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मंगलवार, 25 जून 2019

जीवन के अध्याय

            जिंदगी एक लंबी सड़क की तरह हैं जिसमें कई गद्दे,उतार-चढ़ाव और स्पीडब्रेकर जैसे कई रूकावटें हैं.ए.पी.जे.कलाम ने कहा हैं कि जीवन एक कठिन खेल हैं,अप इस जन्मसिद्ध अधिकार को केवल एक व्यक्ति बनकर ही जीत सकते हैं.हमारे जीवन कि खुशी अपने विचारों कि गुणवत्ता पर निर्भर करती हैं.जीवन में हर कदम पर हम अपनी विशेषताओं का प्रयोग करके सफलता का अनुभव कर सकते हैं.इसके लिए सफलता कि राह पकड़ने से पूर्व एक अच्छा इंसान बनना पड़ेगा क्योकि आपकी अपनी शराफत दुनियां का सबसे अच्छा आभूषण होती हैं और मनुष्यता को जीवित रखने के लिए समसामयिक घटनाओं और समस्याओं को रोचक तरीके व समर्पण भाव से समाधान करने पर ही हम समाज में फैले अमानुषी कृत्यों,अहिंसा,शोषण,भेदभाव,अन्याय को खत्म कर सकते हैं.अतीत का बोध अत्यंत अवश्यक होता हैं.वर्तमान में हम इस बात से उन्मुख होकर अपने भविष्य को बिगाड़ रहे हैं.यह सही हैं कि वर्तमान में मानव जीवन अर्थहीन होता जा रहा हैं,जीवन का अधिकांशतः संचालन भावनाओं से नहीं बल्कि अर्थ से संचालन हो रहा हैं.समय को कभी भी बर्वाद नहीं करना चाहिए.गुजारा हुआ वक्त मुट्ठी में बंधी रेत की तरह फिसल जाता हैं.इसलिए जिसने भी बचपन के टाइम को पास किया हो,न कि टाइम पास किया हो,उसकी ज़िंदगी कभी फेल नहीं हुई.समय...सतत,अथक और अविराम समय...अपनी ही लय में बहता हुआ,अपनी ही धुन में बजता हुआ समय....यह समय पीछे मुड़कर अतीत को भले न देखता हो,पर वर्तमान कि हर एक धड़कन को साक्षी बना निहारता हैं.वह देखता हैं हैं कि साँझ कि नदी में डूबते हुये सूरज कि रात कि स्याही में घुलती हुई शाम कि नवीनता कि चौखट पर रखी स्मृति को और स्मृति होती नवीनता को देखते ही देखते कल का आगत आज बीतने को हैं.अपनी आखिरी हिचकी की राह तक रहा हैं.पल-पल किसी मुट्ठी से रिस रहा हो जैसे- बूंद-बूंद झरते हुये इसमें कुछ विचार,सुखद घटनाएँ,लिए गए संकल्प होते हैं.
         यह सही हैं,किताबे सभ्यता कि वाहक होती हैं लेकिन जान लुबांक के अनुसार , ‘जमीन-आसमान,जंगल-मैदान,नदियां-झीले,पहाड़-सागर दुनियां के बेहतरीन अध्यापक हैं.ये हमें वो सिखातेन हैं,जो कभी किताबों में नहीं लिखा जा सकता हैं.जीवन विकास का सिद्धान्त हैं,स्थिर रहने का नहीं.लगातार विकसित होना,स्थिर अवस्था में रहने का नहीं.लगातार विकसित होना,स्थिर अवस्था में रहने की आशा नहीं देता,ऐसा जवाहरलाल नेहरू जी ने कहा था.सही भी हैं,ज़िंदगी चलते रहने का नाम हैं.गुमनाम ज़िंदगी गुजारी तो जीवन क्या जिया?हैनरी फोर्ड का कथन हैं कि जीवन में सीखने के लिए ऐसे बहुत से सबक हैं, जिन्हें समझने के लिए उन्हें जीना होगा.जीवन में ना आंसुओं का मूल्य हैं न भावना का.केवल सहना ही सती हैं.बिना सहे तो कोई गति नहीं हैं.अपने प्रति निर्दयी होना पड़ता हैं.कोई भी काम कितना भी काठी क्यों ना हो,अथक परिश्रम से ही हासिल किया जा सकता हैं.कठिन कारी से ही कठिन परिस्थितियों,चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं.उनसे हम सीखते हैं,इस बात का कोई महत्व नहीं हैं कि मानुषी मारता किस प्रकार हैं.महत्व इस बात का हैं कि वो जीवित किस प्रकार रहता हैं. अली हवीव फरमातेन हैं कि, ‘एक लग्न की बात हैं जीवन,एक लग्न ही जीवन हैं.पूछ न क्या खोया,क्या पाया,क्या जीता,क्या हारे हम.
         ज़िंदगी  एक सच्चाई हैं जिसका अनुभव किया जाना चाहिए.हम सपने देखते हैं जिसका जीवन में बहुत महत्व होता हैं.खतरा उठाए बिना किसी भी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योकि खतरे से टकराहट होने पर सच्चाई के अनुभव मिलते हैं.यह सत्य हैं कि ज़िंदगी हम जीते आगे कि तरफ हैं,पर समझते पीछे की तरफ.हाथ पर हाथ रखकर बैठने से ज़िंदगी नहीं गुजरती हैं.निराश लगे तो अपने अंदर उम्मीद की किरण जगाना चाहिए.जैसा कि स्वामी विवेकानंद जी ने कहा हैं कि सब कुछ खोने से बुरा क्या हैं?उम्मीद्द का खोना,जिसके भरोसे पर हम सब कुछ पा सकते हैं.क्योकि जीवन साइकिल चलाने की तरह हैं.सुख-दुख,आशा-निराशा,गम-खुशी,सफलता-असफलता दोनों पहियों को संतुलित करके जीवन कि गाड़ी को खींच ले जाते हैं एक सार्थक,प्रेरणादायी,मूल्यवान ज़िंदगी की ओर.
          जीवन में इस बात का  कोई महत्व नहीं हैं कि किसी ने काम बड़ा किया हैं अथवा छोटा.महत्व तो इस बात का हैं कि आपने अपने हाथों से आत्मा की संगीतात्मक लय पर कुछ ऐसा सृजित किया हैं,जो पहले विद्यमान नहीं था.किसी ने सही ही कहा हैं कि प्यार से देखों,धरती और आकाश दोनों दौड़ रहे हैं,बहुत ही तेज.जीवन कि दौड़ भी अनंत हैं,बंधन तोड़ने का काम मानुषी के हिस्से में आया हैं.मनुष्य निरंतर कार्य करता रहेगा,उसका अंत नहीं होगा.मानवीय क्षमताओं को तोड़ना असंभव हैं लेकिन उसे हम तोड़ते हैं.परेशानियां ज़िंदगी में नहीं हमारे मन में हैं,जिस दिन मन पर विजय पा ली ज़िंदगी संबर जाएगी.जब हमें अपना शब्दकोश में से असंभव शब्द को हटा देना चाहिए.फिर जो कुछ बचेगा,कितना ही चाहे अनिवारी लगे,सत्य ही होगा.व्यक्ति को हर बात में धीरज रखना चाहिए,विशेषकर अपने आप से जब हमें अपने किए कामों मे कमियां नजर आने लगे तो कमियो को लेकर धैर्य न खोये,बल्कि उनका समाधान ढूढ्ने में लग जाना चाहिए.सामाजिक सौद्धेश्यता प्राप्ति में हमारा जुनून होना चाहिए लेकिन जब इंसान कि लोकप्रियता शिखर छूने लगती हैं ,उसमें अहंकार का बीज पनपने लगता हैं तो प्रसिद्धि कि हवा आँधी कि तरह उसके जीवन मूल्यों को धरशयी करने में लग जाती हैं जिससे सामाजिक व्यवस्थाएं चरमराने लगती हैं.        जारी हैं............
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