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सोमवार, 21 मई 2018


जिन्दगी क्या????एक हलवाई की दूकान......

इस मायावी दुनिया में भाँती -भांति के लोग,
सबकी अपनी जिन्दगी,कोई अदरक तो कोई सोंठ,
किसी की जगह आलू जैसी,तो कोई थाली का बैगन,
अहमियत होती सबकी अपनी,जैसे व्यंजनों में नोन,
रसगुल्ले का रस-सा घोलती माँ की प्यारी लोरियां,
पेड़े पर छपी चन्द्र कलाएं जैसी बच्चों की ह्ठ्खेलियाँ,
गुझियाँ -सा बंधा परिवार में बड़ों का अनुशासन,
वही रसमलाई का रिश्तों में घुलता अपनापन,
मुस्कान लाती चेहरे पर,बाते चटपटी समोसे जैसी दोस्त-यारों की,
उबली दाल जैसे नीरस जीवन में,रंगीन मसालों का तडका लगाती,
ढकोसले लोगो की लोलुपता में जलेबी की चाशनी टपकती,
मतलबियों कीबातें,टेडी-मेढ़ी ,गोल-गोल इमरती-सी,
सोनपापड़ी,गजक पट्टी -सा जीवन भर संघर्ष करते जाते,
फिर भी, 'ऊंची दुकान ,फीके पकवान-सा' जीवन जीते,
मिक्स दाल रूपी जीवन में , 'शुद्ध घी'का बघार लगा दिया,
फिर भी,'मोती चूर के लड्डू'की तरह जीवन बिखर गया,
जीवन के रस हैं - मीठा,नमकीन,खट्टा,तीखा,कडवा,

पंचरस मिश्रित स्वाद हैं,सबका 'अपनी-अपनी जिन्दगी का'
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