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रविवार, 19 नवंबर 2017

'विविधता में एकता का प्रतीक है नारी'
करूणा मयी, दया की मूरत, सारा जग आभारी, 
जीवन का संचित सुख देने वाली, दुखों का विष प्याला पीती, 
रीति रिवाजों से जकडे पग, फिर भी कहते-
कि तुम्हारी जडे धरती के अमृत में दबी हैं।
कुल की रखवाली, घर आंगन में ही दुनिया सारी, 
तिरस्कृत करता समाज, फिर भी दुआएं बांटती, 
दुर्भाग्य साथ चलता, गुमनामी सा जीवन गुजारती,
जगत का अन्नप्राशन करने वाली, करूणा गान सुनाती, 
विपदा में चण्डी बन, बिजली सा कहर वरपाती, 
नित नए विकल्प ढूंढने वाली, सदा नव सृजन करती।
हां, मैं, नारी, आदि काल से अब तक रही संगिनी, 
अविरल विकास की धारा में, मेरी अंतस यात्रा रही अकेली, 
विधाता की सर्वोत्तम नायाब सृष्टि हैं नारी, 
विविधता में एकता का प्रतीक है नारी।
धन्य हैं! तू नारी, धन्य है! हर नारी।
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