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सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

परिवर्तन के पहलू विचाराधीन-नारीमहिमा ........               
 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस,महिला सशक्तिकरण दिवस,महिला अधिकार,महिला आरक्षण यह शब्द जितने कागजों पर सकारात्मक का प्रतीत होते दिखाई देते हैं,उतने ही व्यवहारिकता से प्रे.इन शब्दों ने महिला समाज को अभिव्यक्ति का नया अवसर जरूर प्रदान किया हैं लेकिन उतनी महिला सशक्ता की छवि द्रष्टिगोचर नहीं हुई हैं.आखिर ऐसा क्यों?आधुनिक समाज में महिला पुरः की समानता,सोच,छवि में काफी बदलाव आया हाँ,फिर भी आज महिलाओं पर अत्याचार,अन्याय,शोषित बिम्ब में प्रतिशतता कम जरूर हुई हैं पर आशाजनक सुधार नहीं हुआ हैं.महिला दिवसों के दिन सालभर का लेखा-जोखा ,उल्लेखनीय मुद्दोंपर बहस,पिछड़े कामों का विश्लेष्ण कर इति श्री कर दी जाती हैं.दिवसों के नजदीक आते ही अभियान तेजी पकड़ लेते हैं.नारी साक्षरता,आर्थिकता,आधुनिकता,स्वतन्त्रता,समानता जैसे कई बिन्दुओं पर विचार बनने लगते हैं औरइसमे पुरुष वर्ग भी आगे जाकर अपना मतलब सिद्ध करने लगते हैं. दिवस के सूर्यास्त होते ही ग्रहण लग जाता हैं,स्थितियां यथापूर्ण बन जाती हैं.जो कुछ प्रतिशत महिलाएं प्रेरित होकर आगे कदम बढाती हैं और उन्हें वो ही बढाने वसले प्रेरक पीछे धकेलने में लग जीते हैं.नतीजन कुछ एक प्रतिशत नतीजा उद्धेश्यपरक सिद्ध होते हैं.इन उद्धेश्य्परक सिद्ध महिलाये अपने गुरूर में यह भी भूल जाती हैं कि हम भी कभी उन असफल महिलाओं की लाइन में खड़े थे.कहने का तात्पर्य यह हैं कि अगर अस्तित्व प्रधान महिलाएं,इन असफल महिलाओं के साथ आगे आये,उनकी समस्याओं का समाधान करे,न कि तानाकशी और अपनी योग्यता बखान करे.तो शायद परिवर्तन लाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.दिवस मनाना सार्थक तभी होगा जब हम हर दिन को दिवस की तरह मनाएं.प्रत्येक महिला –पुरुष को दिवस समाप्ति में आत्मचिंतन करना चाहिए.आपस में विचार विमर्श कर निष्कर्ष निकलना चाहिए कि आज हमने अपने में या समाज में या शोषित महिला वर्ग के लिए क्या काम किया और क्या कर सकते थे?तो क्यों नहीं कर पाए?जब हम आप सब इस तरह का आत्म मंथन करेगे तो सकारात्मक फल साक्षात होगा और मानवीयता और लग्न से किया गया कोई भी विचारबिन्दु यूं ही नष्ट नहीं होगा अर्थात हमें अपने आपको स्वयं भी पढ़ना होगा.हालांकि हम दूसरों के विचारों,कार्यों से प्रेरित होते हैं,लेकिन यह प्रेरणात्मक स्त्रोत चंद मिनट या दिनों बाद विस्मृत या अद्रश्य हो जाते हैं.ऐसे में सुधारात्मक प्रयास कोसों दूर छिटक जाते हैं.केवल भाषण वाजी या लेखन पठन से सुधार करना असम्भव ही नहीं,मुश्किल भी हैं.इसलिए हमे एक मजबूत,दृढ संकल्पित .अडिग विचार बिंदु पर अपने आपको गढना हैं और उन राहों पर चलकर उद्धेश्यात्म्क सुधार पर पहुँचना हैं,तभी इन दिवसो को सही अर्थों में परिणति होगी.एक नहीं,सौ नहीं,बल्कि सभी को आत्म सुधार,आत्मचिंतन व मंथन कर दूसरों की राहों को आसान बनाकर मील का पत्थर होना होगा.हालांकि सदियों पुरानी कुंठित सोच,संकीर्ण विचारों के तात्कालिक परिणामों की आशा के मद्देनजर हताश होकर मैदान नहीं छोड़ना हैं,बल्कि रास्ते में आयें बबूल के काँटों को हटाकर मखमली रास्ता बनाना हैं.क्योकि रीतिरिवाज गुलाब के वृक्षों की तरह होते हैं.हमें एक कुश्ल्माली की तरह चुनचुनकर फूलों का रास्ता बनाना हैं.इस क्षेत्र में कैक्टस की तरह भेदनशील रीतिरिवाज,रूनिवादी पुरातन समाज का पुरुष वर्ग हैं,जो केवल कैक्टस के फूल रूपी महिलाओं को अपनी काँटों रूपी दबंगता से चीरते-फाड़ते हुये अपने रस्ते से हटाता है और काँटों की आड़ में उसके अस्तित्व को दबाने से पीछे नहीं हटता हैं जबकि वह नहीं जनता हैं कि फूल के बिना काँटों का कोई अस्तित्व नकारा हैं.ठीक उसी तरह समाज में बिना स्त्री के पुरुष का कोई वर्चस्व नहीं.चाहे नर्क लोक के महिला पुरुष हो या स्वर्ग लोक के देवी देवता.   

                                                                                                                                     जारी हैं........................................... 



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