सर्वतोमुखी प्रतिभा सम्पन्न:स्वामी विवेकानंद
बचपन से ही आध्यात्मिक विषय में रूचि रखने
वाले स्वामी विवेकानन्द जी,जिनका पूर्व नाम नरेंद्र नाथ दत्त या नरेन था,का जन्म कलकत्ता
के एक सभ्रांत एवं प्रतिष्ठित परिवार में सोमवार ,१२जनबरी,सं १८६३ में हुआ था.उनके
पिता श्री विश्वनाथ दत्त,जो अंग्रेजी व फ़ारसी के अच्छे ज्ञाता थे,कलकत्ता के हाईकोर्ट
में एटर्नी थे तथा उनकी माता का नाम श्री मती भुवनेश्वरी देवी था,वो एक कुशल ग्रहणी,धर्मनिष्ठ
और व्यक्तिनिष्ठ थी.बचपन में माँ से सुनी धार्मिक कहानियों की अमित छाप उनके व्यवहार
में दिखती थी.धर्म के अतिरिक्त एनी विषयों के प्रति भी रूझान था.स्वामी जी सदैव दूसरों
का दुःख दूर करने में सदैव आगे रहते थे.
व्यक्तित्व
के धनी –
स्वामी जी का व्यक्तित्व इतना आकर्षण था
कि लोग उन्हें देखने के लिए व्यग्र हो उठते थे.प्रथम भेंट में श्री मती राईट ने स्वामीजी
के व्यक्तित्व पर अपनी माँ को पत्र में लिखा- ‘उनकी उन्नत मस्तक होकर चलने की भंगिमा
भव्य थी,वे प्राच्य ढंग से उन्नत सुंदर थे और लगभग तीस वर्ष के युवक होने पर भी सांस्कृतिक
द्रष्टि से युगों पुराने थे.’ हालांकि स्वामीजी की अपनी विचित्र भेषभूषा ,प्रचंड शीत
और क्षुधा के कारण लोगों द्वारा उपहास किया गया,लेकिन यह भी सत्य हैं की ‘बिना कठिन
परिश्रम के महान कार्य भी सम्पन्न नहीं होते.’ प्रोफेसर राईट स्वामीजी के व्यक्तित्व
से इतने प्रभावित थे कि जब धर्म महासभा में हिन्दू प्रतिनिधित्व करने में प्रमाण पत्र
की समस्या बताई तो प्रोफेसर राईट ने तुरंत समिति के पत्र में स्वामीजी के विषय में
लिखा- ‘इतनी विद्वता हमारे सभी विद्वान् अध्यापकों की सम्मिलित विद्वता से भी अधिक
हैं.’
शिकागों की धर्मसभा में स्वामीजी
के व्यक्तित्व और भाषण का श्रोताओं पर जो प्रभाव हुआ उसका श्री मती एस.के.ब्लाजेट ने
अपने स्न्स्मर्ण में लिखा – ‘धर्म महा सभा में जब एक युवक ने कहा –अमेरिका के बहिनों
और भाईयों!सात हजार जोग एक ऐसे तत्व के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए खड़े हो गये,जिसके
सम्बन्ध में कुछ जानते नहीं थे.जब सभा समाप्त हुई तब मैंने देखा कि बीसियों महिलाओं
का झुण्ड बेंचों के ऊपर चलकर उस युवक के निकट पहुचने की चेष्टा कर रहा था,तब मैंने
अपने आप से कहा,वत्स!यदि तुम इस आघात से बच सको,तो तुम सचमुच ईश्वर हो.’ श्री राम कृष्ण
ने नरेन्द्रनाथ के सरल व्यक्तित्व के प्रति प्रभावित होने पर भी उन पर वेशभूषा में
पाश्चात्य की छाप नहीं हैं,बीएस उनके अंतर्मुख पर तेज दिखाई देता हैं.’ स्वामीजी की
रूचि सभी में थी.माउंट आबू में दीलावाडा मन्दिर का मुग्धभाव से अवलोकन किया.स्वामीजी
की एकाग्रता और स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि जिस भी प्रष्ठ पर नजर पडती,वो उनके मस्तिष्क
पर अंकित हो जाता हैं.नरेन्द्रनाथ में एकाग्रता इतनी थी कि एक बार जब वह किसी वृक्ष
के नीचे ध्यानस्थ थे तो उनका शरीर पूरा मच्छरों रूपी कम्बल से ढका हुआ था.उनकी अंतर्द्रष्टि
के विषय में श्री रामकृष्ण ने कहा था कि ‘देखों!देखों!! नरेंद्र की कैसी अंतर्दृष्टि
हैं!मानों ज्योति का असीम सागर ! अपनी ही प्रदत्त महिमा से स्वयम आवद्ध हो,साक्षात
माँ महामाया भी उससे दस कदम दूर रहती हैं.’उनके व्यक्तित्व के विषय में रोमारोला के
विचा हैं कि ‘उनके शब्द महान संगीत हैं,वैथोवन शैली के टुकड़े हैं,हैंडल के समवेत गान
के छंद प्रवाह की भाति उद्दीपक लय हैं....और जब वे नायक के मुख से ज्वलंत शब्दों में
निकले होगे तब तो न जाने कैसे आघात एवं आवेश पैदा हुये होंगे.’
एक बार जब वाराणसी के दुर्गा मन्दिर से प्रस्थान करते समय स्वामीजी के पीछे
बंदरों का झुण्ड पीछे पड़ गया तो स्वामीजी के भागने पर वृद्ध सन्यासी की पुकार सुनाई
दी कि ठहरों,भागों मत ,पशुओं का सामना करों.स्वामीजी का इस सन्यासी के वाक्य पर इतना
प्रभाव पड़ा कि स्वामी जी ने इस घटना का उल्लेख न्यूयार्क के अपने भाषण में उल्लेखित
किया कि हमें प्रकृति का, अज्ञान का,भ्रम का सामना करना चाहिए,भागना नहीं चाहिए.स्वामी
जी का आध्यात्मिक मन भी कभी हास्-परिहास भी करता था.एक बार जब आलम बाजार मठ में स्वामी
साधुओं को भाषण कला का अभ्यास करने के लिए उत्साहित करना चाहते थे.स्वामी सुबोधानन्द,जिनकी
बाल सुलभता के कारण खोका [छोटा बालक] कहते थे,की बारी आने पर अचानक तूफ़ान आने के कारण
धरती डोलने लगी.पेड़ जमीन पर लौट गये,मकान हिलने लगे.टप्पर उड़ गये,जिससे सभा अचानक से
समाप्त हो गई.इस पर स्वामी जी मजाक करते हुए बोले- ‘खोका का व्याख्यान संसार को कंपा
देने वाला रहा.’ एस मजाक कसा सर्वजन ने भरपूर फायदा उठाया.
स्वामीजी बाहरी मोहमाया से कोसो दूर थे. जीवन के प्रति कोई लगाव नहीं था.स्वामी
जी द्वारा १९ दिसम्बर,१९०० को निवेदिता को लिखे पत्र से उद्धत हैं – ‘सचमुच मैं एक
पन्थ का पंछी हूँ.उल्लासपूर्ण और व्यस्त फेहरिस्त.पुराना कांस्टेटिनोपल .......गंगा
किनारे मठ में अपने कमरे में बैठकर यह पत्र लिख रहा हूँ.कितनी नीरव शांति हैं.सूर्य
के तीव्र प्रकाश में विशाल गंगा नदी नाच रही हैं,केवल बीच-बीच में मालवाही नावों की
पतवारों के शब्द इस शान्ति को भंग करते हैं.’
स्वामी जी जब एक बार बीमार पड़े तब उन्होंने अपने मन की कठोरता के विषय में
,हाथ में कुछ कंकण उठाकर कह रहे थे ‘म्रत्यु मेरे सम्मुख उपस्थित होने पर ,मेरी सारी
दुर्वलता दूर हो जाती हैं.उस समय मेरे मन में भय,संदेह तथा बाह्य जगत के सम्बन्ध में
कोई विचार नहीं रहता.मैं सहज भाव से स्वयं को म्रत्यु के लिए प्रस्तुत कर लेता हूँ.’
फिर अपने हाथ के सभी कंकण को परस्पर आघात देते हुए कहा, ‘मैं वैसा ही कठोर हूँ जैसे
कि ये पत्थर क्योंकि मैंने ईश्वर के चरणों को स्पर्श कर लिया हैं.’इसी तरह जीवन के
विषय में स्वामीजी के विचार २ सितम्बर,१८९९
में रिजले में लिखे पत्र में हैं कि ‘जीवन एक अनवरत संघर्ष और मोहभंग की श्रंखला हैं.जीवन
का रहस्य भोग नहीं,अपितु अनुभवों के द्वारा शिक्षा हैं.’
स्वामी में सेवा भाव की भावना
थी ,साथ ही दूसरों की तहे दिल से प्रशंसा करते थे.हरिद्वार के तपस्वियों की कठोर तपस्या
का स्मरण कर स्वामीजी ने उदधत किया ,एक तपस्वी को कुछ लडके पत्थर मर कर मजाक उड़ा रहे
थे, लेकिन वो तपस्वी लगातार हंसता हुआ विचरण करता जा रहा था.मैंने उस साधु को एक ओर
लेजाकर उनके घावों पर मरहमपट्टी की लेकिन उस साधु का उत्फुलित व्यक्तित्व अनवरत हंसे
ही जा रहा था और कहा, ‘लडकों, मुझे मारकर कैसा आनन्द आ रहा था.सब परमात्मा का खेल हैं.
स्वामीजी की पत्रिका ‘उद्धोधन’का
प्रकाशन किया गया तब इस प्रकाशन में स्वामी त्रिगुनान्न्द जी के अवर्णनीय परिश्रम के
विषय में कहा ,कि ऐसा अमानवीय,अथक परिश्रम केवल रामकृष्ण के शिष्य ही कर सकते हैं क्योंकि
उनका जीवन मानव कल्याण के लिए हुआ हैं.इसी तरह ग्रामीण जीवन के विकास के लिए आजीवन
कार्य करने वाले स्वामी अखंडानन्द के विषय में उनका कथन था कि ‘देखों,कैसा अद्भुत कर्मयोगी
हैं वह निर्भीक.जीवन या म्रत्यु की चिंता किये बिना किस प्रकार एक निष्ठ,समर्पण पूर्वक,बहुजनहिताय
,बहुजनसुखाय कार्य कर रहा हैं.’
माँ का आशीर्वाद सर्वोपरि –
स्वामीजी की महिलाओं के प्रति सम्मान की
भावना थी.बोस्टन में ‘भारतीय नारी का आदर्श’पर स्वामी जी का व्याख्यान अपनी माँ के
प्रति आदर ज्ञापित करते हुए कहा था की ‘उनके सर्वोत्क्रष्ट कार्यों का श्री उनकी माँ
को ही हैं.उनकी पवित्रता और निःस्वार्थ प्रेम के कारण ही मानों स्न्यान जीवन उन्हें
उतराधिकार सूत्र में मिला.’ माँ के विषय में स्वामी जी ने सं १८९४ में लिखे एक पत्र
में उद्धत हैं- ‘मेरे लिए माँ की कृपा,पिटा की कृपा से शत सहस्त्र गुना अधिक मूल्यवान
हैं.माँ का आशीर्वाद सर्वोपरि हैं.क्षमा करना,माँ के सम्बन्ध में थोड़ा कट्टर हैं.माँ
की आगया हो तो उसके गुण कुछ भी कर सकते हैं.भाई,अमेरिका जाने से पूर्व मैंने माँ का
आशीर्वाद मांगा था.उनका आशीर्वाद मिलते ही मैं एक छलांग में ही समुद्र पार कर गया.’
ईश्वरीय आस्था ,पर गुरु सर्वोपरि –
मूर्ति पूजा के विरोधी नरेन्द्रनाथ का मूर्ति
पूजा के प्रति आस्था का भाव उनके पिटा की म्रत्यु के पश्चात हुआ,जब उन्होंने माँ से
माँ काली से प्रार्थना करने को कहा.इस अनुभव का उल्लेख नरेंद्र के शब्दों में – ‘जब
माँ पर द्रष्टि डाली तो अनुभव हुआ कि माँ चिन्मयी हैं! प्राणवंत हैं,दिव्य प्रेम और
अलौकिक सौन्दर्य का शाश्वत ! मैं तो भक्ति और प्रेम के उत्ताल तरंगों से अभिभूत हो
गया.....साष्टांग प्रणाम कर प्रार्थना करने लगा......माँ मुझे विवेक दो,वैराग्य दो,ज्ञान
दो,भक्ति दो.नित्य तुम्हारें दर्शन पाता रहूँ ,ऐसा आशीर्वाद दो.मेरी आत्मा में विलक्ष्ण
शान्ति छा गई.संसार विकृत हो गया.बीएस,केवल जगन्माता ही मेरे ह्रदय में प्रकाशित हो
रही थी.’स्वामीजी गुरु महिमा में विशवास करते थे.उनके मन में ईश्वर से ऊपर गुरु का
स्थान था,जितना वह गुरु का सम्मान करते थे उतना ही गुरुपुत्र का सम्मान करते थे.जब
स्वामी जी अमेरिका से वापस लौटे तब उन्होंने शास्त्र का यह वाक्य ‘गुरुवत गुरु पुत्रेषु’
उद्धत करते हुए स्वामी ब्रह्मानन्द जी को प्रणाम किया.प्रति उत्तर में स्वामी ब्रह्मानन्द
जी ने शास्त्र का दूसरा वाक्य उद्धत किया ‘ज्येष्ठ भ्राता को पिटा के समान आदर देना
चाहिए.ऐसे थे गुरु-शिष्य के प्रगाढ़ सम्बन्ध.
स्वामीजी को पिंड तथा ब्रह्माण्ड
की एकता के बारे में अनुभूति अल्मोड़ा के रस्ते पर ककड़ी धार नामक स्थान पर एक वट वृक्ष
के नीचे हुई थी.अल्मोड़ा में स्वामी जी लाला बद्री शाह की भक्ति भावना व सेवा भाव से
प्रभावित होकर बोले-उनके जैसे भक्त विरले ही देखने में आते हैं.
भारत को एक विशाल मन्दिर की भांति देखना-
स्वामीजी की भारत के प्रति अनन्य भक्ति
थी .वे सरे भारत को एक विशाल मन्दिर की भांति देखा जो कि अनगिनत मठों तथा मन्दिरों
से पूर्ण था.ऐसी अनुभूति स्वामीजी की जूनागढ़ के प्रसिद्ध हिन्दुओं,जैनों,बौद्धों के
पवित्र स्थलों के मनोमुग्धकारी दर्शन पर हुआ.परिव्राजक सन्यासी के रूप में स्वामीजी
जब द्वारिका की राजधानी द्वारिकाधीश थी,गये तो महसूस किया कि महान भारत का ध्वस्त स्थल
ही शेष दिखता हैं और केवल समुद्र की आती-जाती तरंगों की गर्जना भर सुनाई देती हैं.स्वामीजी के इस व्यग्र
मन को शान्ति एकांत वृक्ष में ध्यान मग्न होकर दिव्य ज्योति ही भारत के उज्ज्वल भविष्य
का प्रतीक हैं.
देश भक्ति के विषय में उनका कहना
था कि देशवासियों से प्रेम करना देश भक्ति नहीं कहलाती.स्वामी जी का कथन हैं कि व्यवहारिक
देश भक्ति का अर्थ केवल अपनी मात्रभूमि के प्रति प्रेम परक सम्वेदनात्मक लगाव ही नहीं
हैं,अपितु देश वासियों की प्राण पण से सेवा करने की उत्कंठा भी हैं. पैदल भारत भ्रमण
करते समय मुझे लोगों की दुर्दिन दशा,अज्ञानता,घिनौनेपन को देखा तो मेरा मन उदिग्न हो
गया.कैसे इस दुरावस्था को दूर किया जय.मान्सेवा ही परम सेवा हैं,ईश्वरीय दर्शन का सरलतम
मार्ग हैं.भारत की अवस्था पर स्वामी जी का विचार था कि दर्शन और आध्यात्मिकता भारत
की धरोहर रही हैं.आज उसे वैज्ञानिक विचारों से जोड़ने की आवश्यकता हैं.इस धरोहर का वेदान्त
की शिक्षा का पाश्चात्य देशों में प्रचार-प्रसार करना चाहिए.
सं १८९२ में स्वामीजी ने कन्याकुमारी
में एक शिला खंड पर बैठकर भारत की दुर्दशा के कारणों पर अंतर्मनत्रणा की कि किस तरह
भारत का पतन हुआ.उनके अंतर्मन में प्रचंड तूफ़ान उबाल ले रहा था.स्वामी जी ने भ्रमण
करने व तत्व ज्ञान बाँटने पर कहा, ‘ये पागलपन हैं.ये दरिद्रजन अज्ञान के कारण ही पशुओं
का सा जीवन जी रहे हैं.हम सदैव उनका रक्त चूसते आये हैं और पैरों तले रौन्धते रहे हैं.’यही
वो क्षण था जब एक सन्यासी एक महान सुधारक,संगठक तथा राष्ट्रनिर्माता में परिवर्तित
हो गया था.शिकागों सम्मेलन के लिए स्वामीजी रामनाद के राजा को भारत का ऋणी मानते थे.
भारत दर्शन के प्रचार-प्रसार का
श्री स्वामीजी को जता हैं.इस सम्बन्ध में श्री राम कृष्ण ने कहा था कि भारत का वर्तमान
जगत से परिचय किसने कराया?इससे पूर्व कितने लोग भारत को जानते थे? उन्ही के प्रभाव
से आज सर्वत्र भारत-भारत का आदर हो रहा हैं.सम्पूर्ण विश्व ने देखा कि भारत में भी
इतने बड़े सर्वतोन्मुखी प्रतिभा सम्पन्न महापुरुष जन्म लेते हैं.स्वामीजी की प्रबल मनोकामना
थी कि जितनी जल्दी हो सके भारत का उत्थान हो.वह
कम समय में अधिक से अधिक काम कर भारत की प्रगति को चरम बिंदु तक ले जाने के उत्सुक
थे.इसी कर्ण कभी-कभी अपने शिष्यों पर कठोरता उजागर हो जाती थी.इस गुण को देखकर स्वामी
जी कहा करते थे कि ‘शरत की शिराओं में मछली का रक्त हैं,जो कभी गरम नहीं होता.’क्योंकि
स्वामी सदानंद जी किसी के भी क्रोध को ठंडा कर सकते थे.
समाज में नई विचार धारा प्रसारित
करने व ऋषि मुनियों की आत्मा को पुनर्जाग्रत करने के लिए सं १८९० में स्वामीजी ने प्रमदास
जी से विदा लेते हुए कहा था कि ‘जब मैं दूसरी बार यहाँ आऊंगा,तब समाज पर बम के गोले
के समान फूंट पडूंगा तथा समाज एक कुत्ते की तरह मेरा अनुसरण करेगा.’और अपनी इसी बचन
वद्धता के तहत वह वाराणसी तब तक नहीं गये जब तक कि उन्होंने ऋषि मुनियों की आत्मा को
झंकझोर नहीं दिया.
अज्ञात जीवन जीने के लिए
स्वामीजी विभिन्न नाम ग्रहण करते थे.व्यक्तिगत द्रष्टिकोण से स्वामीजी के जीवन में
परिवर्तन सं १८९० में हुआ जब वे एक अज्ञात परिव्राजक स्वामी के रूप में प्रवास पर निकले.अपने
आप को विशाल भारत के गर्त में विलीन करने वाले स्वामीजी की इच्छा सिर्फ एकांतवासी सन्यासी
बनकर नहीं गुजरना चाहते थे बल्कि उनकी स्वाभाविक इच्छा एक महान भारत निर्माण की थी.विभिन्न
स्थानों के भ्रमण काल में संस्कृत के प्रकांड विद्वान प्रमदास मित्र,स्वामी सदानंद,पाव्हारी
बाबा से हुई.पावहारी बाबा से मिलने पर उनके अंतर्मन में ब्रह्मलीन और धर्मजागरण के
बीच अन्तर्द्वन्द २१ दिनों तक चला लेकिन पाँवहारी की अनिच्छा के कारण उन्हें अपना दृढ
संकल्प त्यागना पड़ा.
विभिन्न धार्मिक और ऐतिहासिक
स्थानों के भ्रमण काल के दौरान उनके मांस पटल पर भारतीय जन समूह की निर्धनता की छाप
टंकित हो गई.इस समस्या के निराकरण के लिए न सिर्फ एक राज्य से दूसरे राज्य जाकर राजाओं
से भेंट कर चर्चा की.बल्कि पाश्चात्य देशों की यात्रा करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया.स्वामीजी
का ध्यान सदैव भारत के पतन व उत्थान पर टिका रहता.अपने एन लक्ष्यों की प्राप्ति के
बीच मद्रास प्रस्थान के दौरान वहां आलासिंगा पेरूमल के नेतृत्व में एक दल इंतजार कर
रहा था.इस दल को शिकागो में होने वाले धर्म सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए स्वामी
जी ने बताया.इसी बीच पूना में राष्ट्रीय नेता बाल गंगाधर तिलक से हुई,जो स्वामीजी के
पांडित्य और प्रगल्भ विचारों से बहुत ही प्रभावित हुए.भरतीय जन समुदाय की दरिद्रता
को लेकर स्वामीजी का मन बहुत ही आघात होता था.स्वामी विवेकानंदजी के सम्बन्ध में श्री
अरविन्द जी ने कहा- ‘विवेकानन्दजी का विदेश गमन,उनके गुरु की यह युक्ति कि इस वीर पुरुष
का जन्म ही इस संसार को अपने दोनों हाथों को बिच लेकर बदल देने के लिए हुआ हैं,इस बात
का प्रथम द्रश्य प्रमाण था कि भारत जाग उठा हैं,केवल जीवित रहने के लिए नहीं बल्कि
विश्वविजयी होने के लिए.’
रामकृष्ण मिशन की स्थापना –
अगस्त,१८८६ में गुरुदेव की महासमाधि के
पश्चात वराहनगर के जीर्ण शीर्ण मकान में कठोर आध्यात्मिक साधना और तपस्या मय जीवन के
बीच राम कृष्ण संघ की स्थापना की.स्वामी जी अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण के प्रति अगाध
भक्ति थी.वे अपने गुरु को एक मन्दिर भेंट करना चाहते थे.मठ प्रांगण भेंट करने से पूर्व
ही स्वामीजी ने अपने गुरुदेव के अस्थि अवशेष को नए मत प्रांगण में संस्थापित कर दिया
था.इस समर्पित भाव पर स्वामी जी ने कहा- ‘गुरुदेव ने एक बार मुझसे कहा था ,तुम अपने
कंधों पर लेकर मुझे चाहे जहां भी रखोगे,मैं वाही रहूँगा चाहे वह वृक्ष तले हो या एक
सा धारण कुटिया में.’ इन्ही परम पुनीत पावन बचनों में विशवास के साथ मैंने उन्हें नये
प्रांगण में स्थापित किया.संघ की स्थापना के साथ ही उसे तरीके बद्ध चलाने के लिए नियमों
की जरूरत थी.लेकिन स्वामी जी ने नियमों को उल्लेखित करने से पूर्व कहा – ‘देखों,निःसंदेह
हम नियम बनाने जा रहे हैं,परन्तु हमेशा लक्ष्य पर ध्यान रखना हमारा उद्धेश्य नियमों
के पर जाना हैं.हममे निश्चित ही बुरी प्रवृतियाँ विद्यमान हैं,जिन्हें सत नियमों के
द्वारा बदल डालना हैं और अंत में हमे इन नियमों के पार चले जाना हैं- ‘कण्टकेनैव कन्ठ
कमिव’.
स्वामीजी ने सदस्यों के समक्ष
‘आत्म्नों मोक्षार्थ जगद्विताय च’ स्वयं की मुक्ति एवं संसार का कल्याण का आदर्श रखा.दस
वर्ष की अल्पावधि में स्वामी में स्वामी जी ने प्राचीन वेदान्त सिद्धांतों का नवीनीकरण
आधुनिक युग की मांग तथा आवश्यकतानुसार किया.इस अभियान को एक अभिनव गति मिली स्वामीजी
ने अपने जीवन लक्ष्य का उल्लेख करते हुए एक पत्र में लिखा- ‘अमूर्त अद्वेत वेदान्त
को सरस और प्राणवंत बनाकर दैनान्दिनी जीवन में संचारित करना होगा. ‘किंकर्तव्यविमूढ़
कारी’ जटिल मिथ्कता से एक ठोस नैतिक आकार को जन्म लेना होगा.द्विभ्रान्त्कारी,वैज्ञानिक,व्यवहारिक
मनोविज्ञान का अविर्भाव होगा और इन सब को इस तरह प्रस्तुत करना होगा जिसे एक शिशु ही
समझ सके.यही हैं मेरे जीवन का लक्ष्य’.
आध्यात्मिक उन्नति करना रामकृष्ण
मिशन का उद्धेश्य था.इसके अतिरिक्त अपने को शिक्षा,चिकित्सा,वेदान्त के सिद्धांतों
के प्रचार-प्रसार में संलग्न होना भी था,जिससे वे सभी सार्वभौमिक सिद्धांत विद्यमान हैं जो सभी धर्मों में अंतर्निहित हैं.बिना
किसी भेदभाव के मानव करना,भावान्दोलन द्वारा सभी धर्मों को आध्यात्मिक अनुभूति का पथ
या विचार धारा हैं.सर्व धर्म समन्वय को प्रतिबिम्वित करना इसका मुख्य उद्धेश्य था.सभी
धर्मों का अवलोकन व पालन करने पर अपना निर्णय दिया- ‘जितने मत,उतने मय.’संघ में सम्मिलित
सदस्यों में तीन भिन्न व्यवहार- विरोध,उदासीनता एवं मान्यता थे,इनके प्रति ध्यान आकर्षित
कर उन्होंने कहा था कि मठ और मिशन प्रथम दो अवस्थाओं को पार कर तीसरी अवस्था में पहुँच
गया हैं.उन्होंने ‘सुरक्षित प्रतिष्ठा’से कारण ,उत्साह एवं ऊर्जा में शिथिलता उत्पन्न
होने के खतरे की ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया.
धर्मवाद व जातिवाद से परे –
स्वामीजी ने महाराजा खेतड़ी के
साथ कई सप्ताह स्वाध्याय,साधना व अध्यापन में बिताये.स्वामीजी अपने निर्धन शिष्यों
के घर जाते थे और भोजन भी किया करते थे.स्वामीजी ने विभिन्न धर्मों के सम्बन्ध में
बताया कि ‘सभी आदर्श सत्य हैं तथा विभिन्न धर्म इस आदर्श की अनुभूति के विशिष्ठ पथ
मात्र हैं जिनका पालन यदि निष्ठापूर्वक किया जाय तो वे मनुष्य के भीतर के देवत्व को
अवश्य ही प्रकट करेंगे.’ स्वामी जी ने रामेश्वर में शिव पूजा के सम्बन्ध में कहा कि
सभी उपासनाओं का सार यही हैं – पवित्र होना तथा दूसरों का कल्याण करना.जो दरिद्र में ,दुर्वल में,रोगी में
शिव दर्शन करता हैं,वही वास्तव में शिव की पूजा करता हैं और यदि वह शिव को मात्र प्रतिमा
में देखता हैं तो उसकी पूजा प्रारम्भिक मात्र हैं.जाति,वर्ण,आश्रम आदि को भूलकर शिवज्ञान
से जिव सेवा करने वाले पर शिवजी की कृपा उनकी अपेक्षा अधिक होती हैं जो केवल मन्दिर
में शिव के दर्शन करते हैं.’ हिन्दू,मुस्लिम,ईसाई धर्मों पर चर्चा करते हुए स्वामी
जी ने कहा कि – केवल वेदांत ही किसी व्यक्ति पर आधारित न होकर शाश्वत सिद्धांतों पर
आधारित हैं और इसी तथ्य ने विश्वजनीत धर्म का स्तर प्रदान किया.
स्वामीजी ने धर्मशिक्षा पर अपने
शिष्यों को बताया कि आगे बढो.सरे विश्व को दिव्यप्रकाश की आवश्यकता हैं.वह उसकी प्रतीक्षा
कर रहा हैं.केवल भारत के पास ही वह ज्योति हैं.धर्म की सच्ची शिक्षा धर्म के प्राण-उच्चतम
आध्यात्मिक सत्यों में हैं.अंग्रेजों की दासता से प्रताड़ित,उपेक्षित,व पीड़ित भारतीय
जनसमुदाय की मर्मभेदी सिसकियाँ भारतीय वातावरण को कर रही थी. ‘फूट दालों,राज करों’ की दमनकारी नीति के कठोर व
जटिल पिंजरे में जनसमुदाय कैद हो रहा था, न ही ब्रिटिश सरकार के चंगुल से आजाद न होने
के कारण डीएम घुट रहा था.ऐसे में कुछ – कुछ लोग प्रलोभन व हुकुमत के दबाव में आकर स्वधर्म
छोडकर धर्म परिवर्तन कर सुखमय जीवन जीने के लिए अग्रसर हो रहे थे.धर्मांतरण प्रक्रिया
के चलते हिन्दू धर्म पतन के कगार पर खड़ा था.रह गये नाम मात्र के सामाजिक मूल्यों व
व्यवहारों को बचाने के लिए एक देदीप्यमान व्यक्ति का अवतरण हुआ वो थे स्वामी श्री राम
कृष्ण देव जो आध्यात्मिक जगत के प्राण थे.धूमिल हुए हिन्दू धर्म को प्रतिष्ठित करने
में व जन समुदाय के समक्ष सही अर्थों में प्रतिपादन करने में अपना पूर्ण जीवन कल में
अक्षरशः पालन किया.धर्म को परिष्कृत कर लोगों में सामाजिक चेतना जाग्रत करने के लिए
श्रे राम कृष्ण जी ने अपने परम शिष्य स्वामीजी को अग्रणी किया
स्वामीजी जातिवाद से पर्व थे उनके मन में समानता की बात थी.जब स्वामीजी सं १८९९
में राजस्थान में एक मुसलमान वकील के आग्रह करने पर उनके घर ठहरे.तो वहां के महाराजा
खेतड़ी के निजी सचिव मुंशी जी उनसे मिले तो उन्होंने एक मुसलमान के घर ठहरने पर इसलिए
एतराज किया क्योंकि भोजन मुसलमान द्वारा स्पर्श किया जता था.इस पर स्वामीजी का उत्तर
था- ‘महाशय! आप क्या कहते हैं ? मैं एक सन्यासी हूँ! मैं सभी सामाजिक रीति-रिवाजों
के ऊपर हूँ. मैं एक भंगी के साथ भी भोजन कर सकता हूँ.मैं सर्वत्र ब्रह्म का दर्शन करता
हूँ.क्षुद्रतम जिव में भी! मेरे लिए कोई ऊंचा या निचा नहीं हैं.शिव ! शिव !
धर्म के ठेकेदारों पर करारा प्रहार
करते हुए सम्बोधित किया कि यदि कोई व्यक्ति यह सोचता हैं कि केवल उसका ही धर्म बचा
रहेगा तथा दूसरों के धर्म नष्ट हो जायेंगे तो उस व्यक्ति पर मुझें दया आती हैं.और उसे
मैं यह बताना चाहता हूँ कि वह समय आ गया हैं ,जब विरोध के बावजूद सभी धर्मों की ध्वजा
पर लिखा होगा- ‘कलह नहीं सहायता,विनाश नहीं आत्मसात,विसम्मति नहीं सम्मत और शान्ति.’
साधु से सन्यासी बनना –
स्वामीजी बचपन से ही भ्रमण शील प्रवृति
के थे .इस सम्बन्ध में नटखट एवं शरारती नरेंद्र बचपन में अपने मित्रों को अपने हाथ
की रेखाएं दिखाते हुए कहते थे कि, ‘देखों,ये रेखा मेरे सन्यास बनने की हैं और मैं एक
दिन सन्यासी बनूंगा.सत्य भी हैं स्वामीजी की ईश्वरीय अस्तित्व सम्बन्धी प्रश्नों में
उनकी तार्किक बुद्धि उलझकर रह जाती थी.इस व्यग्रता को शांत करने से उनकी आध्यात्मिकता
की अग्नि और बढ़ जाती थी.इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए स्वामीजी श्री रामकृष्ण के
पास गये.नरेंद्र नाथ के आंतरिक मन में आध्यात्मिकता की अग्नि विभिन्न रूपों में प्रज्ज्वलित
होने लगी,जिसको एक सूत्र में बाँधने का श्री श्रे रामक्रष्ण को जाता हैं.भौतिक सुख-सुबिधाओं
से उदासीन नरेंद्र नाथ और उनके साथी आध्यात्मिक साधना और ध्यान के उत्ताल तरंगों में
लीन थे.जब स्वामीजी ने अपने दृढ संकल्प को
पूरा करने के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की ,तब इस अवधि में क्रिसमस पर नरेन्द्रनाथ
ने कुछ अपने गुरु भाईयों के साथ स्वच्छंद नभ तले प्रज्ज्वलित अग्नि के चहुंओर आसन ग्रहण
कर सन्यास का व्रत लिया लेकिन मन में उदिग्न यायावर जीवनयापन की तीव्र अभिलाषा ने उन्हें
छोटी-छोटी यात्राओं का भ्रमण करने लगे.ईश्वरीय दर्शन की उत्सुकता ने स्वामीजी के निकटस्थ
चिकित्सक रामदत्त ने कहा कि दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण परमहंस के पास गमन करों.
आध्यात्मिक अनुभूति के शिखर पर पहुचे नरेन्द्रनाथ ने स्माधिस्थ होने की बात
गुरु से कही तो,गुरु रामकृष्ण ने इस बात की तीव्र भर्त्सना करते हुए कहा कि ‘धिक्कार
हैं तुझे!मैं तो समझता था कि टू संसार ज्वाला से दग्ध सहस्त्रों लोगों को शीतल छाया
प्रदान करने वाले विशाल वट वृक्ष के समान होगा,पर देखता हूँ कि तू केवल अपनी ही मुक्ति
चाहता हैं.’निर्विकल्प समाधि की अभिलाषा की अनुभूति के पश्चात् स्वामीजी से गुरु ने
यह भी कहा था कि – ‘तेरे इस अनुभूति की चाबी मेरे पास रहेगी तथा जिस कार्य के लिए तेरा
जन्म हुआ हैं उसके पूर्ण हुए बिना इस अनुभूति के द्वार पुनः नहीं खुलेगें.’
एकांत प्रवास की उदिग्न अभिलाषा
ने अपने गुरु भाईयों से व युवा सन्यासियों को आध्यात्मिक गुरु और श्री रामकृष्ण की
सहचरी श्री शारदा देवी से जुलाई,१८९० में विदा ली,तब इस प्रवास के सम्बन्ध में रोमा
रोला के शब्दों में- ‘यह एक महान प्रस्थान था.वे एक खाताखोर की तरह भारत महासागर में
दूब गये तथा उस महासागर ने उस पथ को ढंक लिया.उस महासागर में तैरते –उतरते हुए हजारों
सन्यासियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं थे.किन्तु उनकी अद्वितीय प्रतिभा की ज्योति उनके
नेत्रों में प्रज्ज्वलित थी.सभी छ्द्मन्वेशों के बावजूद वे युवराज ही थे.’
स्वामीजी हब ३० जुलाई,१८९३ को
शिकागों पहुचें तो वहां की धन सम्पदा और पाश्चात्य जगत की आविष्कार प्रतिभा को देखकर
आश्चर्य चकित हो गये.धर्म सभा में सम्मिलित होने के लिए उनके पास उचित प्रमाण पत्र
नहीं था तो वे असफल खोज से थककर ईश्वरेच्छा के प्रति समर्पित कर रेल के डिब्बे में
रास्ते के किनारे बैठ गये.तब उनकी सहायता श्री मती जार्ज डव्ल्यू हेल ने की जो स्वामीजी
के अनुगत भक्त बने रहे.देश के सर्वश्रेष्ठ संस्क्रति का प्रतिनिधित्व करने वाला आर्ट
इन्सटीटयूट का विशाल भवन में ११ सितम्बर १८९३ में धर्म सभा प्रारम्भ हुई.प्रबुद्ध और
विशाल सभा को सम्बोधित करने से पूर्व मन ही मन विद्या की देवी सरस्वती देवी को स्मरण
प्रणाम करने के साथ ही सभा को उद्वोधित किया – अमेरिका वासी,बहनों तथा भाईयों से किया.सैट
हजार लोग एक अज्ञात शक्ति के प्रति सम्मान में खड़े हो गये और दो मिनट तक श्रोता समूह
मेघ गम्भीर आनन्दोल्लास में दूब गया.स्वामी जी के तेजस्वी मुख मंडल व महान व्यक्तित्व
का उनके सरल शब्दों के भाषण का ऐसा प्रभाव पड़ा कि दूसरे दिन समाचार पत्रों ने धर्म
सभा का सर्व श्रेष्ठ व्यक्ति घोषित किया.यही वो क्षण था जब सामान्य सन्यासी हाथ में
भिक्षा पात्र लिए आज युग पुरुष बन गया.
स्वामीजी के सभी व्याख्यानों
का मूल स्वर विश्वजनीयता था.स्वामीजी ने विभिन्न धर्मों की अपेक्षा एक ऐसे धर्म का
निर्वचन किया जिसमें आसमान की तरह विस्तृता और समुद्र की तरह गहराई थी.स्वामीजी ने
अमेरिका के विभिन्न स्थानों पर व्याख्यान दिए.स्वामीजी की इच्छा निष्ठावान अमेरिकन
शिष्यों का समूह बनाकर निःशुल्क शिक्षा प्रारम्भ की .वेदान्त सोसायटी की स्थापना न्यूयार्क
में की.राजयोग पर प्रसिद्ध पुस्तक ‘ज्ञानयोग’ लिखी.सभी धर्मों के आधारभूत तत्व,वेदान्त
का विश्व जनीत सिद्धांत का प्रसार पाश्चात्य जगत में करने के लिए स्वामी जी ने अथक
परिश्रम किया.सं १८९६ के अंतिम काल में भारत के लिए रवाना हुए.
शिकागों धर्मसभा में स्वामीजी
ने मानव और धर्म के सम्बन्ध में कहा- ‘ओ सिंहों,उठो ! इस भ्रम को झाड़ फेंकों कि तुम
भेद हो.’ ‘धर्म भेद,दुराग्रह और उसका भयंकर दुष्परिणाम धर्मान्धिता ने लम्बी अबधि से
इस सुंदर पृथ्वी पर अधिकार कर रखा हैं.उन्होंने इस पृथ्वी को हिंसा से भर दिया हैं,इसे
मानव रक्त से रंजित कर दिया हैं.सभ्यताओं का विनाश किया हैं तथा समूचे राष्ट्रों को
निराशा में डुबों दिया हैं.यदि ये भयंकर राक्षस न होते,तो मानव आज की तुलना में कही
अधिक उन्नत होता.’धर्म सभा में विशिष्ठ प्रतिनिधि के रूप में परिचित स्वामीजी से अत्यंत
रूढ़िवादी ईसाई भी प्रभावित होकर कहते थे कि ‘पुरुषों में ,वे नरेश हैं.’
स्वामीजी के आध्यात्मिक
विचारों के विषय में जी.सी.भाते का कहना हैं कि ‘यद्यपि सदैव ही स्वामीजी शास्त्रार्थ
में विजयी होने थे.तथापि उनका लक्ष्य व्यक्तिगत विजय न होकर लोगों में यह भाव उत्पन्न
करना न कि अब सारे विश्व को वेदान्त के अमूल्य सत्यों की शिक्षा देने का तथा हमारे
देश व समग्र विश्व को यह दिखा देने का कि हिन्दू धर्म मुर्मुष नहीं हैं,समय आ गया हैं.उन्हें
एस बात की शिकायत थी कि वेदान्त को कुछ सम्प्रदाय विशेष की धरोहर माना जाता हैं जबकि
वह समग्र विश्व के लिए शाश्वत प्रेरणा का स्त्रोत हैं.
शिकागों सम्मेलन में स्वामीजी
द्वारा दिए गये भाषण के एक-एक शब्द को लोगों के मन इस तरह आप्लावित किया कि वो सोचने
लगे कि सचमुच हम भेड़चाल के जीवन यापन कर रहे हैं.जैसे सोया हुआ भारत जाग उठा लोगों
में उत्साह की लहरे तरंगित होने लगी.भारत का भाग्य विधाता चिरनिंद्रा से जाग्रत अवस्था
में आ गया हैं.अनवरत चलते स्वामीजी के अभियानों ने भारतीय इतिहास के पन्नों पर स्वणिम
अक्षरों में नाम टंकित हो गया.स्वामीजी अपनी पवित्रता और प्रार्थना व श्री राम-कृष्ण
उपदेश व प्रोत्साहन के कारण तथा ईश्वर की असीम दयालुता से इस मायावी संसार के कुचक्र
में फंसने से बच गये.स्वामीजी को ‘महापुरुष’ नाम उनके सन्यास ग्रहण करने से पूर्व ग्रहस्थ
आश्रम में उनके द्वारा व्यतीत किये गये परम पवित्र जीवन के कारण प्रदान किया गया.
सं १८६३-६४ में स्वामी
विवेकानन्द जी की जन्म शतवार्षिकी विश्वभर में मनाई गई.इस अवसर पर उनकी रचनाओं का विभिन्न
भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया.अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित किये गये.स्वामीजी
के चिरप्रवाही संदेश काल एवं समय की सीमा रेखा को पार कर पूरी मानव जाती के भविष्य
को प्रभावित करते हैं.इसके व्यक्तित्व व संदेशों के प्रभावों को किसी मापदंड की सीमा
में नहीं बांधा जा सकता हैं.स्वामीजी के प्रवचनों की प्रभावित की वास्तविक सफलता जब
होगी,तब मनुष्य के स्वभाव को उच्च आदर्शों में परिवर्तित करने की दिशा में अभिमुख हो.