जीवन बाधाओं से भरा हैं और बाधाएँ एसी चीजें हैं,जो आपको उस वक्त नजर आने लगती हैं जब हम अपने लक्ष्य से अपनी नजरें हटा लेते हैं.हमें अपनी जिंदगी के मायने स्वयम ही तय करना चाहिए.यह हमारी जिंदगी हैं,दूसरों की दखलंदाज़ी या मायने हमें अपने जीवन पर नहीं थोपना चाहिए.वेदों मेन कहा गया हैं-‘जीव माँ वृथा: अर्थात जीवितों की तरह ज़िंदगी जिओन,मरो मत.’हमारी दयनीय अवस्था पर जब किसी की कृतज्ञता भरी नजरें पड़ती हैं तो यह ऐसी हो जाती है जैसे तूफानी आँधी में उड़ते पत्तों का किसी पर अटक जाना.
जीवन में सुख-दुख भगवान के भेजे गए मेहमान हैं,स्वागत कीजिये अर्थात ‘अतिथि देवो भव.’जीवन एक उपन्यास की तरह होता हैं जियामेन जीवन के विभिन्न पड़ाव उयसके अध्याय होते हैं.जल जैसा जीवन विस्तृत नील वर्ण अंबर प्रकृति के रंग सा.मानव सामाजिक प्राणी होने के कारण बिना सहयोग के जीवन असंभव है.विविधता में एकता का प्रतीक मानवीय सामाजिक जीवन,जल के समान अनेक सर्वोपरि सार्वभौमिक सर्वस्य होने पर भी प्रत्येक की अपनी अलग कहानी,पहचान होती हैं.
यह सत्य हैं कि सफलताएँ हमारे चरित्र को चकाचौंध करती जरूर हैं पर उससे आत्मबल प्राप्त किया जा सकता हैं.व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन जीने के लिए अपने प्रति ईमानदार होने के लिए बहुत बड़े साहस कि जरूरत होती हैं.बिता हुआ समय वापस नहीं आता,यह हम सभी जानते हैं.यह उस बहती हुई नदी के जल कि तरह होता हैं जो किसी एक घाट से गुजर जाने के बाद वापस नहीं आता.इसलिए व्यक्ति को अगर यश पाना हैं तो सामी कि कद्र कीजिये और कठिन परिस्थितियों से ना घबरा कर पीछे हटे बल्कि आत्मसात करे क्योकि उसी मे व्यक्ति का यश और वैभव छिपा हुआ हैं.परिस्थितियां इंसान के सामने कैसी भी हो ऐसे में उसे अपने विवेक व संयम नहीं खोना चाहिए बल्कि धैर्यता के साथ कमर कस कर चुनौतियों की कसौटियों पर खरे उतरना चाहिए क्योकि संयमित रहकर ही जीवन मूल्यों को बचाया सकता हैं.विचलित मन पर विजय पाकर व्यक्ति लक्ष्य को पाने में समर्पित भाव से कर्म करता हैं तो उसे कोई नहीं डिगमिगा सकता.
कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता,जब व्यक्ति अपने आप को पूर्ण मानकर बैठ जाता हैं तो वह अहंकारी हो जाता हैं.अपूर्ण और सामान्य होने के आनंद में ही पूर्णता का आनंद समाया हुआ हैं.बचपन के सहयोग की भावना व्यक्ति के जीवन में भरी होती हैं.व्यक्ति कि सोच में मानवता की भलाई होनी चाहिए.वक्त की मरहम जब व्यक्ति के गमों पर लगती हैं तो वो भी मोम की तरह पिघल जाता हैं,दुनियाँ की दोगुली चाल में नादान मानव भाव खा जाता हैं.और जमाना उसे उम्र भर छलता रहता हैं.नफरत कि आग उसके तन-मन को जला देती हैं.मानव के जहन में पुरानी यादों में, ख्यालों में शीत लहर कि पर्त जमा देती हैं,लेकिन सुबह रवि कि सुनहरी रश्मियां तरोताजा कर देती हैं.मायावी दुनियाँ कि ओट में सब मसलकर रह जाते हैं.
जीवन में सुख-दुख हठखेलियाँ करते रहते हैं,दुखों के बीत जाने पर रिन की सफेदी की तरह झकार की खुशी फैल जाती हैं.हम जीवन बिताते हुये अपने में कई यात्राओं का संग्रहण कर जिंदगी को बक्से में बंद कर देते हैं.और इस बक्से कि यात्राएं सुख के जूते करते हैं और यात्राओं का नक्शा स्केच पेन के रंग की लकीरे खिंच जाती हैं.जिसमें प्रेम का रंग भरा होता हैं.
मनुष्य को डर का मुक़ाबला करना चाहिए,निराशा से उबरना चाहिए क्योकि निराशा की महीन रेखा मानसिक तंत्र को उसी प्रकार पंगु बना देती हैं,जैसे धूल का महीन कण एक चलती घड़ी को बंद कर देता हैं.गेविस्ट कहते हैं कि जिंदगी एक बार ही मिलती हैं,लेकिन अगर इसे ठीक से जिया जाय तो एक बार भी बहुत हैं.जीवन में खुशी बारिश की तरह होती हैं,प्रकृति खुशी और गम दोनों कि बारिश करती हैं.जीवन का आरामदायक सफर बिताने के लिए हमें उम्मीदों का बोझ हटा देना चाहिए. जारी हैं.........