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शनिवार, 19 अगस्त 2017

“जिंदगी गडित का एक सवाल हैं”


  • हमारी जिंदगी गडित का एक सवाल की तरह होती हैं, जिसमें सम -विषम संख्याओं की तरह उलझनों से भरे सवाल हैं.जीवन में सामंजस्य बिठाने के लिए हमें गुणा - भाग लगाना पड़ता हैं, तो कभी कभी जोड़ -वाकी करना पड़ता हैं.लेकिन फिर भी हमारे स्तर में दूरिय बनी रहती हैं.कोई छोटे कोष्ठक में जीवन जीता हैं ,तो कोई मंझले कोष्ठक में जीवन जीता हैं,तो कोई बड़े कोष्ठक के दरमियान.हमारे सामाजिक -नैतिक मूल्य किसी से बड़े तो किसी से छोटे होते हैं.हम सब बराबर का दर्जा दिलाने में चूंकि ,इसलिए का तर्क-वितर्क करते रहते हैं.जिंदगी हमारी लघुत्तम हो या महत्तम ,हमारी कोशिश समावर्तक जीवन जीनें की होती हैं.रिश्तें हमें क्रय -विक्रय करके या लाभ -हानि को ध्यान में रखकर नहीं बनाना चाहिए और न ही हमें यह सोचना चाहिए कि इतने व्याज की दर से इतने रिश्तें बनाये और इतने प्रतिशत हमारे भाग्य में आया.मह सभी को अनुपात-समानुपात वाली भावना का उद्गम करना चाहिए,न कि व्यत्कामानुपाती में उलझ जाना चाहिए.क्योकि हमारी समस्याएं फील्ड वर्ग में फैली हुई हैं,जिनका समाधान ढूढने में प्रमेय को हल करने जैसे  पेज भर जाते संसार हैं,जिसमें हम गुजरे हुए लम्हों को मिटाकर  ,एक नव जीवन के सुखमय ,आनन्दमयी सपनों को रेखांकित कर देते हैं.फिर उसमे चाहे दुखों का न्यूनतम कोण हो या सुखों का अधिकतम कोण या फिर ठहराव भरी जिन्दगी समकोण या फिर डूबते-उतराते जीवन का विषम कोण.आसन्न कोण की तरह हम अपने जीवन में हर उस पल में समता लाने की कोशिश में लगे रहते हैं.फिर भी हमारा जीवन बीज गडित की तरह कठिन व् विकट हो जाता हैं और हम किसी एक बिंदु पर स्थिर हो जाते हैं.हमारी जीवन शैली रेखाखंड की तरह खंड-खंड होकर छितर-बितर हो जाती हैं.फिर भी हम उस स्थिर बिंदु से अनगिनत रेखाएं खींच कर उसमें अपना अस्तित्व तलाशने की कोशिश में लगे रहते हैं.कुछ तो भिन्न सवालों की तरह उलझ कर रह जाते हैं,तो कुछ दशमलव की तरह नैया पार लगाने में सफल हो जाते हैं और कुछ जीवन के बिखरे हुए आंकड़ो का पाएथागोरस ढूढने में कामयाबी हासिल करने में सफल रहते हैं.जीवन के ग्राफ पेपर पर लाल-हरी सुख-दुःख की लकीरें खींच कर ऐसे आकर्षक विभिन्न आक्रतियो ,जो चाहें गोल हो या स्तंभों में,अपने प्रभावी प्रस्तुतीकरन से पराकाल ,गुनिया,तिकोनें को पीछें छोड़ चाँद की तरह चमकते हैं.जिन्दगी की रफ्तार पत्री पर दौड़ने लगती हैं,जिस पर नटराज पेंसिंल से मीलों दूर तक तकदीर बदलने वाली रेखाए खीचतें हुए जिन्दगी को वर्गमूल ,घनमूल  बनाते हुए अनंत सुखों का पहाड़ खड़ा कर पाते हैं .यानि हमारा पूरा जीवन गडित के सवालों की तरह उलझा-सुलझा रहता हैं ,जिसकी उत्तरावली कभी हमारे पास होती हैं तो कभी उनके जबावो पर प्रश्न चिह्न अनन्तकाल तक लगा रहता हैं. 

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