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सोमवार, 24 जून 2019

जीवन के अध्याय

.वह दुनियांदारी को समझकर परिस्थितियों का सामना करके उसे अपने अनुकूल बनाने की कोशिस करते हैं.यह सती हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तरह से जिंदगी गुजारने कि स्वतन्त्रता होती हैं,उसका अपना अलग अंदाज होता हैं.कोई तो जीवन में यथार्थवादी नजरिए से अपना पूरा जीवन व्यतीत कर लेता हैं तो कोई आदर्शवादी दृष्टिकोण को जीवन में ढालकर अपनी जिंदगी जीने का नजरिया बनाता हैं.दोनों का अपनी तरह से जीवन जीने की कला का फायदा होता हैं.
        व्यक्ति को बार-बार असफल होने पर उत्साह नहीं खोना चाहिए.प्रत्येक व्यक्ति पर उसके अतीत के कर्मों की छाप होती हैं जो उसके वर्तमान जीवन पर प्रभाव डालती हैं.जैसा कि डेल कार्मेगी का कथन हैं, ‘जोखिम उठाईए,पूरी ज़िंदगी एक जिखिम हैं,सबसे आगे निकलने वाला व्यक्ति सामान्यतः वह होता हाइन्न,जो कर्म और दुस्साहस के लिए तैयार रहता हैं.’जीवन एक सुंदर फूल और समय एक महान गुरु हैं.इसलिए हम जो हैं,वही बने रहकर वह नही कर सकते,जो हम बनना चाहते हैं.मैक्स डेप्री कहती हैं, ‘करीब सौ देशों के दो लाख सत्तर हजार से ज्यादा लोगों पर हुये शोध में यह बात सामने आई हैं कि अच्छी जिंदगी के लिए दोस्त और परिवार दोनों जरूरी हैं.
        आधुनिक दुनियाँ में या कहने को कह सकते हैं कि हाईटेक की दुनियाँ में मानुषी मशीनी बनकर रह गया हैं,कदम-कदम पर अवरोध उत्पन्न करने वाली समस्याएँ उसके जीवन को असंतुलित और असंतोष पैदा कर रही हैं.आधुनिकता कि होड ने मनुष्य की आपस में मिलने-जुलने कि दूरियों में न्यूनता जरूर ला दी पर आपसी सहयोगिता कि भावना का गला घोंट कर उसे औपचारिकता का पुतला बना दिया हैं.आज मानव मशीनी यंत्रवत से सुसज्जित होकर अपने ऊपर की जाने वाली दयनीयता को कोसे दूर फेंक दिया हैं,जो अपनों से इतनी दूर होकर कभी दुनियाँ में आसरे की तलाश में दूसरे का मुंह ताकता रहता था.मशीनी जगत में मानव उसका आधुनिक अंग बनकर भागमभाग कि दुनियाँ में सम्मिलित होकर उसने अपने व्यक्तित्व पर ढकोसले नैतिक विहीन मूल्यों का मुखौटा चढ़ा लिया हैं.घटती नैतिकता सामाजिक मूल्यों के पतन का कार्न बनती जा रही हैं.मानसिक विकृतियों का जन्म समाज में संस्कार और सभ्यता का अवमूल्यन और अनियंत्रिता से हो रहा हैं.इनके उपजते तनावग्रस्त,अवसाद,हीनता,असंतोषी प्रवृति मानव जीवन का हिस्सा बनती जा रही हैं.आधुनिकता की छाप इन पर पहले से मीलों दूर छिटक गई हैं.आडंबरी दुनियाँ कि सतह तले दाब कर दफन होकर अपनी अंतिम पड़ाव पर टूटती साँसे इसी आशा में चल रही हैं कि कोई अवचेतन हुये मन में संस्कार के बीज बोएगा,उन पर चढ़ी धूल को साफ करके संस्कार का अस्तित्व पहचान कर फिर से अभिन्न अंग बनाएगा.अस्थिरता होने से मानव में विवशता बढ़ती जा रही हैं,जो आगे –पीछे के परिणाम ना सोचकर स्वतन्त्रता पाने के लिए कुछ भी जोखिम उठाने को तैयार हो जाता हैं.जीवन को निर्धारित करने वाली मूल्यों कि दीवारें हिलने लगी हैं.संक्रमित मानव के जीवन में आधुनिकता की लकीर खींच दी गई हैं.असमंजस्य में झूलता मानव ना तो पुरातन से पिंड छुड़ा पा रहा हैं और ना ही खुले दिल से आधुनिकता का चोला ओढ़ पा रहा हैं.इसलिए हमें आजादी के नाम पर जीवन को संतुलित करके अपना व्यक्तित्व विक्स अवरूद्ध नहीं करना चाहिए क्योकि सर्वागीर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए सामाजिक मूल्यों व नैतिक मूल्यों का हनन नहीं करना चाहिए.मानसिक संकीर्णता का विस्तार करते हुये एक संतुलित जीवन सामंजस्य बिधाते हुये जीना चाहिए क्योकि अलवर्ट आईन्स्टीन का कथन हैं कि जीवन एक साईकिल चलाने की तरह हैं.अपना संतुलन बनाएँ रखने के लिए आपको अकेले चलते रहना होगा.अपना जीवन अस्तित्व बचाने के लिए ,उसे गरिमामयी बनाने के लिए सुदृढ़ता,धैर्यता ,साहसी,बड़ी मेहनत आत्मस्वाभिमानी आदि सदगुणों में लवरेज होना चाहिए.एन.लेडर्स कहते हैं,अक्सर,अवसर कड़ी मेहनत के भेष में छिपे होते हैं,इसलिए अधिकतर लोग इन्हें पहचान नहीं पाते.वैसे तो दुनियां रावर्ट फ्रास्ट के अनुसार संकल्पवानों से भारी पड़ी हैं.कुछ हैं,जो संकल्प लेते हैं,शेष कुछ उन्हें ऐसा करने देते हैं.
     अपने आपको कभी भी कमजोर नहीं बनने देना चाहिए क्योकि आपकी कमजोरी शत्रु को ताकतवर बना देती हैं.असफलता-सफलता जीवन का हिस्सा हैं.असफलता मिलने पर हताश होकर बैठना नहीं चाहिए और वही कारण आगे की सफलता के कार्क बनेगे अर्थात असफलता हमें एक मौका ओर देती हैं.लगातार प्रयास करने पर भी सफलता ना मिला तो समय और परिस्थितियाँ हमारे अधिकार में नहीं हैं तो उसे समय के हवाले छोड़ देना चाहिए,न कि उसे दुखद सपने की तरह भूलकर अपने आपको उसके नाकाबिल समझना चाहिए.हमें बादलों से सीखना चाहिए जिस तरह बादल उड़-उड़ कर घनघोर वर्षा केवल सुकोमल फूलों पर ही नहीं बरसते बल्कि काँटों पर भी बरसते हैं.मुसीबतों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय हैं कि अपने आपको काम में लगाए रहो क्योकि खाली दिमाग शैतान का घर होता हैं.ज़िंदगी को सही माने में जीना हैं तो अपनी आदतों में सब्र,हिम्मत,पक्का इरादा शामिल करना चाहिए तभी हम काँटों पर चलकर मखमली ज़िंदगी बना सकते हैं क्योकि जान वेल का कहना हैं कि कठिनाई और अवरोध बस  देशी मिट्टी हैं जिससे पराक्रम और सफलता का विकास होता हैं.किसी भी करी को शुरू करने से पहले उसके अंजाम को ध्यान में रखकर शुरुआत नहीं कि जा सकती लेकिन विचारक स्टीवन कवि का मानना हैं कि कम शुरू करते समय ही उसका अंत साफ नजर आना चाहिए.सफलता पाने के लिए असफलता का सबक सीखना बहुत महत्वपूर्ण होता हैं क्योकि असफलता  उस ट्यूशन कि तरह होती हैं जिसकी मदद  से हम सफल हो सकते हैं.यह सही हैं,बैठे बिठाये या खयाली पुलाव पकाने से रास्ते नहीं मिलते बल्कि उन्हे हमें दूसरों की मदद से खोजना पड़ते हैं.यानि कि देयर इज आलवेज अ वे इन एवरी एमर्जेंसी.       जारी हैं..........

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