महिलाओं की स्वतन्त्रता की वकालत करने वाले राजाराम मोहन रॉय ने समाज में महिलाओं को उचित स्थान देने का दृढ संकल्प कर,सम्पति पर हिन्दू महिलाओं के अधिकार की वकालत की.मनुष्यों की सामाजिक समानता में विश्वास करने वाले रॉय साहव ने भगवान की एकता के सिद्धांत का पालन करने की अपील कर लोगो को विवेक द्वारा निर्देशित करने की सलाह दी.सन १८२८ में ब्रह्म समाज की स्थापना के द्वारा सामाजिक बुराईयों को मिटाने वाला बौद्धिक सुधार आन्दोलन था.सभी धर्मों की एकता में विश्वास करने वाले ब्रह्म समाज का मुख्य उद्देश्य शाश्वत भागवान की पूजा था.देश में सामाजिक सुधार आन्दोलन के अग्रदूत रॉय साहब के प्रयासों से गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बैटिनक द्वारा सं १८२९ में सती प्रथा को खत्म करने का नेतृत्व किया.
स्वतंत्र पत्रकारिता के जनक राजाराममोहन रॉय का जन्म २२ मई, सन १७७२ में बंगाल के एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था.सात प्रकार की देशी -विदेशी भाषाओं का घान रखने वाले कुशाग्र बुद्धि वाले रॉय ने नारी उद्धार के अनेक प्रयास से सन १८२८ में सती प्रथा जैसी अमानुषिक प्रथा को समाप्त करने का कानून बनाया गया.विधवा विवाह का समर्थन करने वाले रॉय के व्यक्तित्व व द्रष्टिकोण पर पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव स्पष्ट द्रष्टिगोचर होता हैं.धर्म सहिष्णु रॉय सभी स्नस्क्रतियों में समन्वय में विश्वास रखते थे.
कर्म नही क्रांति में विश्वास करने वाले रॉय साहब रूढ़िवादी कट्टरता ,कुप्रथाओं के विरोधी जरूर थे लेकिन भारतीय परम्परा,संस्कार और देश के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे.आधुनिक भारतीय समाज के समर्थक रॉय ने बंगाल के नवजागरण युग के पितामह थे.स्वदेश प्रेम,अशिक्षितों और निर्धनों से अत्यधिक प्रेम करने वाले रॉय ने लोगों को शिक्षित कर उनमे राजनीतिक जाग्रति की भावना के प्रति प्रोत्सहित किया तथा नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में यथासम्भव प्रयत्न किये.सभी धर्मों की मौलिक सत्यता और एकता में विश्वास करने वाले वे सत्य के अन्वेषक थे.भारतीय मामलों पर परामर्श ब्रिटिश संसद द्वारा लिए जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे.रॉय साहब की म्रत्यु २३ सितम्बर,१८३३ में मेनिन्जेतिस बीमारी से यात्रा के दौरान ब्रिटेन के ब्रिस्टल नगर में हुई थी.
स्वतंत्र पत्रकारिता के जनक राजाराममोहन रॉय का जन्म २२ मई, सन १७७२ में बंगाल के एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था.सात प्रकार की देशी -विदेशी भाषाओं का घान रखने वाले कुशाग्र बुद्धि वाले रॉय ने नारी उद्धार के अनेक प्रयास से सन १८२८ में सती प्रथा जैसी अमानुषिक प्रथा को समाप्त करने का कानून बनाया गया.विधवा विवाह का समर्थन करने वाले रॉय के व्यक्तित्व व द्रष्टिकोण पर पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव स्पष्ट द्रष्टिगोचर होता हैं.धर्म सहिष्णु रॉय सभी स्नस्क्रतियों में समन्वय में विश्वास रखते थे.
कर्म नही क्रांति में विश्वास करने वाले रॉय साहब रूढ़िवादी कट्टरता ,कुप्रथाओं के विरोधी जरूर थे लेकिन भारतीय परम्परा,संस्कार और देश के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे.आधुनिक भारतीय समाज के समर्थक रॉय ने बंगाल के नवजागरण युग के पितामह थे.स्वदेश प्रेम,अशिक्षितों और निर्धनों से अत्यधिक प्रेम करने वाले रॉय ने लोगों को शिक्षित कर उनमे राजनीतिक जाग्रति की भावना के प्रति प्रोत्सहित किया तथा नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में यथासम्भव प्रयत्न किये.सभी धर्मों की मौलिक सत्यता और एकता में विश्वास करने वाले वे सत्य के अन्वेषक थे.भारतीय मामलों पर परामर्श ब्रिटिश संसद द्वारा लिए जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे.रॉय साहब की म्रत्यु २३ सितम्बर,१८३३ में मेनिन्जेतिस बीमारी से यात्रा के दौरान ब्रिटेन के ब्रिस्टल नगर में हुई थी.