महात्मा गांधी जी ने कहा, ‘मैं अपने मस्तिष्क में किसी को भी गंदे पैरों से चलने नहीं दूंगा.’
भूतकाल में मत उलझों,भविष्य के सपनों में मत खो जाओ,वर्तमान पर ध्यान दो.यही खुश रहने का रास्ता हैं.इसके लिए हमें अपने आप को बदलना चाहिए और उसे बदलने वाला और कोई नाही आप खुद होते हो.जिंदगी चलते रहने का नाम होता हैं.इसीलिए रिश्ते और रास्तों की सीमा अंतहीन होती हैं लेकिन यह सीमा तब खत्म होती हैं जब हमारे बढ़ते कदम तो रूक सकते हैं पर दिल कभी नाही रूकता,वो हमेशा अपने आप को साबित करने में लगा रहता हैं.ऐश्लेस्मिथ का कहना हैं कि ज़िंदगी खूबसूरती से भरी हैं.एक बार देखिये तो सही,भँवरे को देखिये,उस छोटे बच्चे को और हँसते हुये चेहरे,बारिश की खूबसूरती ,हवा की महक सब कितना खूबसूरत हैं...... ज़िंदगी को इसी पूर्णता में जिये और अपने सपनों के लिए मेहनत करे.खुशी के विषय में मिगनान मेकलगिन का भी कथन सत्या हैं कि जहां बच्चों का झुंड जमा हो वहाँ सच्ची खुशी देखी जा सकती हैं.बच्चे मन के सच्चे होते हैं बिना लाग-लपेट के वो अपने मन के भावों को प्रकट करते हैं.खुशी हम अकेले रहकर प्राप्त नही कर सकते हैं.रिश्ते नाते हमारे जीवन जीने के लिए अति महत्वपूर्ण होते हैं.सहभागिता जीवन जीने का आधार होने के कारण हमारी आपसी समझदारी रिश्ते पाकदार होने चाहिए.रिश्तों को खुशी देने केडबल्यू बाद ही हमें सबसे ज्यादा खुशी मिलती हैं.इसलिए हमें अपनी सोच को, विचारों को,ओरो को ज्यादा खुशी देने वाला बनाने का प्रयत्न करना चाहिए तभी हम खुश रह पाएंगे.इसलिए कहा गया हैं कि शब्दों में दयालुता ,आत्मविश्वास पैदा करती हैं.सोच में दयालुता गूढ़ता लाती हैं.दान में द्यालुता,प्रेम पैदा करती हैं.इंसान हैं तो गलतियाँ होना स्वाभाविक होता हैं,कोई कम करता हैं तो कोई ज्यादा ,बस,इतना ही अंतर होता हैं.लेकिन जब हम गलती करते हैं फिर वो चाहे भूलवश हुई हो या जानबूझकर पश्चाताप करना ही हमारी भूल सुधार का तरीका हैं.अरस्तू का कहना हैं कि जान में हो,पर संसार में गलती करने पर उसका दंड व्यक्ति को निश्चित ही भोगना पड़ता हैं.इसलिए हमे सत्संग अच्छे व्यक्तियों की करना चाहिए.
स्वामी विवेकानंद जी कहना था कि मन में अच्छे विचार लाए,उसी को जीवन का लक्ष्य बनाए.हमेशा उसी के बारे में सोचे,सपने देखे.यहाँ तक कि उसके लिए हर क्षण जिये.इसके लिए हमें आत्मा की संतोष और मानसिक संतुष्टि की आवश्यकता होती हैं.वक्त हमारा कैसा भी हो हमें मन को नियंत्रित रखना चाहिए क्योकि उत्तेजना,व्याग्रता,क्रोध,प्रताड़ना मानसिक विकार पैदा करती हैं जो मानसिक असंतुलन का जिम्मेदार होती हैं.व्यक्ति को अपने आप को परिस्थितियों के अनुसार ढालना की कोशिश करना चाहिए,जो व्यक्ति परिस्थिति अनुसार अपने जीवन को ढंग से सुचारु रूप से चला लेते हैं वही आगे चलकर सफल बन जाते हैं.जैसा कि गौतम बुद्ध ने कहा हैं कि चलते,खड़े होने,बैठते या सोते हुये जो अपने मन को शांत और सरल रख सकता हैं,वह जीवन में अवश्य ही शांति का सुख प्राप्त कर लेता हैं.
व्यक्ति का दिमाग अच्छे-बुरे विचारों का पिटारा होता हैं.अगर वो अपने मन के विचारों को अभिव्यक्त नाही कर पाता हैं तो वह मन ही मन कुंद सा हो जाता हैं.मानसिक बोझ को हल्का करने का उसे कोई न कोई माध्यम की आवश्यकता होती हैं फिर चाहे वो माध्यम कागज हो या व्यक्ति और उसकी विधा कोई सी भी हो लेकिन जब ज़िंदगी को अपने गीत सुनाने के लिए गायक नही मिलता उसे वह अपने मन के विचार सुनाने के लिए दार्शनिक पैदा कर देती हैं.
जीवन असफलता-सफलता की नींव पर खड़ी ईमारत के विषय में मैक्सवेल माल्ट्ज का कथन हैं कि अक्सर सफलता और असफलता के बीच अंतर किसी भी बेहतर काबलियत या विचार नहीं होते.बल्कि वह साहस होता हैं जिसके द्वारा कोई व्यक्ति अपने विचारों को दांव पर लगाता हैं,सुनियोजित जोखिम लेता हैं और काम करता हैं.परिवर्तन प्रकृति का नियम हैं,ज़िंदगी सुख-दुख के मोतियों का पिरोया हुआ हार हैं जो एक दूसरे के पर्याय हैं,एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नाही होता हैं.सुख हैं और दुख आयेगा और अगर आज दुख का साया मंडरा रहा हैं तो दुख की कैरे भी जीवन को रोशन करेगी.दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.खलील जिबरान का कथन हैं कि विचित्र बात हैं कि सुख की अभिलाषा मेरे दुख का अंश हैं.यह सत्य हैं कि परिस्थिति अनुसार मानसिक सोच,नजरिया,विचार बदलते रहते हैं.कितना उन्हें आत्मसात कर अपने जीवन को किस रास्ते पर ले जाते हैं.इस संबंध में जय शंकर प्रसाद ने लिखा हैं कि परिवर्तन ही सृष्टि हैं.जीवन हैं,स्थिर होना मृत्यु हैं.निश्चेष्ट शांति मरण हैं.प्रकृति क्रियाशील हैं...जब संस्कार और अनुशार्ण की आवश्यकता समाज में मान ली गई,तब हम परिस्थितियों के अनुसर मानसिक परिवर्तन के लिए क्यों हिचके?ऐसा मेरा विश्वास हैं कि जब मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक परिवर्तन को स्वीकार कर लेता हैं तो वह जीवन यात्रा को सुंदर सरल बनाने की राह खोल देता हैं.सफलता के मूल मंत्र हैं –परिवर्तन प्रकृति का नियम हैं जीवन अनंत हैं.समय के साथ चलना चाहिए.बदलाव के साथ अपने को ढालना,नई चुनौतियों को सकारात्मक सोच के साथ स्वीकार करते हुये बिना रूके निरंतर आगे बढ़ते रहे.बीति ताहि बिसार दे.अब आगे की सोच. मौके का फाइदा उठाना चाहिए.समय किसी का गुलाम नहीं होता हैं जिसने समय के साथ चलना सीख लिया उसी ने बुलंदियों को छू लिया.
हमें समय की परवाह करनी चाहिए.गया वक्त,जुवान से निकले शब्द,तरकश से छूटा वाण कभी भी वापस नहीं आते.जार्ज लुईस बोर्खोस का कथन हैं कि समय एक नदी की मानिंद हैं जो मुझे अपने साथ बहा ले जाती हैं,लेकिन मैं एक नदी हूँ।यह एक शेर हैं जो मुझे नष्ट कर देता हैं,लेकिन मैं भी शेर हूँ.यह एक आग हैं जो मुझे जलाती हैं लेकिन मैं खुद भी तो एक आग हूँ.व्यक्ति का जीवन सहयोगिता पर टीका हुआ हैं.सामाजिक प्राणी होने के कारण वो अपने विचारों का आदान-प्रदान भी करता हैं.हर प्राणी अपना भाग्य लेकर पैदा होता हैं.जीवन में अपनी इच्छानुसार अपनी सोच व्यवस्थानुसार कर्मकांड भी करता हैं.और कर्म कांड से मिले परिणाम उसकी प्रस्थिति नियत करते हैं.ऊंच-नीच ,अमीर-गरीब,अच्छा-बुरा,सुखी-दुखी सब समाज में उसका स्थान नियोजित करते हैं.प्रस्थिति अनुसार हि उसके साथ व्यवहार होता हैं जो मानवीय प्रवृति जन्मजात हैं.लेकिन फिर भी हमारे प्रस्थिति कुछ भी हो काही ना काही एचएम एक दूसरे से जुड़े हुये हैं,एक दूसरे के काम आते हैं.पोव लेव का कथन हैं कि न तो कोई इतना धनाड्य हैं कि उसे दूसरे की सहाता कि आवासयकता न हो और न हि कोई इतना दरिद्र हैं कि किसी भी रूप में अपने साथियों के लिए उपयोगी सिद्ध न हो सके.जीवन में संकट आते जाते हैं,उनसे मुंह नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि महात्मा गानही के अनुसार, ‘मेरा धर्म मुझे सिखाता हैं कि जब कभी जीवन में ऐसा संकट आय जिसे हम दूर न कर सके,तब हमें उपवास और प्रार्थना करनी चाहिए.अज्ञानी बनकर उनसे बचने का या उयंका सामना करने का बाहना नाही मारना चाहिए.
इमरसन कहते हैं,अज्ञान ही पाप हैं जो चोरी करता हैं,वह अपने को चुराता हैं जो धोखा देता हैं,वह आपे को धोखे में रखता हैं,जो कर्ज लेता हैं वह अपना ही कर्जदार बंता ऐन और जो दूसरों को जितना देता हैं उतना ही अपना लाभ करता हैं.यह बात सभी को जीवन का एक अहम हिस्सा बना लेना चाहिए.आप दुनियां को धोखा दे सकते हैं पर अपने आप से बचाकर कहाँ जाओगे?यह बात एससीएच हैं कि जब व्यक्ति संकटग्रस्त होता हैं तो रिश्ते-नाते अपने सब साथ छोड़ देते हैं.यहा तक कि व्यक्ति का खुद का साया भी साथ छोड़ देता हैं.पर व्यक्ति को ऐसे में हिम्मत नाही हारना चाहिए.आप अपना संकट तो नहीं मिटा सकते पर दूसरे संकटग्रस्त व्यक्ति का संकट दूर करने में अहम सहयोग ,योगदान दे सकते हो.कहते हैं ना एक ओर एक ग्यारह बनाओं ना कि शून्य होकर विलीन होकर अपने को समाप्त कर दो.बेसहारा हो तो किसी का सहारा बन जाओन.हम अपने लालच और मूर्खता के कारण खुद को नष्ट करने के खतरे में हैं.हम इस तरह के मनोविकारों से प्रदूषित होकर अपने अंदर झांकना ही नही चाहते.व्यक्ति अपने आपको स्वतंत्र नहीं रखना चाहता.सहयोगिता जीवन का मूल तत्व हैं पर अपनी अवचेतना को खुद ही चैतन्यता प्रदान करनी होगी अपने आप को कुप्रवृतियों,मनोविकारों और दूसरों की वाइसाखी पर जीवन गुजारने से स्वतंत्र होना पड़ेगा लेकिन व्यक्ति इस तरह स्वतंत्र रहना चाहता क्योकि फ्रायड के अनुसार कि ज़्यादातर लोग वास्तव में स्वतन्त्रता नाही चाहते,क्योकि स्वतन्त्रता के साथ ज़िम्मेदारी आ जाती हैं और ज़्यादातर लोग ज़िम्मेदारी से डरते हैं.यह शत-प्रतिशत सही हैं कि जिस तरह संयुक्त परिवार में निखट्टू व्यक्ति का जीवन भी गुजर जाता हैं उसे कभी अलग करके उसे जिम्मेदार नही बनाया जाता और उसे करने का विचार भी किया जाता तो वो वह अपने इस आजादपरस्त पराधीन जीवन को त्यागना नहीं चाहता ,वो समस्याओं से दर्ता हैं.हमारे यहाँ की सबसे बड़ी विडंबना व्यक्ति का अधिकांशतः जिम्मेदार ना होना काफी हद तक संयुक्त परिवार भी हैं.व्यक्ति के प्रोटोकाल बनो पर उसे अमरबेल मत बनाओं.स्वामी विवेकानंद का मत हैं कि यदि तुम आपदा के बारे में सोचते हो तो वो आ जाएगी.मौत के बारे में चिंता करते हो तो तुम अपने अंत की तरफ तेजी से बढ़ने लगते हो और स्वेच्छाचारिता से सोचो,विश्वास और निष्ठा के साथ ,तब जीवन और सुरक्शित हो जाएगा.अतः व्यक्ति को जिम्मेदाराना होना चाहिए तभी उसका सही माने में आत्मविश्वास होता हैं.पराई लाठी की टेक पर जीवन दूसरों की परछाई में जिया जीवन होता हैं.उसका स्वयं का चरित्र निर्माण ,पर दूसरों की छाया दृष्टिपात होती हैं.महात्मा आँधी के कथन को अपने जीवन में ढालना चाहिए, ‘मैं अपने मस्तिष्क में किसी को गंदे पैरों से चलकर नही आने दूंगा.
व्यक्तित्व निर्माण में व्यक्ति को अपने अंदर सकारात्मक भाव पैदा करना चाहिए.अपने आप से पूछे मैंने क्या बोया हैं?जो बोया हैं उसी के अनुरूप प्रतिफल हैं.अगर इस सच्चाई को जीवन पर्यंत अपने जीवन में आत्मसात कर लेते हैं.तो व्यक्ति को किसी से किसी भी प्रकार की शिकायत नही होती हैं लेकिन व्यक्ति जितना बोता हैं उससे अधिक प्राप्त करने की अभिलाषा रखता हैं.यही उसके दुख का मूल भूत कार्न हैं.रावर्ट लुई स्टीपेंसन का वक्तव्य हैं कि हर दिन का मूल्यांकन उस फसल से न करे जो आपने बोये हैं.व्यक्ति को अपनी काबलियत साबित करने के लिए अनेक अवसर मिलते हैं.पर वो अपने अहंकार वश उन्हे पहचान कर लाभान्वित नही हो पाता हैं.वावेनारगयूज का मानना हैं कि इंसान की महान उपलब्धि अपने अवसरों का अधिकतम लाभ उठाना और अपने संसाधनों का अधिकतम प्रयोग करना हैं.व्यक्ति मानवीय गुणों का भंडार होने के कारण भी वो उनही गुणों को जीवन में उतारता हैं जिससे वो लाभांश प्राप्त कर सके.जैसा कि हैरी एफ.बैक्स व्यक्ति को सफलता के सौपान बताते हैं-सफल होने के लिए व्यक्ति के पास योग्यता,महत्वाकांक्षा,साहस,प्रबल प्रेरणा,कड़ी मेहनत,ईमानदारी और वफादारी का प्रभावी समन्वय होना चाहिए.
व्यक्ति को अपने जीवन में नकारात्मक विचारों को दफन कर देना चाहिए क्योकि यह उसकी सफलता के रोड़े बनते हैं.व्यक्तित्व विकास में अवरूद्ध पैदा करते हैं.तभी व्यक्ति कुछ भी कैसी भी परिस्थिति का डट कर सामना कर सकता हैं.रे.ब्रेडवरी का मानना हैं कि अपने जीवन से सभी नकारात्मक लोगो को बाहर निकाल दे,वे अपना कफन खुद तैयार करते हैं.आप खुद को उनके साथ दफन किए जाने की अनुमति न दे.सत्य हैं कि सफल व्यक्ति की सफलता का राज चार्ल्स लाकमेन बताते हैं कि सफलता वही पुरानी ए बी सी अर्थात अवसर,बुद्धि और साहस .लेकिन व्यक्ति को अपनी शक्तियों में विनम्र और उचित विश्वास को आश्रय देना चाहिए.इसके बिना न सफल हो सकते हैं और ना ही खुशी ही मिल सकती हैं.
खुशी का चयन हमारे अपने पास होता हैं,तनावभरी जीवन में खुश रहने के लिए खुशी का चुनाव किया जाना चाहिए.इसके लिए व्यक्ति पराधीनता का जीवन छोड़कर स्वतंत्र जीवनयापन करे क्योकि खुश रहने का रहस्य स्वतन्त्रता हैं.और स्वतंत्र रहने के लिए व्यक्ति के साहस की आवश्यकता होती हैं.बाखरा दी ऐपलिस के कथनानुसार-हर दिन साथ खुश रहकर रिश्ते की डोर को मजबूती नही मिलती बल्कि मुश्किल घड़ियों का सामना करके और प्रतिकूल परिस्थितियों को मिलाकर धता बनाने से ही रिश्ते मजबूत होते हैं.जीवन चुनौतियों से भरा होता हैं और यही चुनौतियाँ जीवन को रोमांचक बनाती हैं और इसी से आपके जीवन का महत्व तय होता हैं.
बल्लभ भाई पटेल का कथन हैं कि यह सच हैं कि पानी में तैरने वाले ही डूबते हैं ,किनारे पर खड़े रहने वाले नही.मगर ऐसे लोग कभी तैरना भी नहीं सीख पाते.दुख के विषय में शेक्सपियर ने रिचर्ड थर्ड में कहा कि हमारे संतोष की इस शीट ऋतु को यार्क के इस पुत्र ने अब भव्य ग्रीष्म में बदल दिया हैं.यानि कि दुख का वक्त गुजर चुका हैं.मैं कामना करता हूँ कि ऐसा हम अपने देश के लिए कह सकते हैं.
ईश्वर ने हमें मानव जीवन दिया हैं इसकी कद्र करनी चाहिए,न कि मुसीबतों से भागकर,अपने आप को खत्म करना चाहिए.जैसा कि लेखिका,वरिष्ठ कथाकार,जाया सादवानी के अनुसार, ‘मृत्यु जीवन का अंत नहीं जैसा कि आम तौर पर लोग समझते हैं.यह एक ब्रेक हैं पुरानी यात्रा की थकान मिटाने और धूल झाड़ने का.अपनी गलतियों से सबक लेने और उन्हे दुरस्त करने का.’मानवीय जीवन की कद्रों की कीमत समझने और दूसरों की मदद के अवसर लेने का.अपने होने की सार्थकता में यकीन होने का,फिर एक नया रोल लेने और अपनी गलतियों से तौबा करने का.हमें अपनी कमजोरी की ताकत बनाना चाहिए लेकिन असफल व्यक्तियों में से 99% वे लोग होते हैं जिनकी आदत बहाने की होती हैं.हमारे जीवन का पर्दापर्ण में लाखों करोड़ों वर्ष लग गए यानि कि कई रूप में जन्म लेने के बाद मानव जीवन मिला हैं इससे डरना नहीं चाहिए.जीवन की इस महायात्रा के संबंध में जलालूद्दीन का कथन हैं, ‘मृत्यु हम से कुछ नहीं छीनती,बदले में कुछ देती ही हैं.’मुसीबतों का मुक़ाबला करते करते व्यक्ति अपनी मजबूत नींव तैयार करता हैं.आत्मविश्वास और दूसरों पर भरोसा बढ़ता हैं.लंबी सफलता पाने कि योजनाओं की संभावनाओं का जन्म होने लगता हैं और व्यक्ति जो मेहनत करता हैं वो उसमें सफल हो जाता हैं.उसे कारगर आशाजनक परिणाम प्राप्त होते हैं.जे.के.रालिंग के अनुसार, ‘मुसीबतों की गहराई में जाने से अच्छी नींव तैयार होती हैं.इंसान अपनी पसंद के अनुसार बड़ा या छोटा बंता हैं.यह सिर्फ उसकी क्षमता पर निर्भर करता हैं.विडंबना सबसे बड़ी यह हैं कि व्यक्ति जितनी मेहनत करता हैं उसके बदले वो अधिक परिणाम की आशा रखता हैं.को अपनी असफलता के कई कारणों को बताता हैं जबकि उसे अपनी असफलता के कई कारणों को जानकर उससे संतुष्ट होना चाहिए कि उसने जितनी मेहनत की,उसकी अपेकषा उतना परिणाम मिला हैं कि नही.मेहनत के बदले मिलने वाले परिणाम के विषय में हैनरी फोर्ड का कहना हैं कि आपको अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत करके परिणाम मिलने चाहिए .अगर महंताने के बदले कम से कम परिश्रम करना पड़े ,यह विचार ठीक नही हैं.
आपको अपने आप पर विश्वास करके अपनी संभावनाओं को क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए तभी वो कुशलतापूर्वक मेहनत करके आशानुरूप परिणाम से संतुष्ट हो सकेगा.सकारात्म्क सोच ही सफलता कि नींव हैं क्योकि आपकी सोच ,विचार आपके व्यक्तित्व आ आईना होता हैं.इस संबंध में आपरा विंफ्रेन का कथन हैं कि आप वही बनते हैं,जिसमें आपको भरोसा होता हैं.आज आप जीवन में जहां भी हैं वह आपकी मान्यताओं और भरोसे के कारण ही हैं.सफलता प्राप्त करना चाहते हैं आप फेल होगे ,फिर कोशिश कीजिये और अपनी क्षमता बढ़ाईए.व्यक्ति को अपनी मानसिक संकीर्णता रूपी घेरे से बाहर निकालकर सोच का दारा विस्तृत करना चाहिए तभी आप वो पा सकते हैं जिसका आपने शाद आशा भी ना की होगी.कुंठित सोच व्यक्ति की सोच पर जंग लगा देती हैं.जेक बेजोस के अनुसार, ‘आपको अपनी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए वो कम करना चाहिए जो आपने पहले नही किए या जिसे सोचा ही नहीं.ऐसा नहीं करके आप अवसरों को गंवा रहे हैं.अगर आप लोग टर्म के अनुसार सोचेगे तो जीवन में अच्छे निर्णय कर पाएगे ऐसे फैसले जिन पर आपको बाद में अफसोस नहीं होगा.
हर न्या दिन एक नए जीवन का आरंभ होता हैं.जीवन का खेल दरवाजे कि तरह होता हैं जब तक आप अपने जुनून और साहस की दस्तक से दरवाजा नहीं खटखटायेगे तब तक सपनों तक पहुँचने वाला द्वार नहीं खुलता हैं.जब तक नदी में डूबोगे नहीं,तब तक तैरना नहीं सीखोगे.बिना डूबे आप अपनी क्षमता का तैरने का गुण कैसे पता लगाओगे.तट किनारे तमाशा देखते रहने ,डरने से आप कभी भी अपनी मंजिल तक नही पहुँच सकते.जीवन गणित हैं,जहा जीवन की साँसे घटती हैं हर दिन जीवन जीने से प्राप्त अनुभव जुडते जाते हैं.अलग अलग अनुभवों घटनाओं को कोष्ठको में बंद करते हुये समीकरणों रूपी डायरे लगाते रहते हैं पर अंत में जीवन का अंतिम सत्य शून्य होता हैं अर्थात जीवन में कुछ ना कुछ करते हुये एक कामयाब जिंदगी जीना चाहिए.यह नही सोचना चाहिए जीवन मूल हैं वो अकर्मण्य होकर भी जीवन गुजाराजा सकता हैं.अथर्वेद में कहा गया हैं कि पूर्ण से पूर्ण का उदय होता हैं,पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा खींचा जाता हैं.
वावेना रगयूज का कथन हैं कि इंसान की महान उपलब्धि अपने अवसरों का अधिकतम लाभ उठाना चाहिए और अपने संसाधनों का अधिकतम प्रयोग करना चाहिए.हमें परिणाम को जाने बिना कारी करते रहना चाहिए.नकारात्मक को परे कर सकारात्मक सकारात्मक विचारों,सोचो,वातावरण में रहने की कोशिश करनी चाहिए.नकारात्मकता हमारी सोच को कुंड कर देती हैं.विनाश के गर्त में धकेल देती हैं.
जारी हैं..........
भूतकाल में मत उलझों,भविष्य के सपनों में मत खो जाओ,वर्तमान पर ध्यान दो.यही खुश रहने का रास्ता हैं.इसके लिए हमें अपने आप को बदलना चाहिए और उसे बदलने वाला और कोई नाही आप खुद होते हो.जिंदगी चलते रहने का नाम होता हैं.इसीलिए रिश्ते और रास्तों की सीमा अंतहीन होती हैं लेकिन यह सीमा तब खत्म होती हैं जब हमारे बढ़ते कदम तो रूक सकते हैं पर दिल कभी नाही रूकता,वो हमेशा अपने आप को साबित करने में लगा रहता हैं.ऐश्लेस्मिथ का कहना हैं कि ज़िंदगी खूबसूरती से भरी हैं.एक बार देखिये तो सही,भँवरे को देखिये,उस छोटे बच्चे को और हँसते हुये चेहरे,बारिश की खूबसूरती ,हवा की महक सब कितना खूबसूरत हैं...... ज़िंदगी को इसी पूर्णता में जिये और अपने सपनों के लिए मेहनत करे.खुशी के विषय में मिगनान मेकलगिन का भी कथन सत्या हैं कि जहां बच्चों का झुंड जमा हो वहाँ सच्ची खुशी देखी जा सकती हैं.बच्चे मन के सच्चे होते हैं बिना लाग-लपेट के वो अपने मन के भावों को प्रकट करते हैं.खुशी हम अकेले रहकर प्राप्त नही कर सकते हैं.रिश्ते नाते हमारे जीवन जीने के लिए अति महत्वपूर्ण होते हैं.सहभागिता जीवन जीने का आधार होने के कारण हमारी आपसी समझदारी रिश्ते पाकदार होने चाहिए.रिश्तों को खुशी देने केडबल्यू बाद ही हमें सबसे ज्यादा खुशी मिलती हैं.इसलिए हमें अपनी सोच को, विचारों को,ओरो को ज्यादा खुशी देने वाला बनाने का प्रयत्न करना चाहिए तभी हम खुश रह पाएंगे.इसलिए कहा गया हैं कि शब्दों में दयालुता ,आत्मविश्वास पैदा करती हैं.सोच में दयालुता गूढ़ता लाती हैं.दान में द्यालुता,प्रेम पैदा करती हैं.इंसान हैं तो गलतियाँ होना स्वाभाविक होता हैं,कोई कम करता हैं तो कोई ज्यादा ,बस,इतना ही अंतर होता हैं.लेकिन जब हम गलती करते हैं फिर वो चाहे भूलवश हुई हो या जानबूझकर पश्चाताप करना ही हमारी भूल सुधार का तरीका हैं.अरस्तू का कहना हैं कि जान में हो,पर संसार में गलती करने पर उसका दंड व्यक्ति को निश्चित ही भोगना पड़ता हैं.इसलिए हमे सत्संग अच्छे व्यक्तियों की करना चाहिए.
स्वामी विवेकानंद जी कहना था कि मन में अच्छे विचार लाए,उसी को जीवन का लक्ष्य बनाए.हमेशा उसी के बारे में सोचे,सपने देखे.यहाँ तक कि उसके लिए हर क्षण जिये.इसके लिए हमें आत्मा की संतोष और मानसिक संतुष्टि की आवश्यकता होती हैं.वक्त हमारा कैसा भी हो हमें मन को नियंत्रित रखना चाहिए क्योकि उत्तेजना,व्याग्रता,क्रोध,प्रताड़ना मानसिक विकार पैदा करती हैं जो मानसिक असंतुलन का जिम्मेदार होती हैं.व्यक्ति को अपने आप को परिस्थितियों के अनुसार ढालना की कोशिश करना चाहिए,जो व्यक्ति परिस्थिति अनुसार अपने जीवन को ढंग से सुचारु रूप से चला लेते हैं वही आगे चलकर सफल बन जाते हैं.जैसा कि गौतम बुद्ध ने कहा हैं कि चलते,खड़े होने,बैठते या सोते हुये जो अपने मन को शांत और सरल रख सकता हैं,वह जीवन में अवश्य ही शांति का सुख प्राप्त कर लेता हैं.
व्यक्ति का दिमाग अच्छे-बुरे विचारों का पिटारा होता हैं.अगर वो अपने मन के विचारों को अभिव्यक्त नाही कर पाता हैं तो वह मन ही मन कुंद सा हो जाता हैं.मानसिक बोझ को हल्का करने का उसे कोई न कोई माध्यम की आवश्यकता होती हैं फिर चाहे वो माध्यम कागज हो या व्यक्ति और उसकी विधा कोई सी भी हो लेकिन जब ज़िंदगी को अपने गीत सुनाने के लिए गायक नही मिलता उसे वह अपने मन के विचार सुनाने के लिए दार्शनिक पैदा कर देती हैं.
जीवन असफलता-सफलता की नींव पर खड़ी ईमारत के विषय में मैक्सवेल माल्ट्ज का कथन हैं कि अक्सर सफलता और असफलता के बीच अंतर किसी भी बेहतर काबलियत या विचार नहीं होते.बल्कि वह साहस होता हैं जिसके द्वारा कोई व्यक्ति अपने विचारों को दांव पर लगाता हैं,सुनियोजित जोखिम लेता हैं और काम करता हैं.परिवर्तन प्रकृति का नियम हैं,ज़िंदगी सुख-दुख के मोतियों का पिरोया हुआ हार हैं जो एक दूसरे के पर्याय हैं,एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नाही होता हैं.सुख हैं और दुख आयेगा और अगर आज दुख का साया मंडरा रहा हैं तो दुख की कैरे भी जीवन को रोशन करेगी.दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.खलील जिबरान का कथन हैं कि विचित्र बात हैं कि सुख की अभिलाषा मेरे दुख का अंश हैं.यह सत्य हैं कि परिस्थिति अनुसार मानसिक सोच,नजरिया,विचार बदलते रहते हैं.कितना उन्हें आत्मसात कर अपने जीवन को किस रास्ते पर ले जाते हैं.इस संबंध में जय शंकर प्रसाद ने लिखा हैं कि परिवर्तन ही सृष्टि हैं.जीवन हैं,स्थिर होना मृत्यु हैं.निश्चेष्ट शांति मरण हैं.प्रकृति क्रियाशील हैं...जब संस्कार और अनुशार्ण की आवश्यकता समाज में मान ली गई,तब हम परिस्थितियों के अनुसर मानसिक परिवर्तन के लिए क्यों हिचके?ऐसा मेरा विश्वास हैं कि जब मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक परिवर्तन को स्वीकार कर लेता हैं तो वह जीवन यात्रा को सुंदर सरल बनाने की राह खोल देता हैं.सफलता के मूल मंत्र हैं –परिवर्तन प्रकृति का नियम हैं जीवन अनंत हैं.समय के साथ चलना चाहिए.बदलाव के साथ अपने को ढालना,नई चुनौतियों को सकारात्मक सोच के साथ स्वीकार करते हुये बिना रूके निरंतर आगे बढ़ते रहे.बीति ताहि बिसार दे.अब आगे की सोच. मौके का फाइदा उठाना चाहिए.समय किसी का गुलाम नहीं होता हैं जिसने समय के साथ चलना सीख लिया उसी ने बुलंदियों को छू लिया.
हमें समय की परवाह करनी चाहिए.गया वक्त,जुवान से निकले शब्द,तरकश से छूटा वाण कभी भी वापस नहीं आते.जार्ज लुईस बोर्खोस का कथन हैं कि समय एक नदी की मानिंद हैं जो मुझे अपने साथ बहा ले जाती हैं,लेकिन मैं एक नदी हूँ।यह एक शेर हैं जो मुझे नष्ट कर देता हैं,लेकिन मैं भी शेर हूँ.यह एक आग हैं जो मुझे जलाती हैं लेकिन मैं खुद भी तो एक आग हूँ.व्यक्ति का जीवन सहयोगिता पर टीका हुआ हैं.सामाजिक प्राणी होने के कारण वो अपने विचारों का आदान-प्रदान भी करता हैं.हर प्राणी अपना भाग्य लेकर पैदा होता हैं.जीवन में अपनी इच्छानुसार अपनी सोच व्यवस्थानुसार कर्मकांड भी करता हैं.और कर्म कांड से मिले परिणाम उसकी प्रस्थिति नियत करते हैं.ऊंच-नीच ,अमीर-गरीब,अच्छा-बुरा,सुखी-दुखी सब समाज में उसका स्थान नियोजित करते हैं.प्रस्थिति अनुसार हि उसके साथ व्यवहार होता हैं जो मानवीय प्रवृति जन्मजात हैं.लेकिन फिर भी हमारे प्रस्थिति कुछ भी हो काही ना काही एचएम एक दूसरे से जुड़े हुये हैं,एक दूसरे के काम आते हैं.पोव लेव का कथन हैं कि न तो कोई इतना धनाड्य हैं कि उसे दूसरे की सहाता कि आवासयकता न हो और न हि कोई इतना दरिद्र हैं कि किसी भी रूप में अपने साथियों के लिए उपयोगी सिद्ध न हो सके.जीवन में संकट आते जाते हैं,उनसे मुंह नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि महात्मा गानही के अनुसार, ‘मेरा धर्म मुझे सिखाता हैं कि जब कभी जीवन में ऐसा संकट आय जिसे हम दूर न कर सके,तब हमें उपवास और प्रार्थना करनी चाहिए.अज्ञानी बनकर उनसे बचने का या उयंका सामना करने का बाहना नाही मारना चाहिए.
इमरसन कहते हैं,अज्ञान ही पाप हैं जो चोरी करता हैं,वह अपने को चुराता हैं जो धोखा देता हैं,वह आपे को धोखे में रखता हैं,जो कर्ज लेता हैं वह अपना ही कर्जदार बंता ऐन और जो दूसरों को जितना देता हैं उतना ही अपना लाभ करता हैं.यह बात सभी को जीवन का एक अहम हिस्सा बना लेना चाहिए.आप दुनियां को धोखा दे सकते हैं पर अपने आप से बचाकर कहाँ जाओगे?यह बात एससीएच हैं कि जब व्यक्ति संकटग्रस्त होता हैं तो रिश्ते-नाते अपने सब साथ छोड़ देते हैं.यहा तक कि व्यक्ति का खुद का साया भी साथ छोड़ देता हैं.पर व्यक्ति को ऐसे में हिम्मत नाही हारना चाहिए.आप अपना संकट तो नहीं मिटा सकते पर दूसरे संकटग्रस्त व्यक्ति का संकट दूर करने में अहम सहयोग ,योगदान दे सकते हो.कहते हैं ना एक ओर एक ग्यारह बनाओं ना कि शून्य होकर विलीन होकर अपने को समाप्त कर दो.बेसहारा हो तो किसी का सहारा बन जाओन.हम अपने लालच और मूर्खता के कारण खुद को नष्ट करने के खतरे में हैं.हम इस तरह के मनोविकारों से प्रदूषित होकर अपने अंदर झांकना ही नही चाहते.व्यक्ति अपने आपको स्वतंत्र नहीं रखना चाहता.सहयोगिता जीवन का मूल तत्व हैं पर अपनी अवचेतना को खुद ही चैतन्यता प्रदान करनी होगी अपने आप को कुप्रवृतियों,मनोविकारों और दूसरों की वाइसाखी पर जीवन गुजारने से स्वतंत्र होना पड़ेगा लेकिन व्यक्ति इस तरह स्वतंत्र रहना चाहता क्योकि फ्रायड के अनुसार कि ज़्यादातर लोग वास्तव में स्वतन्त्रता नाही चाहते,क्योकि स्वतन्त्रता के साथ ज़िम्मेदारी आ जाती हैं और ज़्यादातर लोग ज़िम्मेदारी से डरते हैं.यह शत-प्रतिशत सही हैं कि जिस तरह संयुक्त परिवार में निखट्टू व्यक्ति का जीवन भी गुजर जाता हैं उसे कभी अलग करके उसे जिम्मेदार नही बनाया जाता और उसे करने का विचार भी किया जाता तो वो वह अपने इस आजादपरस्त पराधीन जीवन को त्यागना नहीं चाहता ,वो समस्याओं से दर्ता हैं.हमारे यहाँ की सबसे बड़ी विडंबना व्यक्ति का अधिकांशतः जिम्मेदार ना होना काफी हद तक संयुक्त परिवार भी हैं.व्यक्ति के प्रोटोकाल बनो पर उसे अमरबेल मत बनाओं.स्वामी विवेकानंद का मत हैं कि यदि तुम आपदा के बारे में सोचते हो तो वो आ जाएगी.मौत के बारे में चिंता करते हो तो तुम अपने अंत की तरफ तेजी से बढ़ने लगते हो और स्वेच्छाचारिता से सोचो,विश्वास और निष्ठा के साथ ,तब जीवन और सुरक्शित हो जाएगा.अतः व्यक्ति को जिम्मेदाराना होना चाहिए तभी उसका सही माने में आत्मविश्वास होता हैं.पराई लाठी की टेक पर जीवन दूसरों की परछाई में जिया जीवन होता हैं.उसका स्वयं का चरित्र निर्माण ,पर दूसरों की छाया दृष्टिपात होती हैं.महात्मा आँधी के कथन को अपने जीवन में ढालना चाहिए, ‘मैं अपने मस्तिष्क में किसी को गंदे पैरों से चलकर नही आने दूंगा.
व्यक्तित्व निर्माण में व्यक्ति को अपने अंदर सकारात्मक भाव पैदा करना चाहिए.अपने आप से पूछे मैंने क्या बोया हैं?जो बोया हैं उसी के अनुरूप प्रतिफल हैं.अगर इस सच्चाई को जीवन पर्यंत अपने जीवन में आत्मसात कर लेते हैं.तो व्यक्ति को किसी से किसी भी प्रकार की शिकायत नही होती हैं लेकिन व्यक्ति जितना बोता हैं उससे अधिक प्राप्त करने की अभिलाषा रखता हैं.यही उसके दुख का मूल भूत कार्न हैं.रावर्ट लुई स्टीपेंसन का वक्तव्य हैं कि हर दिन का मूल्यांकन उस फसल से न करे जो आपने बोये हैं.व्यक्ति को अपनी काबलियत साबित करने के लिए अनेक अवसर मिलते हैं.पर वो अपने अहंकार वश उन्हे पहचान कर लाभान्वित नही हो पाता हैं.वावेनारगयूज का मानना हैं कि इंसान की महान उपलब्धि अपने अवसरों का अधिकतम लाभ उठाना और अपने संसाधनों का अधिकतम प्रयोग करना हैं.व्यक्ति मानवीय गुणों का भंडार होने के कारण भी वो उनही गुणों को जीवन में उतारता हैं जिससे वो लाभांश प्राप्त कर सके.जैसा कि हैरी एफ.बैक्स व्यक्ति को सफलता के सौपान बताते हैं-सफल होने के लिए व्यक्ति के पास योग्यता,महत्वाकांक्षा,साहस,प्रबल प्रेरणा,कड़ी मेहनत,ईमानदारी और वफादारी का प्रभावी समन्वय होना चाहिए.
व्यक्ति को अपने जीवन में नकारात्मक विचारों को दफन कर देना चाहिए क्योकि यह उसकी सफलता के रोड़े बनते हैं.व्यक्तित्व विकास में अवरूद्ध पैदा करते हैं.तभी व्यक्ति कुछ भी कैसी भी परिस्थिति का डट कर सामना कर सकता हैं.रे.ब्रेडवरी का मानना हैं कि अपने जीवन से सभी नकारात्मक लोगो को बाहर निकाल दे,वे अपना कफन खुद तैयार करते हैं.आप खुद को उनके साथ दफन किए जाने की अनुमति न दे.सत्य हैं कि सफल व्यक्ति की सफलता का राज चार्ल्स लाकमेन बताते हैं कि सफलता वही पुरानी ए बी सी अर्थात अवसर,बुद्धि और साहस .लेकिन व्यक्ति को अपनी शक्तियों में विनम्र और उचित विश्वास को आश्रय देना चाहिए.इसके बिना न सफल हो सकते हैं और ना ही खुशी ही मिल सकती हैं.
खुशी का चयन हमारे अपने पास होता हैं,तनावभरी जीवन में खुश रहने के लिए खुशी का चुनाव किया जाना चाहिए.इसके लिए व्यक्ति पराधीनता का जीवन छोड़कर स्वतंत्र जीवनयापन करे क्योकि खुश रहने का रहस्य स्वतन्त्रता हैं.और स्वतंत्र रहने के लिए व्यक्ति के साहस की आवश्यकता होती हैं.बाखरा दी ऐपलिस के कथनानुसार-हर दिन साथ खुश रहकर रिश्ते की डोर को मजबूती नही मिलती बल्कि मुश्किल घड़ियों का सामना करके और प्रतिकूल परिस्थितियों को मिलाकर धता बनाने से ही रिश्ते मजबूत होते हैं.जीवन चुनौतियों से भरा होता हैं और यही चुनौतियाँ जीवन को रोमांचक बनाती हैं और इसी से आपके जीवन का महत्व तय होता हैं.
बल्लभ भाई पटेल का कथन हैं कि यह सच हैं कि पानी में तैरने वाले ही डूबते हैं ,किनारे पर खड़े रहने वाले नही.मगर ऐसे लोग कभी तैरना भी नहीं सीख पाते.दुख के विषय में शेक्सपियर ने रिचर्ड थर्ड में कहा कि हमारे संतोष की इस शीट ऋतु को यार्क के इस पुत्र ने अब भव्य ग्रीष्म में बदल दिया हैं.यानि कि दुख का वक्त गुजर चुका हैं.मैं कामना करता हूँ कि ऐसा हम अपने देश के लिए कह सकते हैं.
ईश्वर ने हमें मानव जीवन दिया हैं इसकी कद्र करनी चाहिए,न कि मुसीबतों से भागकर,अपने आप को खत्म करना चाहिए.जैसा कि लेखिका,वरिष्ठ कथाकार,जाया सादवानी के अनुसार, ‘मृत्यु जीवन का अंत नहीं जैसा कि आम तौर पर लोग समझते हैं.यह एक ब्रेक हैं पुरानी यात्रा की थकान मिटाने और धूल झाड़ने का.अपनी गलतियों से सबक लेने और उन्हे दुरस्त करने का.’मानवीय जीवन की कद्रों की कीमत समझने और दूसरों की मदद के अवसर लेने का.अपने होने की सार्थकता में यकीन होने का,फिर एक नया रोल लेने और अपनी गलतियों से तौबा करने का.हमें अपनी कमजोरी की ताकत बनाना चाहिए लेकिन असफल व्यक्तियों में से 99% वे लोग होते हैं जिनकी आदत बहाने की होती हैं.हमारे जीवन का पर्दापर्ण में लाखों करोड़ों वर्ष लग गए यानि कि कई रूप में जन्म लेने के बाद मानव जीवन मिला हैं इससे डरना नहीं चाहिए.जीवन की इस महायात्रा के संबंध में जलालूद्दीन का कथन हैं, ‘मृत्यु हम से कुछ नहीं छीनती,बदले में कुछ देती ही हैं.’मुसीबतों का मुक़ाबला करते करते व्यक्ति अपनी मजबूत नींव तैयार करता हैं.आत्मविश्वास और दूसरों पर भरोसा बढ़ता हैं.लंबी सफलता पाने कि योजनाओं की संभावनाओं का जन्म होने लगता हैं और व्यक्ति जो मेहनत करता हैं वो उसमें सफल हो जाता हैं.उसे कारगर आशाजनक परिणाम प्राप्त होते हैं.जे.के.रालिंग के अनुसार, ‘मुसीबतों की गहराई में जाने से अच्छी नींव तैयार होती हैं.इंसान अपनी पसंद के अनुसार बड़ा या छोटा बंता हैं.यह सिर्फ उसकी क्षमता पर निर्भर करता हैं.विडंबना सबसे बड़ी यह हैं कि व्यक्ति जितनी मेहनत करता हैं उसके बदले वो अधिक परिणाम की आशा रखता हैं.को अपनी असफलता के कई कारणों को बताता हैं जबकि उसे अपनी असफलता के कई कारणों को जानकर उससे संतुष्ट होना चाहिए कि उसने जितनी मेहनत की,उसकी अपेकषा उतना परिणाम मिला हैं कि नही.मेहनत के बदले मिलने वाले परिणाम के विषय में हैनरी फोर्ड का कहना हैं कि आपको अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत करके परिणाम मिलने चाहिए .अगर महंताने के बदले कम से कम परिश्रम करना पड़े ,यह विचार ठीक नही हैं.
आपको अपने आप पर विश्वास करके अपनी संभावनाओं को क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए तभी वो कुशलतापूर्वक मेहनत करके आशानुरूप परिणाम से संतुष्ट हो सकेगा.सकारात्म्क सोच ही सफलता कि नींव हैं क्योकि आपकी सोच ,विचार आपके व्यक्तित्व आ आईना होता हैं.इस संबंध में आपरा विंफ्रेन का कथन हैं कि आप वही बनते हैं,जिसमें आपको भरोसा होता हैं.आज आप जीवन में जहां भी हैं वह आपकी मान्यताओं और भरोसे के कारण ही हैं.सफलता प्राप्त करना चाहते हैं आप फेल होगे ,फिर कोशिश कीजिये और अपनी क्षमता बढ़ाईए.व्यक्ति को अपनी मानसिक संकीर्णता रूपी घेरे से बाहर निकालकर सोच का दारा विस्तृत करना चाहिए तभी आप वो पा सकते हैं जिसका आपने शाद आशा भी ना की होगी.कुंठित सोच व्यक्ति की सोच पर जंग लगा देती हैं.जेक बेजोस के अनुसार, ‘आपको अपनी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए वो कम करना चाहिए जो आपने पहले नही किए या जिसे सोचा ही नहीं.ऐसा नहीं करके आप अवसरों को गंवा रहे हैं.अगर आप लोग टर्म के अनुसार सोचेगे तो जीवन में अच्छे निर्णय कर पाएगे ऐसे फैसले जिन पर आपको बाद में अफसोस नहीं होगा.
हर न्या दिन एक नए जीवन का आरंभ होता हैं.जीवन का खेल दरवाजे कि तरह होता हैं जब तक आप अपने जुनून और साहस की दस्तक से दरवाजा नहीं खटखटायेगे तब तक सपनों तक पहुँचने वाला द्वार नहीं खुलता हैं.जब तक नदी में डूबोगे नहीं,तब तक तैरना नहीं सीखोगे.बिना डूबे आप अपनी क्षमता का तैरने का गुण कैसे पता लगाओगे.तट किनारे तमाशा देखते रहने ,डरने से आप कभी भी अपनी मंजिल तक नही पहुँच सकते.जीवन गणित हैं,जहा जीवन की साँसे घटती हैं हर दिन जीवन जीने से प्राप्त अनुभव जुडते जाते हैं.अलग अलग अनुभवों घटनाओं को कोष्ठको में बंद करते हुये समीकरणों रूपी डायरे लगाते रहते हैं पर अंत में जीवन का अंतिम सत्य शून्य होता हैं अर्थात जीवन में कुछ ना कुछ करते हुये एक कामयाब जिंदगी जीना चाहिए.यह नही सोचना चाहिए जीवन मूल हैं वो अकर्मण्य होकर भी जीवन गुजाराजा सकता हैं.अथर्वेद में कहा गया हैं कि पूर्ण से पूर्ण का उदय होता हैं,पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा खींचा जाता हैं.
वावेना रगयूज का कथन हैं कि इंसान की महान उपलब्धि अपने अवसरों का अधिकतम लाभ उठाना चाहिए और अपने संसाधनों का अधिकतम प्रयोग करना चाहिए.हमें परिणाम को जाने बिना कारी करते रहना चाहिए.नकारात्मक को परे कर सकारात्मक सकारात्मक विचारों,सोचो,वातावरण में रहने की कोशिश करनी चाहिए.नकारात्मकता हमारी सोच को कुंड कर देती हैं.विनाश के गर्त में धकेल देती हैं.
जारी हैं..........