संसार में अच्छे-बुरे सभी तरह के इंसान होते हैं.इंसानी प्रवृति में विभिन्नता पायी जाती हैं तो प्रत्येक इंसान की मानवीय प्रवृति अलग-अलग स्वाभाविक हैं.इंसान बनना बहुत कुछ स्वयं उसके हाथ में हैं.यह भी सच हैं कि हर इंसान अपना भाग्य लेकर पैदा होता हैं.समाज में उसका स्थान बहुत कुछ भाग्य पर निर्भर करता हैं पर बहुत कुछ वह अपने भाग्य का निर्माता भी होता हैं.महत्व इस बात का नहीं हैं कि वह इंसान कितना सच्चा,ईमानदार,अच्छा हैं,उसमें जन्मजात कितने गुण हैं बल्कि यह मायने रखता हैं कि वह समाज के सामने दुनियां के सामने कितना अच्छा बनना चाहता हैं.अपनी दुष्प्रवृतियों को दूर कर अपने अंदर सदगुणों का भंडार भरना चाहता हैं.
सदा मुस्कराते रहना जिंदगी का नाम हैं.लेकिन इसका मतलब यह नही कि आप हर समय किसी भी स्थिति में अपनी मुस्कान बिखेरते रहे.माना कि कठिन परिस्थितियों में मुस्कराते रहना ही जिंदगी का नाम हैं.लेकिन जब हम समय मुस्कराते रहने में किसी व्यक्ति को आघात वो पहुंचता हैं तो हमें तत्क्षण अपनी इस आदत पर नियंत्रण रखना चाहिए.हमें दबी-छुपी जुवान से कभी नहीं हँसना छाहिए.खिलखिलाकर हँसकर वातावरण को हम हल्का भी बना सकते हैं और भारी भी.ध्यान रखने वाली बात हैं कि वातावरण की नजाकत भाँपकर ही हमें अपनी आदत को दशाना चाहिए,नही तो अर्थ-अनर्थ हो सकता है.
कार्य ही पूजा हैं.कार्य तो हम दिन-रात करते है.कार्य के बिना जिंदगी दुसवार हो जाएगी.कार्य तो जानवर भी करते रहते ।लेकिन उद्धेश्यपूर्ण. किए गए कार्य की सार्थकता होती हैं.कार्य को मन-बेमन दोनों तरह से करते हैं लेकिन सर्वोत्तम कार्य हमें तभी प्राप्त होते हैं.जब हम अपने कार्य के प्रति प्रेम करते हैं,हम अपना सौ फीसदी काम के लिए देगे.
हम डटकर अपना जीवन नहीं गुआर सकते हैं.हम खुलकर जिंदगी तभी जी पाते जब हमें किसी बात का डर न हो.सहमी हुई,डरी हुई ज़िंदगी में खुशी-गम होते हैं.अगर वास्तव में सही खुशी प्राप्त करनी हैं तो डर पर विजय प्राप्त करनी होगी.जिस बात से हमें डर लगता हैं उसके विरुद्ध ताकत ,साहस दिखाकर डर पर विजय प्राप्त की जा सकती हैं.जब हम डर पर कब्जा कर लेते हैं तो हम स्वतन्त्रता से छिपा हुआ हैं.
दया का भाव प्रत्येक व्यक्ति में होना चाहिए लेकिन वैचारिगी के प्रति दया का भाव दिखाना गलत हैं.वह उस व्यक्ति में हीन भावना भर देता हैं.दया भावना रखना,दूसरों को खुश रखना हैं.हमारी दया उसका आत्मविश्वास बढ़ाने वाली होनी चाहिए,न कि वैचारिकता जताने वाली.व्यक्ति में दया का भाव होना ही उसे खुश रखता हैं.उसे एक अजीब सी शांति की अनुभूति होती हैं.दया का भाव रखने वाला व्यक्ति समझता हैं कि आज उसने एक सर्वोत्कृष्ट कारी की परिणति की.उसे अंदर से सच्ची खुशी की अनुभूति होती हैं.
जिंदगी खुशगवार रहे इसलिए हमें हमेनशा खुश रहते हुये आस-पास का वातावरण आनंदमयी बनाते हैं.खुशी हमारे अंदर ही छिपी रहती हैं फिर भी हम मूरखों की तरह इधर-उधर तलाशते हुये अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं जो अपने अंदर सच्ची खुशी तलाश लेता हैं.वही व्यक्ति बुद्धिमान होता हैं.जैसे मृग अपने अंदर कस्तूरी छिपाए रहता हैं फिर भी वह मूरखों की तरह कस्तूरी की सुगंध के पीछे इधर-उधर पागलों की तरह भटकता फिरता हैं.
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,उसका जीवन आपसी सहयोग पर ही निर्भर होता हैं.बिना समाज का प्राणी पशु तुल्य हैं.जीवन में परिवार समाज के अलावा एक सच्चे दोस्त की जरूरत पड़ती हैं ज़िंदगी में दोस्त तो कई बनते हैं,पर सच्चा दोस्त तभी मिलता हैं जब वह दुख में साथ दे.गलत राह चलने पर सही रास्ता दिखाये यानि दोस्ती दर्पण के समान होती हैं.सच्चा दोस्त जीवन पथ पर काँटों से बचाता हैं.वास्तविकता से अवगत कराता हैं.जिस किसी के पास सच्चा दोस्त मिल गया उसे किसी ओर कि कोई जरूरत नहीं होती हैं.
शर्तों पर ज़िंदगी को जिया नहीं जा सकता .खुशियां उनसे मीलों दूर भाग जाती हैं.ज़िंदगी अपने लिए तो जियो लेकिन साथ ही दूसरों के लिए भी ज़िंदगी जिओ.दूसरों की ज़िंदगी खुशगवार बनाने में जो सच्ची खुशी मिलती हैं वह काही से भी नहीं मिल सकती.ऐसे व्यक्ति के पास खुशियां उसके चहुं ओर चहचहाती हुई विचरण करती रहती हैं.
जिंदगी हमारी सुखों-दुखों का मेला हैं.मशींगत जिंदगी किसी की भी नाही हो सकती.किसी व्यक्तित्व जीवन ठीक ठाक चल रहा,इसका मतलब वह खुश हैं ,उसने सभी दुखों को पार कर सुखमय जीवन जीना सीख लिया.बड़ी खुशियाँ ढूढ़ने में हम कई लमहेन बीटा देते हैं जबकि खुशी छोटी-छोटी बातों में रहती हैं,उन लम्हों से हम अंजान बने रहते हैं.एन.आर.आई.नील का मानना हैं कि खुशियाँ छोटे-छोटे कामों से ,बातों से मिल सकती हैं अगर हम नजर अंदाज किए हुये उन पलों को पहचान लेते हैं तो हम सबसे ज्यादा खुशगवार हो जाएगे.नील का मानना हैं कि जीवन में खुशियों के बड़े मौकों की उम्मीद करना ठीक हैं,लेकिन इस चक्कर में छोटे-छोटे लम्हों का स्वाद लेना ना भूले.उनमें वो सुकून होता हैं जो खुशी होती हैं जिनकी तलाश में एक लंबा काल तलाशने में व्यतीत कर दिया.
बिलकुल भी इंतजार न करे कि लोग आपकी खुशी के लिए कुछ करेगे जो भी खुशी आप पाते हैं,आप उसे खुद हासिल करते हैं.
खुशी एक चुनाव हैं अट्ठात खुश रहना या ना रहना व्यक्ति के हाथ में हैं उस पर निर्भर करता हैं कि वह किन बातों को लेकर खुश हो या दुखी.बड़ी-बड़ी खुशियों के चक्कर में हम छोटी-छोटी खुशियों से अछूते रह जाते हैं जो ठीक नहीं हैं.हमें खुश रहने के लिए अपने आपमे संतोषी प्रवृति लानी होगी.हमें अपने आप को खुश रखना होगा.छोटी से छोटी बातों में खुशी ढूढ़नी होगी.खुशी ही जीवन का अर्थ और उद्धेश्य हैं.मानव अस्तित्व का लक्ष्य और मनोरथ भी.लेकिन यह सच भी हैं कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन बसता हैं.लाख टके की बात आर.वी.कहावत में- ‘जिनके पास स्वास्थ्य हैं,उसके पास आशा हैं तथा जिसके पास आशा हैं,उसके पास सब कुछ हैं.’आस से आसमान होता हैं इसलिए जीवन में निराशा को पास नहीं भटकने देना चाहिए.माना मन चंचलमन हैं लेकिन उस पर भी हमें नियंत्रित करना आना चाहिए.डी.एस.आर्वत, ‘आप अंदर से चाहे कैसा भी महसूस करे पर खुद को हमेशा एक विजेता की तरह दिखाने कि कोशिश कीजिये.अगर आप पीछे भी हैं तो खुद को नियंत्रित और आत्मविश्वासी दिखाकर आपको एक मानसिक बढ़त मिल जाएगी जो आपको जीत दिला सके.’सत्य हैं कि कितनी भी घानियारी,भयावही अंधेरी रात हो पर दिन का सूरज अपना बसेरा डालता हैं.जीवन में रोशनी उस राख़ में छिपी चिंगारी की तरह हैं जो हवा का रूख पाते ही धधक उठती हैं.इसलिए कितनी भी निराशामयी अंधकार आपके जीवन को कालिमामयी कर दे.लेकिन आपको किसी भी चीज के महत्व को अनदेखा करके हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए.ऐलिनोर रूजवेल्ट ने कहा हैं कि हमारे जीवन का उस दिन अंत होना शुरू हो जाता हैं जब हम महत्व रखने वाली चीजों के बारे में शांत हो जाते हैं.क्योकि हमारी छोटी सोच ,स्वार्थ और केवल अपने लिए सोचना हमें इस प्रकृति के अनुपम सुख और ईश्वरीय योजनाओं से वंचित कर देता हैं.मानव जिस समाज में रहता हैं उसमें एकाकी जीवन गुज़ारना नामुमकिन हैं.बिना सहयोग के किसी कार्य की सुखद परिणति नहीं हो सकती.
हम सभी किसी न किसी परिस्थिति के नायक की भूमिका निभाते हैं.नेतृत्व एक कला होती हैं,एक प्रक्रिया हैं जिसमें तीन बिन्दु नायक,अनुगामी,परिस्थिति होती हैं.राल्फ वाल्डो एमर्सन का कथन हैं, ‘नायकत्व का सर केवल एक ही शब्द हैं-आपका दृढ़ विश्वास.’ हमारी नेतृत्व क्षमता हमारी सोच पर निर्भर करती हैं.हमारे मुंह से निकले शब्द और कुछ नहीं हमारे विचारों की छवियाँ होते हैं जो मौका पाकर बाहर निकालकर उन्हे परिचालित करना चाहते हैं.आत्मविश्वास इंसान का हौसला टूटने नही देता.लोगों का साथ एक पल के लिए हमारे साथ पथगामी न बने पर आत्मविश्वास के साथ हमारी उम्मीदों और सपनों का कारवां जरूर अनुगामी होना चाहिए.लोगों का साथ छूट्ने से बाहरी भौतिक वस्तुओं का खात्मा हो सकता हैं पर जब हमारी उम्मीदें टूट जाती हैं,सपने बिखर जाते हैं तो फिर कोई भी ताकत सब कुछ खत्म होने से नहीं बचा सकती.जैसा कि हैरी एफ.बैक्स का कथन हैं कि सफल होने के लिए व्यक्ति के पास योगिता,महत्वाकांक्षा,साहस,प्रबल,प्रेरणा,कड़ी मेहनत,ईमानदारी और वफादारी का प्रभावी समन्वय होना चाहिए.इन सबका धनी विवेकी स्वविवेक से निर्णय लेता हैं.
महात्मा गांधी जी ने कहा, ‘मैं अपने मस्तिष्क में किसी को भी गंदे पैरों से चलने नहीं दूंगा.’
सदा मुस्कराते रहना जिंदगी का नाम हैं.लेकिन इसका मतलब यह नही कि आप हर समय किसी भी स्थिति में अपनी मुस्कान बिखेरते रहे.माना कि कठिन परिस्थितियों में मुस्कराते रहना ही जिंदगी का नाम हैं.लेकिन जब हम समय मुस्कराते रहने में किसी व्यक्ति को आघात वो पहुंचता हैं तो हमें तत्क्षण अपनी इस आदत पर नियंत्रण रखना चाहिए.हमें दबी-छुपी जुवान से कभी नहीं हँसना छाहिए.खिलखिलाकर हँसकर वातावरण को हम हल्का भी बना सकते हैं और भारी भी.ध्यान रखने वाली बात हैं कि वातावरण की नजाकत भाँपकर ही हमें अपनी आदत को दशाना चाहिए,नही तो अर्थ-अनर्थ हो सकता है.
कार्य ही पूजा हैं.कार्य तो हम दिन-रात करते है.कार्य के बिना जिंदगी दुसवार हो जाएगी.कार्य तो जानवर भी करते रहते ।लेकिन उद्धेश्यपूर्ण. किए गए कार्य की सार्थकता होती हैं.कार्य को मन-बेमन दोनों तरह से करते हैं लेकिन सर्वोत्तम कार्य हमें तभी प्राप्त होते हैं.जब हम अपने कार्य के प्रति प्रेम करते हैं,हम अपना सौ फीसदी काम के लिए देगे.
हम डटकर अपना जीवन नहीं गुआर सकते हैं.हम खुलकर जिंदगी तभी जी पाते जब हमें किसी बात का डर न हो.सहमी हुई,डरी हुई ज़िंदगी में खुशी-गम होते हैं.अगर वास्तव में सही खुशी प्राप्त करनी हैं तो डर पर विजय प्राप्त करनी होगी.जिस बात से हमें डर लगता हैं उसके विरुद्ध ताकत ,साहस दिखाकर डर पर विजय प्राप्त की जा सकती हैं.जब हम डर पर कब्जा कर लेते हैं तो हम स्वतन्त्रता से छिपा हुआ हैं.
दया का भाव प्रत्येक व्यक्ति में होना चाहिए लेकिन वैचारिगी के प्रति दया का भाव दिखाना गलत हैं.वह उस व्यक्ति में हीन भावना भर देता हैं.दया भावना रखना,दूसरों को खुश रखना हैं.हमारी दया उसका आत्मविश्वास बढ़ाने वाली होनी चाहिए,न कि वैचारिकता जताने वाली.व्यक्ति में दया का भाव होना ही उसे खुश रखता हैं.उसे एक अजीब सी शांति की अनुभूति होती हैं.दया का भाव रखने वाला व्यक्ति समझता हैं कि आज उसने एक सर्वोत्कृष्ट कारी की परिणति की.उसे अंदर से सच्ची खुशी की अनुभूति होती हैं.
जिंदगी खुशगवार रहे इसलिए हमें हमेनशा खुश रहते हुये आस-पास का वातावरण आनंदमयी बनाते हैं.खुशी हमारे अंदर ही छिपी रहती हैं फिर भी हम मूरखों की तरह इधर-उधर तलाशते हुये अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं जो अपने अंदर सच्ची खुशी तलाश लेता हैं.वही व्यक्ति बुद्धिमान होता हैं.जैसे मृग अपने अंदर कस्तूरी छिपाए रहता हैं फिर भी वह मूरखों की तरह कस्तूरी की सुगंध के पीछे इधर-उधर पागलों की तरह भटकता फिरता हैं.
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं,उसका जीवन आपसी सहयोग पर ही निर्भर होता हैं.बिना समाज का प्राणी पशु तुल्य हैं.जीवन में परिवार समाज के अलावा एक सच्चे दोस्त की जरूरत पड़ती हैं ज़िंदगी में दोस्त तो कई बनते हैं,पर सच्चा दोस्त तभी मिलता हैं जब वह दुख में साथ दे.गलत राह चलने पर सही रास्ता दिखाये यानि दोस्ती दर्पण के समान होती हैं.सच्चा दोस्त जीवन पथ पर काँटों से बचाता हैं.वास्तविकता से अवगत कराता हैं.जिस किसी के पास सच्चा दोस्त मिल गया उसे किसी ओर कि कोई जरूरत नहीं होती हैं.
शर्तों पर ज़िंदगी को जिया नहीं जा सकता .खुशियां उनसे मीलों दूर भाग जाती हैं.ज़िंदगी अपने लिए तो जियो लेकिन साथ ही दूसरों के लिए भी ज़िंदगी जिओ.दूसरों की ज़िंदगी खुशगवार बनाने में जो सच्ची खुशी मिलती हैं वह काही से भी नहीं मिल सकती.ऐसे व्यक्ति के पास खुशियां उसके चहुं ओर चहचहाती हुई विचरण करती रहती हैं.
जिंदगी हमारी सुखों-दुखों का मेला हैं.मशींगत जिंदगी किसी की भी नाही हो सकती.किसी व्यक्तित्व जीवन ठीक ठाक चल रहा,इसका मतलब वह खुश हैं ,उसने सभी दुखों को पार कर सुखमय जीवन जीना सीख लिया.बड़ी खुशियाँ ढूढ़ने में हम कई लमहेन बीटा देते हैं जबकि खुशी छोटी-छोटी बातों में रहती हैं,उन लम्हों से हम अंजान बने रहते हैं.एन.आर.आई.नील का मानना हैं कि खुशियाँ छोटे-छोटे कामों से ,बातों से मिल सकती हैं अगर हम नजर अंदाज किए हुये उन पलों को पहचान लेते हैं तो हम सबसे ज्यादा खुशगवार हो जाएगे.नील का मानना हैं कि जीवन में खुशियों के बड़े मौकों की उम्मीद करना ठीक हैं,लेकिन इस चक्कर में छोटे-छोटे लम्हों का स्वाद लेना ना भूले.उनमें वो सुकून होता हैं जो खुशी होती हैं जिनकी तलाश में एक लंबा काल तलाशने में व्यतीत कर दिया.
बिलकुल भी इंतजार न करे कि लोग आपकी खुशी के लिए कुछ करेगे जो भी खुशी आप पाते हैं,आप उसे खुद हासिल करते हैं.
खुशी एक चुनाव हैं अट्ठात खुश रहना या ना रहना व्यक्ति के हाथ में हैं उस पर निर्भर करता हैं कि वह किन बातों को लेकर खुश हो या दुखी.बड़ी-बड़ी खुशियों के चक्कर में हम छोटी-छोटी खुशियों से अछूते रह जाते हैं जो ठीक नहीं हैं.हमें खुश रहने के लिए अपने आपमे संतोषी प्रवृति लानी होगी.हमें अपने आप को खुश रखना होगा.छोटी से छोटी बातों में खुशी ढूढ़नी होगी.खुशी ही जीवन का अर्थ और उद्धेश्य हैं.मानव अस्तित्व का लक्ष्य और मनोरथ भी.लेकिन यह सच भी हैं कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन बसता हैं.लाख टके की बात आर.वी.कहावत में- ‘जिनके पास स्वास्थ्य हैं,उसके पास आशा हैं तथा जिसके पास आशा हैं,उसके पास सब कुछ हैं.’आस से आसमान होता हैं इसलिए जीवन में निराशा को पास नहीं भटकने देना चाहिए.माना मन चंचलमन हैं लेकिन उस पर भी हमें नियंत्रित करना आना चाहिए.डी.एस.आर्वत, ‘आप अंदर से चाहे कैसा भी महसूस करे पर खुद को हमेशा एक विजेता की तरह दिखाने कि कोशिश कीजिये.अगर आप पीछे भी हैं तो खुद को नियंत्रित और आत्मविश्वासी दिखाकर आपको एक मानसिक बढ़त मिल जाएगी जो आपको जीत दिला सके.’सत्य हैं कि कितनी भी घानियारी,भयावही अंधेरी रात हो पर दिन का सूरज अपना बसेरा डालता हैं.जीवन में रोशनी उस राख़ में छिपी चिंगारी की तरह हैं जो हवा का रूख पाते ही धधक उठती हैं.इसलिए कितनी भी निराशामयी अंधकार आपके जीवन को कालिमामयी कर दे.लेकिन आपको किसी भी चीज के महत्व को अनदेखा करके हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए.ऐलिनोर रूजवेल्ट ने कहा हैं कि हमारे जीवन का उस दिन अंत होना शुरू हो जाता हैं जब हम महत्व रखने वाली चीजों के बारे में शांत हो जाते हैं.क्योकि हमारी छोटी सोच ,स्वार्थ और केवल अपने लिए सोचना हमें इस प्रकृति के अनुपम सुख और ईश्वरीय योजनाओं से वंचित कर देता हैं.मानव जिस समाज में रहता हैं उसमें एकाकी जीवन गुज़ारना नामुमकिन हैं.बिना सहयोग के किसी कार्य की सुखद परिणति नहीं हो सकती.
हम सभी किसी न किसी परिस्थिति के नायक की भूमिका निभाते हैं.नेतृत्व एक कला होती हैं,एक प्रक्रिया हैं जिसमें तीन बिन्दु नायक,अनुगामी,परिस्थिति होती हैं.राल्फ वाल्डो एमर्सन का कथन हैं, ‘नायकत्व का सर केवल एक ही शब्द हैं-आपका दृढ़ विश्वास.’ हमारी नेतृत्व क्षमता हमारी सोच पर निर्भर करती हैं.हमारे मुंह से निकले शब्द और कुछ नहीं हमारे विचारों की छवियाँ होते हैं जो मौका पाकर बाहर निकालकर उन्हे परिचालित करना चाहते हैं.आत्मविश्वास इंसान का हौसला टूटने नही देता.लोगों का साथ एक पल के लिए हमारे साथ पथगामी न बने पर आत्मविश्वास के साथ हमारी उम्मीदों और सपनों का कारवां जरूर अनुगामी होना चाहिए.लोगों का साथ छूट्ने से बाहरी भौतिक वस्तुओं का खात्मा हो सकता हैं पर जब हमारी उम्मीदें टूट जाती हैं,सपने बिखर जाते हैं तो फिर कोई भी ताकत सब कुछ खत्म होने से नहीं बचा सकती.जैसा कि हैरी एफ.बैक्स का कथन हैं कि सफल होने के लिए व्यक्ति के पास योगिता,महत्वाकांक्षा,साहस,प्रबल,प्रेरणा,कड़ी मेहनत,ईमानदारी और वफादारी का प्रभावी समन्वय होना चाहिए.इन सबका धनी विवेकी स्वविवेक से निर्णय लेता हैं.
महात्मा गांधी जी ने कहा, ‘मैं अपने मस्तिष्क में किसी को भी गंदे पैरों से चलने नहीं दूंगा.’
जारी हैं.........