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रविवार, 19 नवंबर 2017

'तू ही सृष्टि , तुझसे सृजन का सार '
सृष्टि की रचनाकार है तू, तप बलिदान की मूरत है तू,
रूप रस की खान है तू, आदर्शो का भंडार है तू, 
धरा सम सहन शील, जगत माता कहलाती,
सागर सी गहरी ममता, पीयूष स्रोत सी करूणा बहाती,
आस्था गिरि सी अचल तुझमे , अन्नत नभ भी हारा, 
उल्लास भरी मनमोहक मूरत,देव भी तेरे आगे बेहारा,
आभा बनी समाज की,  हूं अभिमान जग की, 
महकती महक नारी जीवन की, सांसो के उपवन की, 
खुशबु का एहसास कराती, घर आंगन की शान बढाती
पसीना बहाती कड़ी धूप में,फिर भी नक्षत्र सी चमकती,
धरोहर है तू दुनिया की, सपनो का संसार रचती,
संघर्ष मय जीवन मे ,भवसागर पार कराती, 
अपने ही आंसू से लिखती, करूणा भरी कहानी, 
तू ही जीवन दाता, चलता सारा संसार, 
तू ही सृष्टि, तुझसे ही सृजन का सार! !!!!
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