मन
ही मन बुदबुदाते हुए सब्जी मंडी पहुंच गई।घर में राशन के नाम पर कुछ नहीं बचा था,
सोचा कुछ फल से काम चला लूंगी।लेकिन सब्जी मंडी पहुंच कर देखा, दाम आसमान छू रहे
थे।गांठ खोलकर देखा तो गरीबों का आलू खरीदने लायक रूपये भी नहीं थे।कहीं कुछ इतने
पैसों में मिल जाने के चक्कर में एक दुकान से दूसरी दुकान, एक ढेले से दूसरे ढेले
में तलाशती हुई मंदिर प्रांगण में चली गई।भजन कीर्तन चारों तरफ गूंज रहे थे।अंदर
पहुंचने पर मालुम हुआ कि आज निर्जला एकादशी का व्रत हैं।इतना सुन मस्तिष्क में
विचार कौंधा, क्यों न आज निर्जला व्रत ककर लिया जाए।इस मंहगाई के जमाने में यही
युक्ति सही है।गांधी जी का उपवास' लेख स्मरण हो आया।वैसे भी वैज्ञानिक
कारण भी है।दिमाग की भी तार्किक शक्ति जाग उठी।उपवास का मन बना मंदिर से बाहर
निकली, तो बाहर भीख मांगने वालों की भीड एकत्रित थी।अगर ये लोग भगवान के आसरे रहकर
जीवन गुजार सकते हैं ,उनके अंध भक्त बनते हैं तो क्यों नहीं इसी भगवान के नाम पर
आज निराहार व्रत क्यों नहीं रख लिया जाए? वैसे भी भीमसेन एकादशी व्रत का नाम ही
अपने आप में दमदार है।ईश्वरीय शक्ति का दृढ संकल्प किए गांठ में बंधे रूपये पास
में बैठे भिखारिन के कटोरे में डालें तो उसकी आंखों में ऐसी चमक आई जैसे आज उसके
भूखे पेट का इंतजाम हो गया हो।उसके चेहरे के तृप्त भाव देख मन एक अजीब से शकुन में
डूब गया।भूख का कहीं नामोनिशान भी न था।ऐसा लगा जैसे एक भरपेट की डकार आ गई।
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