नारी महिमा...........
श्रृंगार ही नारी की बेड़ियां – देश को ,समाज को,परिवार को आगे बढ़ाने में की ज्वलंत
समस्याएं हैं जो रोड़ा बनी हुई हैं.उन्ही में से यक समस्या महिला समानता की
हैं.आजादी के इतने साल बिट जाने पर भी महिलाओं को वो स्थान नहीं मिल पा रहा हैं
जिसकी वो वास्तविक हकदार हैं.कानूनन ताकतवर किये जाने पर भी वह आज भी अँधेरे
गलियारे में अपने आप को तलाश रही हैं.पाश्चात्य संस्क्रति व सभ्यता का प्रभाव
भारतीय समाज व संस्क्रति पर भी पड़ा,और बदलाव भी आया हैं.रहन-सहन,खान-पण,शैक्षिक
स्तर,राजनैतिक स्तर,सामाजिक स्तर पर परिवर्तन हुए लेकिन फिर भी आज भी महिलाओं की
स्थिति के लिए सोचना पड़ता हैं.आये दिन उनकी सुरक्षा के लिए,स्तर ऊंचा उठाने के
लिए,अस्तित्व कायम करने के लिए नये-नये कानून,अधिकार,दिवस आन्दोलन चलाने पड़ते
हैं.आखिर ऐसा क्यों?क्यों नहीं इच्छानुसार परिणाम मिले?आखिर ऐसा क्या हैं.सामाजिक
परिवेश मिल पा रहा हैं.आखर ऐसा क्या हैं
सामाजिक परिवेश में जो महिलाओं को आगे बढने से रोकता हैं?ऐसे कौन सी सामाजिक
रीतिरिवाज,रूढ़ियाँ उनकी नस नस में भरी हुई हैं जो उन्हें जन्मजात मिलती हैं.आज
उनकी परवरिश ऐसे माहौल में होतो हैं जो शैक्षणिक,राजनैतिक,आर्थिक स्तर में उच्च
होने पर भी वह पुरुष के आगे कमजोर पड़ जाती हैं.ऐसा क्या हैं उसमे जो उसे नैसर्गिक
रूप से रोक देता हैं.समय के साथ लिंग भेद में परिवर्तन आया हें,लडकियों को आगे
बढने में समाज का,परिवार का भरपूर सहयोग मिल रहा हैं और अपनी हिस्सेदारी साबित कर
रही हैंलेकिन फिर भी ऐसा कुछ हैं जिससे वो बाहर नहीं निकल पा रही हैं.एक ऐसी विचार
धरा में उलझी हुई हैं जो अवमानना करने के लिए रोकता हैं.उस कारण की जद तक पहुँचना
पड़ेगा.उसमे फेरबदल करने पड़ेगे तभी मानसिक सोच बदलेगी.कहते हैं न कि प्रथम बार कुछ
नयापन देखते हैं वे अचम्भित होते हैं लेकिन देखते-देखते वो नयापन ऐसा रंगों में
घुल जाता हैं कि स्वाभाविकता से अपनाने में कोई विचार नहीं करते.
व्यक्तिगत विचर से महिलाओं को
जो चीज पूर्णयता रूप से प्रतिरोध करने को मजबूर करती हैं वो हैं उसकी ऐसे माहौल
में परवरिश,सौपे गये दायित्व जिम्मेदार हैं.जन्म से ही शारीरिक बनाबट ने पुरुषों
से कमजोर जरूर बनाया हैं लेकिन वो आज भी शक्तिस्वरूपा बनकर अपनी ताकत को संकटमोचक
ढाल बनाती हैं.बदलते समय के साथ वातावरण में बदलाव आया हैं लेकिन कुछ जन्मजात गुण जैसे
भावुकता जो पुरुषों से उसमे ज्यादा होती हैं.यह जून उसे गलत का विरोध करने में आड़े
आ जता हैं.और बचपन से कहानी,किस्सों में दादी,नानी से सुनते आये हैं कि नारी तो
त्याग की मूर्ति होती हैं,सहनशीलता की पुजारी हैं,क्र्रुना का सागर हैं,ये सब उसे
सर्वस्व न्यौछावर कर किसी भी मुसीबत का सामना करने में हिचकती नहीं हैं.उसके यही
गुण उसे आगे बढने ,अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने से रोकते हैं.और सबसे बड़ा कर्ण
सामाजिक रीति रिवाज जो महिलाओं को बेड़ियों में जकड़े हुए हैं.वैवाहिक रीतिया सबसे
बड़ी उत्तरदायी हैं महिलाओं को बेडियो में जकड़ने के लिए.ये रीतियाँ महिलाओं के प्रत्येक अंग को
बाँध देती हैं.उसे बाहर निकलने की आजादी नहीं मिल पति हैं.वो ऐसी कशमोकश में फंस
जाती हैं की चाहते हुए भी वह अपने से इन बन्धनों से आजाद नहीं हो पति हैं.औरत जो
श्रंगार करती हैं उसे सर से लेकर पैरों तक बांध देता हैं.श्रंगार का प्रत्येक
प्रतीक उसे किसी न किसी रंग से गुलजार करता हैं.मांग में भरा सिंदूर उसको परिवारों
के बीच की खाई को पाटने के लिए प्रेरित करता हैं.माथे की बिंदियाँ जो गुलाल का
गुलावी रंग बताता हैं लेकिन यह बिंदिया उसके भाग्य की रेखाओं को सीलबंद कर देती
हैं.कानो के कुंडल उसे न तो अपने हित में बातों को सुनने की इजाजत नहीं देते
.आँखों का काजल जो अपने बच्चों को नजर से बचाने के लिए माथे पर टीका लगती हैं,यही
आँखों का काजल उसे बाहर की दुनिया से मरहूम रखता हैं,उसे उसी अँधेरी दुनिया में
रहने की इजाजत देते हैं कि जैसा तुम्हे दिखाया जाये वैसा ही देखो अगर परिवार दिन
को रात कहता हैं तो रात कहो और अगर रात को दिन कहता हैं तो दिन कहो.नाक की नकेल
उसे एक ऐसे घूंटे से बाँध देती हैं जो केवल परिवार की खुशियों को ही सूँघ पाती हैं
,उसे अपनी खुशियों की गंध का अहसास क्षणिक भी नहीं होता.ओठो में लगी खून सी लाल लाली
एक ऐसी चिपको गम यानि कि गोंद का काम करती हैं कि वह ऊंची आवाज में न तो बोल पति
हैं और न ही किसी के द्वारा उस पर हुए अन्याय के विरुद्ध आवाज नहीं उठा पाती.बस
अपने आसुंओं को बहाकर अपनी व्यथा वयां करती हैं.गले में पहना मंगलसूत्र उसे कई
अंधविश्वासों से बांध देता हैं.अपने विरुद्ध हो रहे अन्याय को जहर का घूँट पी कर
रह जाती हैं और इस एक –एक घूँट की काली मणिमाला आजीवन पहने रहती हैं.हाथो में पहने
बाजूबंद उसकी बलशालीता को बांधे रहते हैं.उस पर आक्रमण नही होने देते.हरे रंग की
प्रतीक हरे रंग की मेहँदी को अपने हाथों में रच लिए.मेंहदी रचे हाथों का रक्तिम
रंग और खुशबू सभी का दमन महकता हैं ,मन मोह लेता हैंलेकिन उसके ये महकते हाथ
परिवार की इज्जत बचाने के लिए हैं न कि किसी पर वर करने के लिए.हाथों की चूड़ियाँ
बस पतियों का मन बहलाने के लिए खन-खनाहट जरूर हेंहें लेकिन एस खन-खनाहट कमे वयं
करती उसकी दुःख भरी कहानी किसी को सुनाई नहीं देती. अँगुलियों में पहना हथफूल उसकी
पाँचों उगलियों को एक तान में बांधता जरूर हैं लेकिन किसी पर ऊँगली उठाने की इजाजत
नहीं देते.अगर कभी उठ भी जाती हैं तो काट दी जाती हैं.उसके कमर में बंधी
क्म्र्पेती तो सभी बन्धनों में ऐसी जकड़टी हैं कि न तो वह हवा में उडकर स्व्चन्छद
सांस ले सकती हैं और न ही मर सकती हैं.बीएस,उसके सौन्दर्य को बढाने वाले गहनों में
जड़े हीरा,पन्ना नीलम,मूंगे जमीन से निकले पत्थर मात्र हैं उन्हें भी अपने गहनों
में जड़कर शरीर की सौन्दर्यता में चार चाँद लगा दिए,बस ,और कुछ नहीं.इन पत्थरों ने
उसे भी पत्थर बना दिया.जैसे जडित गहने उसके शरीर की सौन्दर्यता को बढ़ाते हैं,उसी
तरह वो भी बस परिवार की,ड्राईंग हाल की शोभा बढाने वाली वस्तु मात्र.नारी के पैरों
की शोभा बढाता आलता लाल रंग का प्रतीक हैं.साथ ही पैरों में सागर से निकले मोतियों
को घुंघरुओं के रूप में पहनकर अपने पैरों को सजा लिया.उसके पदचापो की छन –छ्नाहट
बीएस घर की वीरानी को मिटाने के लिए हैं लेकिन उसके यह कदम ऐसे रिवाजों में जकड़े
हुए हैं कि यह चिड़ियाँ की तरह फुदक-फुदक कर एक ओर से दूसरे ओर जाकर कुछ सुस्ता कर
चैन की साँस लेने के लिए नहीं हैं.इनका कम तो बस.......दौड़-दौड़ कर सबकी जी हजूरी
करना हैं.उह कभी घर की चौखट को पार करने की इजाजत नहीं देते हैं.अगर भूल बस यह कदम
कभी उठ भी जाए तो तोडकर एक कोने में बिठा दिए जाते हैं.ये सब बंधन महिलाओं पर ही
क्यों?आभूषणों से जडित नारी को पुरुष ने सिर्फ उसे सजावट की ही वस्तु समझा.मानव
महत्वहीन ही समझता रहा हैं और समझता हैं.लेकिन समाज की इस औरत की बनाई रंगीन
दुनिया को प्रकृति के अस्तित्व से जोडकर ,स्रजन की इस डोर को अपने हाथो में ले रखा
हैं.वह प्रकृति के रूप को अपने में ही समाहित नहीं कर लेती हैं बल्कि अपने घर को
भी सजती हैं.उसकी चुनरी में फबते रंग सरसों के फूल हो या टेसू के फूल.आम के पत्तो
से,गेंदे के फूलों से घर द्वार सजाती हैं ,घर आंगन को इन्ही फूलों से रंगोली बना
महकातीहैं. जहा उसकी बारह हाथ की साडी नारी परिधान को सुशोभित करती हैं वही उसे व
उसके अस्तित्व को एक ऐसी सोच में बंधे रखती हैं कि वह चाह कर भी बाहर नहीं निकल
पाती. पुरुषों पर ऐसे बंधन क्यों नहीं?जिससे वह डरे.वह स्वतंत्र रहता आया हैं और
रह भी रहा हैं.हिन्दू समाज से भी बढकर मुस्लिम समाज हैं .उनकी महिलाओं को पूरी तरह
से बुर्के में ढका जाता हैं .साथ ही चार विवाह की इजाजत से महिलाओं की स्थिति बद
से बदतर होती हैं.फ़िलहाल हाल ही में सरकार ने तलाक पर रोक लगाई हैं जिससे मुस्लिम
महिलाओं को चैन की साँस मिली. जब तक कुप्रथाओं पर रोक नहीं लगाई जाएगी तब तक कोई
भी बड़े बदलाव की अपेक्षा रखना निरर्थक हैं.वैसे देखा जाए तो परिधान के बदलाव से इन
बन्धनों की कुछ हद तक उपेक्षा अवश्य हुई हैं लेकिन कुछ ह्नहोनी होने पर सोच वही पर
आकर टिक जाती हैं.शारीरिक बनावट में असमानता होने अर्थ यह नहीं कि उसे कमजोर समझा
जाए.महिलाओं पर रीतिरिवाजों का शिकंजा कसर उसे एक निरीह प्राणी बना दिया
जाए.धार्मिक क्रियाएं केवल स्त्री ही के पल्ले क्यों?पुरुषो को भी इसमे सहभागी
होना चाहिए.अगर महिलाये अपने परिवार के लिए,पति की दीर्घायु के लिए धर्म करती हैं
तो सबसे ज्यादा जरूरत तो पुरुषो के धर्म करने की हैं .स्त्री से पहले यह परिवार
पुरुष का हैं.वैसे भी गृहस्थी की गाडी तो स्त्री-पुरुष रूपी दोनों पहियों से चलती
हैं.