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सोमवार, 8 जनवरी 2018

“आईये,नववर्षागमन का स्वागत करे,नये अनुबंध के साथ”
फिर वही ३१ दिसम्बर की बेला और नववर्षागमन के सूर्यागमन की प्रथम प्रस्फुटित सिंदूरी किरणों के साथ मित्र गणों,शुभचिंतकों की बधाईयों का सिलसिला,टेलीफोन की ट्रिन....ट्रिन....,मोबाईल पर एसएमएस की भरमार या पोस्टमेन की कॉल बेल में..........अनवरत दो-चार दिवसों तक यह सिल-सिला चलता रहता हैं.बधाईयों में वाही घिसे-पिटे संदेश और इस तरह नव वर्ष का स्वागत कर इतिश्री करते हैं.संदेशों को विस्मरण कर,फिर वही पुरानी दिनचर्या समस्याओं से उलझनें-सुलझनें के साथ साल व्यतीत कर,फिर एक और नये ‘नवीन वर्षागमन’ के स्वागत के लिए अग्रसर हो जाते हैं.हाई टेक होती दुनिया में कही हम खो से गये हैं.हमारा परिवार,हमारे रिश्तें ,हमारी दोस्तों के कहानी –किस्से और तो और हमारा अपना खुद का वजूद इस भीड़ में कही खो-सा गया हैं. पारिवारिक बिखराव तो हुआ ही हैं लेकिन साथ आपसी मतभेदता ने जहां आपसी दूरी को बढ़ोतरी की हैं हैं,वही पारिवारिक बिखराव,रिश्तों में दरार,औपचारिक सम्बन्धों की बहार के कारण हम कही उलझ से गये हैं.तो क्यों न हम ,इस नववर्ष की उदयांचल पर कुछ दृढ संकल्पित होकर ऐसे प्रयास करे-
१-परिवार को गुलाब वृक्ष की तरह बनाएं- आधुनिकता की दौड़ में जिस अहम सामाजिक कुरीति को जन्म दिया हैं,वो हैं ‘व्यक्तिगत परिवार’.बढ़ता पाश्चात्यीकरण के प्रभाव के कारण पारिवारिक बिखराव हुआ हैं.फ्रांसिस बेकन कहते हैं कि ‘परिवार आलू की तरह होते हैं,जिनका बेहतरीन हिस्सा नींव में होता हैं.’सही ही कहा हैं इसलिए हमें नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच सामंजस्य बिठाकर,एक दूसरे की महत्वत्ता को समझाना चाहिए.जिस तरह गुलाब का वृक्ष अपने कांटे से सुगन्धित पुष्प की रक्षा कर प्राकृतिक सौन्दर्य को दुगुना शोभायमान कर देते हैं उसी तरह हमारा परिवार भी एक गुलाब वृक्ष की तरह हैं .कांटे के रूप में कुछ सैद्धांतिक नियम हैं जो पुष्प रूपी सदस्यों को बाहरी हस्तक्षेप व बाहरी मुश्किलों से बचाकर उन्नति की ओर अग्रसर कर,यश कीर्ति फैलाने में मददगार होते हैं.लेकिन वर्तमान की लू-लपट रूपी पाश्चात्य सभ्यता,सर्वहवा रूपी वैचारिक मत भेदता ने पुष्पों व नव कली को छितराकर वृक्ष रूपी परिवार की शोभा पर प्रश्न चिह्न लगा दिया हैं.इसलिए हमे चाहिए ,हम अपने इस सौन्दर्यवान गुलाब के वृक्ष रूपी परिवार को आपसी समझ-बूझ से समस्याओं का समाधान कर अपने वागबान को ऐसा महकाए कि इस आदर्शात्मक परिवार की महक,तितलियों रूपी सन्देशवाहक दूर-दूर तक प्रत्यारोपित करे और परिवार के सभी सदस्य मोतियों की माला में बंधकर चहुओर कांति बिखेरे.
२-नीरस जीवन में रिश्तों पर जम रही उबासी को मिटायें- रिश्तें ज्वार-भाटे की तरह होते हैं,जो जब तक समन्दर में रहती हैं ,तब तक मामूली सूनामी होती हैं.सही ही कहा हैं कि रिश्तों में पारदर्शिता होनी चाहिए.ज्यादा अपेक्षा रखने पर असंतोष होना स्वाभाविक हैं.बोल भी तोल के बोलने चाहिए क्योंकि पैर फिसल गया तो उससे सम्भल जायेंगे लेकिन जुवान फिसल गई तो उससे लभी नहीं उबर सकते.मदर टेरेसा ने कहा भी हैं ‘मीठे बोल संक्षिप्त और बोलने में आसान हो सकते हैं लेकिन इसकी गूँज सचमुच अनन्त होती हैं.और हाँ,हर मजबूत रिश्तें की सफलता का मूलमंत्र होता हैं कि आपसी असहमति होने पर,उसका साथ न छोड़े तथा हमे एस बात का भी आभास होना चाहिए कब हमे उसे सहारा देना हैं और कब हमे उनके बीच दखल अंदाजी नहीं करना हैं.इस भागमभाग की दुनियां में जीवन नीरस सा हो गया हैं.रिश्तों में औपचारिकता प्रवेश कर गई हैं.इसलिए रिश्तों में ताजगी बनाएं रखने के लिए समय-समय पर रिश्तों की अहमियत याद दिलाते हुए मन में छिपी हुई कुप्रव्रतियो का परिमार्जन कर मन में पारदर्शिता लानी चाहियें.उदासीन रिश्तों में नवीनतम आशाओं का स्न्चर्ण करने के लिए आपसी विचार विमर्श व वार्तालाप करना चाहिए.रिश्तों में अहंकार की जगह स्वाभिमान होना चाहिए.रिश्तें मुट्ठी में बंद रेत की तरह होते होते हें,उनमें नमी बनाएं रखना चाहिए.निःस्वार्थ भाव से बने रिश्ते सदैव हमारे आस-पास विचरण करते रहते हैं.बस, जरूरत हैं,उन्हें जीवित रखने के लिए अपनी उपस्थिति की श्वासें बरकरार रख उन्हें मजबूती प्रदान करे.
३-मनुष्य के रूप में नेक रिश्ता,दोस्ती का,बनाएं रखें- दोस्ती का रिश्ता सेहत और ख़ुशी के लिए अतिआवश्यक हैं.दोस्ती की,उम्र के साथ अहमियत बढती जाती हैं क्योंकि यह दुनियां का बेशकीमती तोहफा व शुभचिंतक हैं जो हमारे अर्थहीन जीवन को अर्थपूर्ण बनाकर सफलता का सच्चा रास्ता दिखाता हैं.दोस्ती हमारे मूल्यांकन का एक मापदंड भी हैं.ज्ञानी दोस्त जीवन का सबसे बड़ा वरदान हैं,जो दुःख में राहत,कठिनाई में पथप्रदर्शक बनता हैं.इसलिए दोस्त जीवन को ख़ुशी,जीवन को खजाना और मनुष्य के रूप में नेक फरिश्ता हैं.जो हमारे दुःख-सुख में काम आता हैं.एक ठर्रे पर चलने वाली जिन्दगी में नई सोच से रूबरू कराकर जीने का एक नया अंदाज सिखाता हैं.आज के इस दौर में एक सच्चे दोस्त की आवश्यकता और महत्वता और भी बढ़ जाती हैं क्योंकि वह हमारे नीरसता भरे जीवन को खुशनुमा बनाने का काम करता हैं.दोस्ती को हम गढ़ते हैं इसलिए दोस्ती के रिश्ते को निःस्वार्थ भाव से,निश्छल रूप से सुदामा-कृष्ण की तरह निर्वाह करनी चाहिए.क्योकि दोस्ती की मिशाल से दुनियां प्रकाशमान होती हैं.
४-बदलाव की शुरुआत अपने आप से करिये- जीवन क्षणभंगुर हैं.संताप और गिले शिकवे को गले रहेगे तो जिन्दगी और भी दूभर हो जायेंगी.इसलिए स्वयं को क्षमा करिये और अपराधबोधहीन बनिये.अतीत के कैदी बनना छोडकर अपने भविष्य के निर्माता बने.अपनी सोच को दूरदर्शी यंत्र की तरह बनकर,दूसरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने लेकिन दूसरे का सिर काटकर ऊंचा बनने की कोशिश करके नहीं.ठर्रे वाली जिन्दगी से छुटकारा पाकर बदलाव की शुरुआत अपने आप से कीजिए.स्वयं से प्यार करे,वार्तालाप करके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाया जा सकता हैं.ऐसा करके आप अपने अंदर छिपी बुराईयों का परिमार्जन कर स्वयं को अच्छा बनने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं.जब कभी आत्मविश्वास की कमी के कारण डगमगा जाते हैं तो अपने आप से प्रश्न करिये.पिंजरे में बंद पंक्षी की तरह जीवन न जीकर हमे अपनी पूर्णता के लिए अपनी सोच को किसी सीमा या मर्यादा से नहीं बांधना चाहिए.भविष्य की कल्पना पूर्वाग्रही सोच के दायरे में न रखकर करे,बल्कि आशाभरी आनन्दमयी संतोषप्रद बातें अंतर्मन में विराजमान करनी चाहिए.आशा वह शक्ति हैं जो उन परिस्थितियों में भी हमे प्रसन्न बनाएं रखती हैं जिनके बारें में हम समझते हैं कि वे खराब हैं.इसलिए स्वयं पर आत्म नियन्त्रण रख,आत्मविश्वासी बनने का प्रयास कर,कदम आगे बढायें.
५-जीवन को प्रयोग की तरह बनाईयें- सफलता-असफलता जीवन का अहम हिस्सा हैं.जीवन में हर का मतलब-अंत नहीं बल्कि एक नई शुरुआत होती हैं.अगर हमें उपेक्षा का शिकार नहीं होना हैं तो किसी से अपेक्षा नहीं रखना चाहिए.वैसे भी जीवन में महत्वपूर्ण होता हैं अपने जीवन से निरर्थक बातों को त्यागकर,जीवन को कितना शिष्टता पूर्वक जीकर इस दुनियां और दुनियां में रहने वालों को कितना प्यार दिया.ईश्वर का अलावा किसी ओर से उम्मीद नहीं लगाना चाहिए.सरस की तरह जीवन जीना चाहिए.अतीत से सीखकर,आज को बनाकर,भविष्य को गढना चाहिए.ईश्वर ने अगर एक चीज का समान बटवारा किया हैं तो वह हैं-सभी के पास चौबीस घंटे.इसलिए समय का रोना न रोकर किसी महान ध्येय के लिए जीवन को समर्पित करना चाहिए.धन्यवाद शब्द को अपने शब्द कोष में सम्मिलित कर तहे दिल से दूसरों की प्रशंसा करे.उम्मीद के दायरों से किसी को नहीं बांधा जा सकता.असफलताओं से निराश न होकर अवसर हमेशा तलाशते रहने का प्रयत्न करते रहना चाहिए.उम्मीद और सपनों का कारंवा साथ लेकर उच्च विचारों को जीवन का लक्ष्य बनाएं.मूल्यांकन कर सकारात्मकता और स्वेच्छाचारिता से सोचिये.समय बड़ा बलवान होता हैं और चुनौतियों से जिन्दगी रोमांचक बनती हैं.
                 सारांशतः संक्रमित दौड़ से गुजरते,आधुनिकता की दौड़ में हमें उबासी भरी जिन्दगी में नासूर बने रिश्तों में मिठास की परत चढाएं.नववर्षागमन का स्वागत इसी दृढ संकल्पित वैचारिकता के साथ खुश रहने व खुशियाँ बांटकर आगामी वर्ष के लिए प्रेरणादायी स्त्रोत बनें.



27/12/2017 (12 days ago)



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