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बुधवार, 16 अगस्त 2017

         ऐसी थी मेरी माँ
ब्रह्माण्ड की अद्भुत काया ,जिसमे संसार समाया,
सौभाग्य हमारा ,हम पर उनकी छत्र छाया.
जन्म लेते ही माँ......शब्द निकलता,
रिश्तों से बदकर,बनता अटूट रिश्ता.
दुनियां हैं सतरंगी,माँ तेरे रूप भी अनेकारंगी,
हर काम में पारंगत कर ,हर मोड़ पर साथ दिया,
शिक्षिका बन,जमाने की बुराई से महफूज रखा,
व्यंग्वानों से दिल आघात हुआ,
वैध बन प्यार का मलहम लगाया.
मेरी अनैतिकता से होती कभी होती दुखित,
तो सिपाही के माफिक करती दण्डित.
उदासमन में प्रसन्नता के गुब्बारे भरने में,
संदेशवाहक भी बन जाती.
सलाहकार बन,जूझती शंकाओं से उबारती,
भविष्य के सुंदर-सुंदर सपने सजोती.
रोने पर कोकिला बन मीठी लोरी सुनाती,
लोरी के संग ,कहानी-किस्से भी गड़ती.
ऐसी थी हरफनमौला माँ,तेरा-मेरा रिश्ता था अलबेला.
अद्भुत गुणों से जडित ,वह थी साक्षात स्वरूप सी भगवान ,
धन्य हुई मैं !तुझे करते साष्टांक प्रणाम !!!!!!!!!!!


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