दिल हो सौदागर
जानवरों जैसा सौदा बना दिया
बस,एक गुजारिश थी आशाभरी नजरों से
दिल किसी में थोड़ा सी जगह पाना चाहती थी.
अंतर्मन की व्यथा
परम्पराओं की कंदराओं में कैद,
रूढ़िवादी संस्कारों के गलियारे खड़ी
कठमुल्लावादी सलाखों से झांकती एकटक
सदिया बीत गई आजादी का हवा-पानी को
रूदन कंठ,अश्रु पूरित नेत्र,दर्द भरी जुवान
अंतर्मन में प्रतिरोध ,प्रतिशोध की धधक
विकृत हो चुकी मानसिकता
बंदिशों को दरारे कब भरेगी ?
कल की पूज्य्नीय बंदनीय शक्तिस्वरूपा
आज कैसे अबला,अशक्ता बन गई
निरंतर संघर्षरत,सहनशील अभी थकी नहीं हैं
अर्थ पर काबू पा लिया
समान काम,समान पगार तो मिल गई
अधिकारों संभावनाओं से भरी नारी
दिवास्वप्नों से निकल,आधुनिकता में जीती
फिर भी मंजिले पाने को भटकती
जीवंत हैं अभी भी पुराना दौर
थमा नहीं हैं आसुओं का सिलसिला
गुमसुम ,पीड़ित,दुखित मन की पीड़ा
प्रेममयी स्त्रोत की धारा अब भी विचलित हैं
सबसे बड़ी त्रासदी ,उस नजरिये की
आज भी ,पहले जहा थी ,वही देखना चाहती हैं.
महज एक मुद्दा नहीं ......
संकीर्ण सोच के पर्दे में छिपी मैं
कुछ भी नाम से पुकारों,क्या फर्क पड़ता हैं,
लड़का लड़की की जद्दोजहद में पर्दापर्ण किया
सपनों की तिलांजलिदे,दफन कर
मुश्किल हालात जीवन गुजारना सीख लिया
मुझमे कुदरत का वो नायाब तोहफा
जिससे सृष्टि बनती,सबरती ,रोशन होती
अस्तित्व को ज़िंदा रखकर ,एक स्थान बनाउंगी
बंदिशे हैं तो क्या,पोषे सपनों को साकार करूंगी
अधिकार सम्पन्न होकर भी लाचार हैं निर्णय लेने में
आधुनिक संसार की यही त्रासदी -
दैवीय स्थान देकर भी,फैसले देव करते
लेकिन डर कर ,हारकर बैठूँगी नहीं
प्रगति की आंधी अब रुकेगी नहीं
यौद्धा बनी,उड़ान भरी,अंतरिक्ष में पैर जमाये
कई किरदार जी चुकी,कई और जीऊँगी
अपनी बात रखेंगे,स्वाभमानी रहेंगे
फरमान सुन लो , 'समाज के ठेकेदारों'
'अस्तित्व कल था,आज भी हैं,और कल भी रहेगा।'
आधी आबादी आवाज बन रही हैं........
युग बदले,कानून बदले , विकास की राह
गुमनामी को समानता का अधिकार मिला
योग्यता के सजग नागरिकता की भूमिका निभाती
मताधिकार का महत्व समझ सजग मतदाता बनती
मताधिकार का महत्व समझ सजग मतदाता बनती
संघर्ष लम्बा जरूर हैं,अथक प्रयास जारी हैं,
हर क्षेत्र में भागीदार बन,निर्णायक भूमिका रही
हक मिला ,अबला से सबला बनी
हक मिला ,अबला से सबला बनी
जागरूक हो,सशक्त बन,जिम्मेदार बनी
अपने पर आगे बढ़,एक नया इतिहास रचती
बेटों से बढ़कर,अपने को साबित करती
अपने से जुड़े मुद्दे पर ,मुखर हो आवाज उठाती
अब किसी की मोहताज नहीं ,अपनी लड़ाई खुद लड़ती
संसद हो या मिडिया ,गोष्ठी या सम्मेलन हो
देश हो या समाज,मुद्दा कोइ भी हो
निर्भीक हो योगदान दे,परम्परागत तस्वीर बदलती
भविष्य का सुनहरा सपना बन,आधी आबादी की आवाज बनती
अपने से जुड़े मुद्दे पर ,मुखर हो आवाज उठाती
अब किसी की मोहताज नहीं ,अपनी लड़ाई खुद लड़ती
संसद हो या मिडिया ,गोष्ठी या सम्मेलन हो
देश हो या समाज,मुद्दा कोइ भी हो
निर्भीक हो योगदान दे,परम्परागत तस्वीर बदलती
भविष्य का सुनहरा सपना बन,आधी आबादी की आवाज बनती