नारी महिमा .......
महिला आरक्षण की अनिवार्यता
और प्रतिक्रियाएं - प्राचीन समाज में प्रचलित मान्यताओं पर कानूनों को अनुशासनात्मक व्यवस्था के
रूप में लागू कर एक स्वस्थ व सुद्रढ़ समाज की स्थापना हेतु १५ अगस्त,१९४७ की आजादी
के तत्पश्चात नवीन समाज को नया सम्बिधान २६ जनबरी,१९५० को दिया जिसमे भारतीय
संबिधान की धारा ३७ से ५१ तक नीति निर्देशक तत्व दिए गये जो इसी तत्वाधान में इसी
द्रष्टि से सरकार न्र महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक उत्थानार्थक प्रयास किये गये ,जिससे
महिलाएं उन्हें दिए गये अधिकारों से लाभान्वित होकर अपनी समाज में परम्परागत
स्थिति से बाहर निकलकर एक नया मुकाम हासिल करे
और अपनी गुमनामी जिन्दगी को एक नई पहचान के रूप में स्थापित करे जिससे अन्य
महिलाये के लिए प्रेरणादायी बने ,जो घर की चाहरदीवारी में कैद होकर अपना जीवन यापन
कर रही हैं.
इतिहास में यह प्रथम अवसर हैं जब
१९९२ में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में अन्य वर्गो के अतिरिक्त महिलाओं को
एक तिहाई आरक्षण दिया गया.हालांकि २१ वी सदी में प्रवेश कर चुकी महिलाओं की आधी
आबादी होने के बावजूद अस्तित्व की समस्या से जूझ रही हैं.ऐसा राष्ट्र कभी भी आगे
नहीं बढ़ सकता,जो आधा आजाद हो,आधा गुलाम.२२ यद्यपि भारत में अनेक समाज
सुधारकों व महात्मा गांधीजी ने महिलाओं की दशा सुधरने के लिए क्रांतिकारी कदम
उठायें.महिलाओं को नई दिशा देना चाहते थे.उन्होंने अनेक सामाजिक बुराईयों को निंदा
की तथा महिलाओं की स्थिति सुधारने पर जोर दिया.२३ महिलाओं के सम्बन्ध
में उदध किया कि स्त्री को अबला कहना उसकी मानहानि करना हैं.उसके प्रति घोर अन्याय
हैं.राजनीतिकों पुरुष एकाधिकार व्रत का रूप माना हैं कि यह स्पष्ट हैं कि पुरुषत्व
,राज्य एवं राजनीति में सीधा सम्बन्ध हैं.२४ भारतीय महिला को अपने
अधिकारों के लिए अन्य देशो की अपेक्षा समानाधिकार के लिए ज्यादा संघर्ष नहीं करना
पड़ा जबकि ऐसे अधिकार की प्राप्ति के लिए पश्चिमी देशों की नारियों को बहुत लम्बे
समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ी.२५ स्वयं गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रमों
में स्त्रिया एवं हरिजनों की समस्याओं का समावेश करके राजनीति एवं समाज सुधर को एक
सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया.२६ जिसमे भारतीय नारी घोर
उदासीनता के स्तर से उठकर अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सचेत हुई.२७ फिर
भी वर्ष १९५२-९३ में संयुक्त राष्ट्र संघ की महिलाओं के राजनीती योगदान सम्बन्धी
रिपोर्ट में विचारणीय तथ्य सामने आया कि राजनीति में महिला ने सचेत और सक्रिय रूप
से बहुत नगण्य योगदान दिया.विधानसभा को राजनीतिक दलों एवं महत्वपूर्ण नीति निर्माण
में महिला की विशेष भूमिका नहीं रही.२७ भारत देश में कानून की गति
सामाजिक रूढ़ियों से पिछड़ी हुई हैं.भारतीय समाज में राजनीती का क्षेत्र महिलाओं के
लिए कमजोर और अक्षम मना जाने के कारण व्यवस्थापिका में महिलाओं के लिए स्थान
सुरक्षित कर कुछ सीमा तक अधिकारों के इस असंतुलन को कम किया जा सकता हैं.२८
पुरुषों की यह धारणा कि
महिलायों ने अपने जीवन पर स्वयं निर्णय नहीं ले सकती,वह आरक्षण की शक्ति को किस
प्रकार पहुचायेगी.मध्यकाल में नारी की इस प्रासंगिता को नकार कर नव गठित पंचायती
राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किया क्योंकि इनके सर्वागीर्ण
विकास के लिए बनने वाली योजनाये समग्रता के अभाव में व एकांकी होने के कारण अमल के
समय क्षेत्र विशेष में उनकी निस्सारता पता चली या वे फाईलें खो गई.अत: महिलाओं की
व्ह्तुर्दिक उन्नति के लिए स्व.राजीव गाँधी जी ने नए सोच के साथ महिला कल्याण को
लिया और आहरण किया कि जब महिलाओं को विशेष आरक्षण देकर नहीं बनाया जाएगा,तब तक
हमारी साडी कल्याणकारी योजनायें नस्ती-दर-नस्ती घूमती रहेगी.नस्ती की मंशा के
अनुरूप उनका लाभ गाँव की बस्ती में रहने वाले कमजोर वर्ग की महिलाओं को नहीं मिल
पा रहा हैं.२९
इस तरह महिला आरक्षण व्यवस्था
से महिलाएं घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर संसद तक पहुंचकर अपनी अस्मिता का
परिचय दिया.सं १९५२ के समय में महिलाएं आंगन भर धरती और खिड़की भर धूप की
चाहरदीवारी में पुरुष प्रधान समाज के कहेने में थी.घरों और समाज में वे उपेक्षित
रहती थी.न उन्हें स्वास्थ की चिंता थी और न ही विषय की.आजादी की अर्ध शती बीत जाने
पर महिलाएं सबला बनकर उभरी और मेरी भी यही कोशिस रहेगी कि महिलाएं सम्रद्ध शाली
बने.उनको न केबल समाज में बराबर का दर्जा मिले बल्कि उनकी समाज में निर्णायक
भूमिका हो.३० लेकिन उसकी उपयोगिता तभी सिद्ध होगी उसका आसफ अली के
विचारानुसार महिला मताधिकार एक आभूष्ण से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं.इस अधिकार के
साथ उतरादायित्व भी जुड़ा हुआ हैं कि जिसके लिए सचेत रहना हैं.३१ इस तरह
म.प्र.पंचायत राज अधिनियम,१९९३ में स्पष्ट किया कि पंच सदस्यों के लिए ग्राम
पंचायतों में महिलाओं के लिए स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक तिहाई स्थान
खंड-१३[६] के अनुसार आरक्षित हैं.जनपद पंचायतों में महिलाओं के लिए स्थानों की कुल
संख्या के कम से कम एक तिहाई खंड-२३[४] में उल्लेखित नियमानुसार आरक्षित हैं.इसी
तरह जिला पंचायतों में महिलाओं के लिए स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक तिहाई
स्थान खंड-३०[५] के आधार पर आरक्षित किये गये हैं.३२ इसी तरह भारत
सरकार द्वारा समाज के निम्न व निर्धन वर्ग की महिलाओं के लिए प्रायोजित विकास
कार्यक्रमों में महिला आरक्षण की व्यवस्था की गई हैं.इसके अलावा सरकारी नौकरियों
में भी नौकरी में आयु सीमा में छूट दी गई हैं.
महिलाओं में चेतना जाग्रत करने व
महिलाओं को पर्दे से बाहर उन्हें नवजीवन की प्रेरणा महात्मा गांधीजी ने दी.आजादी
के समय तक महिलाओं को राजनीति में अआने के लिए मतदान का अधिकार मिलने पर भी
राजनीती में महिलाओं का ग्राफ ऊँचा नहीं पाया गया.आजादी के इतने वर्षों बाद भी ६.८
या १०%से ही महिला प्रतिनिधित्व को संतुष्ट होना पड़ा.विकसित देशों से लेकर गरीब
देशों तक में महिलाओं की स्थिति अप्रत्याशित परिवर्तन हुए.स्वतन्त्रता आन्दोलन से
जुडी अरुणा आसफ अली ,विजय लक्ष्मी पंडित,सरोजनी नायडू और कस्तूरवा गांधी जैसी अनेक
महिलाओं को सक्रिय भूमिका होने पर भी वर्ष १९७७ के लोकसभा चुनाव में बहुत कम
महिलाओं को टिकट मिला.
महिलाओं के लिए सर्वथा अछूते
समझे जाने वाले क्षेत्र राजनीती में महिलाओं ने न सिर्फ कदम रखा बल्कि अपने आपको
समर्थ सिद्ध किया.भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री स्व.चौधरी चरण सिंह जी के मुताबिक
औरत का राजनीति से कोई रिश्ता नहीं हैं,उसे रसोई में ही काम करना चाहिए.ऐसा
वक्तव्य देने पर भी उन्होंने अपनी पत्नी को पांच बार चुनाव लड़वाया.बहुजन समाजवादी
पार्टी के नेता मायावती ने उ.प्र. की ८५ सीटों में से सिर्फ तीन पर ही महिला
उम्मीदवार खड़े किये.अन्नाद्रुक की दबंग नेता जयललिता जिन्होंने अपनी पार्टी सन्गठन
के भीतर महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण व्यवस्था संसद विधान सभा में दिए जाने व
सरकारी सेवाओं में महिला संख्या पर जोर दिया.
ग्राम परिवेश की महिलाएं ग्राम्य
जीवन की धुरी व बुनियादी और प्रभावी भूमिका निर्वाह करती हैं इसलिए महिलाओं की और
अधिक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विकास कार्यक्रमों में आरक्षण व् त्रिस्तरीय पंचायती
राज व्यवस्था में एक आरक्षण व्यवस्था की गई.महिला आरक्षण का समर्थन करने से युग
में व्याप्त अनाचार का विकट दुर्ग महिलाओं को सक्रिय रूप से और अधिक संख्या में
राजनीति में लाने और आरक्षण देने से ही हटेगा.३३ आज युग की जागरूकता और
नारी प्रगति के बावजूद भी महिलाओं की राजनीती में भागीदारी कम हो रही हैं.३४ समाज
में महिलाओं का नारी योगदान होने के कारण महिलाओं के अनुरूप उन्हें किसी भेदभाव के
समान अवसर और दर्जा मिलना चाहिए.सरकार ने प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं को
राजनितिक समानता और सत्ता में भागीदारी देने की कोशिस सराहनीय हैं लेकिन सामाजिक
और आर्थिक स्वतन्त्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतन्त्रता खतरे में पड़ सकती
हैं.इसलिए जरूरी हैं कि महिलाओं की राजनितिक अधिकारों के स्वतन्त्रतापूर्वक उपभोग
के लिए अनुकूलन सामाजिक आर्थिक परिवेश मिले.जहा तक सरकार चलाने में महिलाओं की
भागीदारी का मामला हैं.इससे न केवल उनके सामाजिक हालत सही होगे,बल्कि भारतीय
लोकतंत्र भी मजबूत होगा.३५
महिला आरक्षण विधेयक
अनिवार्य हैं एवं महिलाओं के हित में हैं.लेकिन सम्पूर्ण महिला वर्ग के विकास की
द्रष्टि से इस विधेयक के वर्तमान स्वरूप में थोड़ा परिवर्तन होना चाहिए.३६ मेरे
विचार से पिछड़े वर्ग की महिलाओं को भी एक निश्चित प्रतिशत इस आरक्षण विधेयक में
दिए जाने का प्रावधान होना चाहिए.प्रजातंत्र का स्वरूप तभी मजबूत होगा जब महिलाओं
कोई इसमे भागीदारी बढ़ेगी.३७ महिलाएं आज ही सक्षम हुई हो या आज ही
उन्हें बुद्धि आई हो.बल्कि अपनी कार्यकुशलता का परिचय सदियों से देती चली आ रही
हैं,लेकिन श्रेय पुरुष वर्ग को चला जता रहा हैं.लेकिन आज स्त्री के काम को सरकारी
व सामाजिक स्तर पर मान्यता मिल रही हैं,यही परिवर्तन की आने वाली सदी की बागडोर
पूरी तरह से महिलाओं को सौप दी जाए तो वे साबित कर देगी कि पुरुषों के मुकाबले
महिलाओं के नेतृत्व में देश सभी क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करेगा.३८
यदि आरक्षण दिया जाये तो इसके
माध्यम से योग्य महिलाएं ही संसद में पहुचनी चाहियें ,तब ही इनकी उपयोगिता
होगी.महिला आरक्षण व्यवस्था से सत्ता में भागीदारी बढ़ेगी और वह घर से संसद तक के
प्रति जागरूक रहेगी तथा अपनी जिम्मेदारी को बखूवी निभाएगी.इस बात से इनकार नहीं कि
सिर्फ संसद में महिलाओं को आरक्षण देने की मांग से उनकी स्थिति में सुधर हो
जाएगा.इसके लिए पुरुष समाज को भी अपना नजरिया बदलना होगा और उन्हें स्वच्छ वातावरण
उपलब्ध कराना होगा.जातियां वर्ग के अधर पर आरक्षण की बात कही से उचित नहीं,यह
सिर्फ महिला के लिए होना चाहियें.४० जहां तक एक ओर महिला आरक्षण के
समर्थन करने वालो ने इसे महिलाओं को आगे जाने में एक प्रशस्त मार्ग बतलाया,वाही
इसे वोटो की राजनीती बताया.आजादी के इतने वर्षों के बाद भी महिलाएं कितनी आगे बढ़
सकी अथवा उन्हें कितना आगे बढाया गया.इसे इस द्रष्टिकोण से भी देखा जा सकता हैं कि
तेतीस फीसदी आरक्षण न मिला तो स्वयं वे भी इतना साहस न जुटा स्की कि आरक्षण की
वैसाखी के बगैर स्वयं प्रयासों से संसद में अपना अधिक से अधिक स्थान बना सके.एक
तिहाई आरक्षण के बल पर वे शेष नारी जगत की समस्याओं को उठा सके.जो चंद महिलाएं
राजनीती में आई हैं,क्या वह महज ‘डमी’ बनाकर नहीं लाई गयी.इनका एक मात्र उद्धेश्य
महिलाओं के प्रवक्ता बनना हैं.विभिन्न जाती व वेगो की महिलाएं जब राजनीती तक
पहुचती तो ऐसा लगा कि यह अवसान बिंदु पर पहुच जायेगी.महिलाओं को अपनी लड़ाई सिर्फ
अपने अधिकारों के लिए बल्कि अपने परिप्रेक्ष्य को सामाजिक वर्चस्व दिलाने के ;लिए
लड़ना हैं.यह सैधांतिक प्रस्थापक स्रजन शील राजनीति से जुडी.
लेकिन महिलाओं को आरक्षण
की वैशाखी देकर जहाँ उनकी प्रतिभा पर प्रश्न चिह्न खड़ा करने जैसा हैं,वाही यह भी
सच हैं कि आरक्षण देने से महिलाओं की स्थिति में सुधर संभव नहीं क्योंकि इस स्थिति
में वही होगा,जो पंचायतों में हम और आप देख रहे हैं.प्रधान व सरपंच बैठी महिलाओं
के नाम की सिर्फ मोहरे भर हैं,सारा काम पति और पुरुष परिजनों द्वारा ही सम्पन्न
कराया जता हैं.४१ भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सामाजिक परिवर्तन का
युगांतकारी मोड़ माने जा रहे हैं.संसद व विधायकों में महिलाओं को ३३% आरक्षण देने
वाले विधेयक पर अंतहीन बहस चल रही हैं.सत्ता के गलियारों में अपना दबदबा कायम रखने
वाले पुरुष अपने परिवार की महिलाओं को इस आरक्षण का लाभ दिलाकर सत्ता की कुंजी
पिछली दरवाजे से अपने हाथों में रखेगे.विहार की रावडी देवी ,मुख्यमंत्री स्पष्ट
उदाहरण हैं.४२
महिलाओं के विकास में आरक्षण ही एक
मुद्दा नहीं हैं बल्कि नीतियों को महिलाओं के पक्ष में बनाकर उनकी प्रतिभा के आधार
पर भरपूर अवसर देना हैं.तभी महिला शक्ति उभरकर सामने आ सकती हैं.जहाँ तक आरक्षण का
सवाल हैं तो समाज में उनका अनुपात ९१.१०० के हिसाब से वे ४८-४९% की हकदार हैं.
आरक्षण में जाति और वर्ग के आधार
पर प्रतिशत की बात ठीक नहीं हैं.आरक्षण से पहले जरूरी हैं कि महिलाओं को विकास के
अवसर सुलभ कराए जाएं और उनकी शिक्षा एवं स्वास्थ्य की ओर ध्यान दिया जाए.यह सब
वोटों का महिलाओं को वास्तव में आगे लाना ही होता,तो इतनी उठक-पटक की जरूरत नहीं
होती.४३ आरक्षण से ही अगर महिलाओं का विकास होना होता तो कई पी.टी.उषा
बन गी होती.महिलाओं के लिए सिर्फ आरक्षण ही पर्याप्त नहीं हैं.अपनी पहचान और जनता
का दिल जीतने के लिए कम करना जरूरी हैं.ऐसी जमीन तैयार होने पर आरक्षण का मोहताज
होना जरूरी नहीं रह जाता.महिलायें लग्न से कम करे तो देश में राजनीती तथा जनता में
अपना स्थान बना लेती हैं.उन्हें आत्मविश्वास का गुण पैदा करना चाहिए.४४ उनकी
अलग पहचान नहीं हैं ,बलएक ही सत्ता हैं.अत:महिलाओं को मेरी सलाह हैं कि वे सभी
अवांछित और अनुचित दबावों के खिलाफ विद्रोह हो.४५ समाज में महिलाओं की
महत्वपूर्ण भूमिका हैं उन्हें अधिकार और सम्मान दिलाने का काम सरकार कर रही हैं.४६
लेकिन जब तक महिलाएं संगठित नहीं होती,तब तक उन पर अत्याचार होते
रहेगे.अत:सभी महिलाएं एक ही में बंधने का प्रयास करें.४७
बुद्धिजीवी वर्ग में महिला
आरक्षण को भीख मानती हैं.उनका कथन हैं कि केवल आरक्षण की वैसाखी से ही विकास नहीं
हो सकता.कागजों पर सुविधाएं गिना देने से पिछड़ा वर्ग आगे नहीं आ सकता.उसके लिए
उसका सम्पूर्ण विकास करना हैं.हमे आरक्षण की वैसाखी नहीं चाहिए राजनीतिक स्वार्थो
की पूर्ति के लिए हम अपने कंधे पर रखकर बंदूक किसी को नहीं चलाने देगें.४८
इस तरह महिला आरक्षण जहां
महिलाओं की प्रगति के लिए मील का पत्थर हैं,वाही इससे दुष्परिणामों पर शंका की जा
रही हैं क्योंकि भारत जैसे विकास शील देशों के महिला शिक्षा,स्वास्थ्य,आर्थिकता
निम्न स्तर की हैं.वाही एक डीएम से राजनीति जैसे खुले माहौल में अपना अस्तित्व
निर्धारित करने में असमर्थ हैं.
पंचायती राज व्यवस्था में
महिलाओं का एक तिहाई स्थान सुनिश्चित कर दिया.वाही स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं की
तरह विधान मंडलों तथा लोकसभा में भी महिलाओं को आरक्षण दिए जाने का प्रयत्न चल रहा
हैं.राजनितिक द्रष्टि से महिलायें आगे आ गयी हैं लेकिन आर्थिक क्षेत्र में उन्हें
अब भी कठिनाईयां हैं.महिला आरक्षण पर चर्चा करते हुए पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल
विहारी बाजपेयी ने व्यक्त किया कि न तो यह दलगत मुद्दा हैं और न ही स्त्री बनाम
पुरुष का मसला अपितु यह समाज में एक महत्वपूर्ण हिस्से के पीछे रहने का मुद्दा
हैं.४९