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रविवार, 21 जनवरी 2018

                नारी ‘एक करूणामयी माँ’
 नारी विविधता में एकता का प्रतीक हैं.उसके रूप एक नहीं अनेक हैं.वह माँ,बहिन,पत्नी की भूमिका निभाती हैं.बच्चों के मुंह से पहला शब्द माँ निकलता हैं.वह बच्चो की प्रथम शिक्षिका होती हैं.माँ शब्द सुनते ही मन में एक अजीब सी हलचल होने लगती हैं,मन हिलौरे लेने लगता हैं.मन मस्तिष्क में एक ऐसी यादों का चलचित्र घुमने लगता हैं जो अपने आप में एक अनूठा,अमित यादगार पलों से भरा उभर आता हैं.प्रत्येक व्यक्ति के मन में माँ के लिए एक सॉफ्ट कार्नर होता हैं.हम कितने भी बड़े हो जाए,चाहे जितने रिश्ते हमारे जीवन को सुद्रढ़ बनाने में जिम्मेदार रहे हो लेकिन जीवन में माँ से बढकर कोई नहीं होता हैं.शब्द हीन उसके प्रति कृतज्ञता हेंहें जिसे कभी भी उतारा नहीं जा सकता हैं ‘मेरी माँ’ शब्द सुनते ही हम एक ऐसी ममतामयी दुनियां में पहुच जाते हैं,जिसका सफर अंतहीन होता हैं.प्रत्येक माँ की एक अपनी छविहोती हैं.सभी के लिए अपनी माँ का स्थान,दूसरों की माओं से सर्वोपरी होता हैं.एक दूसरे की माओं की तुलना करना उसकी त्यागमयी मूर्ति पर ऊँगली उठाना होता हैं.माँ का रिश्ता सब रिश्तों को ओछा बना देता हैं.एक माँ अपने बच्चों की परवरिश के लिए वो सब करती हैं,जितनी उसमे सूझ-बूझ होती हैं.बच्चों की परवरिश के लिए अपनी स्वार्थों ,इच्छाओं का बलिदान तक कर देती हैं.दुनियां के लोगों के सामने ढाल बनकर खड़ी रहती हैं.बच्चे बड़े होकर उसे कितना भी तिरस्कृत करे,अनादर करे लेकिन वह कभी इस व्यवहार से कभी भी दुखी नहीं होती हैं.बच्चों के मुख से माँ शब्द को सुनते ही वह अपने सब अनादर भूलकर प्यार से उसका माथा सहलाने लगती हैं.कहे गये कड़वे बचनों को प्रे कर मुख से आशीर्वाद भरे शब्दों की वर्षा होने लगती हैं. माँ एक ऐसी त्यागमयी मूर्ति हैं जिसका प्रेम अमित,अविरल,अनंत,असीम,सम्वेदनाओं से भरा हैं जिसको नश्वर करने में समस्त ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ सूक्ष्म हैं.जगत की कोई भी माँ ऐसी नहीं होगी,जिसके लिए बच्चों को प्यार करना बोझ हो.पौराणिक कथाओं में भी माओं के अनेकानेक रूप देखने-सुनने को ,जीवन में सरोकार करने के लिए उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए अपने को उस रूप में ढालने के लिए प्रेरणादायी बनती हैं.लेकिन मों की ममता, कठोरता,त्याग,स्वार्थ में कहीं भी भटकाव नहीं मिला जिससे उसका रूप उसके जीवन का संकट बन गया हो.यह एक अलग बात हैं कि इस आधुनिक मायावी,कलयुगी दुनियां ने अपने स्वार्थ के लिए एक नाटकीय प्रस्तुत कर माँ शब्द की तोहीन की हैं.जबकि माँ-बच्चें का रिश्ता,चाँद और तारें की तरह होता हैं.जिस तरह से चन्द्रमा में अपनी स्वयं की रौशनी नहीं होती हैं,वह सूर्य की रौशनी से चमकता हैं.यही समानता बच्चों के जीवन में माँ-बाप की होती हैं.माताओं को कागज के हाशियें पर रख दिया जाता हैं,खालो कागज पर हाशियाँ दिखता हैं.स्पष्ट होता हैं दीर्घ भाग पिता का,लघु भाग माता का.यही भूमिका ग्रहस्थ जीवन की हैं.इस हाशियें वाले पेज पर मंथन किया जाए तो स्पष्ट जीवन नैया उभर आती हैं.यह बात सही हैं कि जब पेज का बड़ा हिस्सा भर दिया जाता हैं तो उसके सामने साईड का हाशियाँ दिखता हैं.छोटा हैं जरूर,जब इसमें मुख्य बातें लिख दी जाती हैं तो प्रष्ठ का यही बड़ा हिस्सा ओछा लगने लगता हैं.कहने का तात्पर्य यह हैं कि इसी छोटे भाग में हम प्रश्न,उत्तर,संख्या आदि लिखते हैं जो किसी भी लेख के लिए मुख्य होते हैं और इन्ही शब्दों से उस बड़े हिस्से में लिखे हुए वाक्य समझ में आते हैं उही शब्द उन वाक्यों को परिभाषित तक करते हैं.आखिर हैं यह क्या हैं?यह क्या दिखाने चाहते हैं?इसी प्रकार माँ को जिन लेखकों ने हासियें की उपाधि से नवाजा हैं,वो शायद भूल गये कि हमने भूलवश माँ को कितनी बड़ी उपाधि से नवाज दिया,क्योंकि एक पुरुष का पूरा व्यक्तित्व नारी बिना अधूरा हैं.उसका अहंकार एस बात को स्वीकार करे या न करे .जीवन के हर प्रष्ठ पर नारी का अस्तित्व विद्यमान रहता हैं.पुरुष का यही अहंकारी रूप भाई,पुत्र,पिता,दामाद के रूप में ,जीवन में जीवत रहता हैं.
                   चन्द्रमा को माँ की उपमा दी गई और तारे उसके बच्चे.तारों की प्रदीप्ति से ही चन्द्रमा उज्ज्वलावान होता हैं.बच्चे अगर अच्छे बन जाते हैं तो माँ का मस्तक प्रज्ज्वलित हो जाता हैं.सैकड़ों तारे रूपी बच्चे गर्दिश में टिमटिमाते हैं.कोई तीव्र रोशन होता हैं,कोई धीमी रौशनी देता हैं,तो कोई विलुप्त की कगार पर होता हैं,तो कोई ऐसा भी दिखता हेंतीव्र रोशन होता हुआ सदा के लिए शांत हो जाता हैं.यही आम जिन्दगी में भी होता हैं.एक माँ अपने लाखों –करोड़ों का बोझ उठा लेती हैं,उसकी चमक से चमकती भी हैं.तात्पर्य यह हैं कि अगर बच्चे गुमान करे ,देखों,मेरी चमक से आज तुम चमक रही हो,तुम्हारा मस्तक ऊंचा हैं.लेकिन उसका दुसरा अर्थ यह भी तो हैं मेरी चमक यह याद दिलाती हैं कि तुम्हारी जिन्दगी में मेरा अस्तित्व हैं ,अगर मैं नहीं होती तो इस दुनिया में तुम कैसे चमकते.हम दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं.लोरियों में,गीतों में,कहानियों में,किस्सों में हमेशा से चाँद-तारों को माँ-बच्चों की उपमा दी जाती रही हैं और दी जाती रहेगी.चन्द्रमा को माँ के समकक्ष मानने वालों ने दागी चाँद भी मना हैं.चाँद के इस दाग को किसी ने खूब्सूरती के लिए ‘बिंदी’ माना हैं तो किसी ने कलंकित.रामायण की कथा में माँ कैकेई को समाज का,परिवार का कलंक माना हैं.स्वार्थन्धिता में पुत्र मोह वश कैकेई ने भगवान राम को वनवास दे दिया था. लेकिन मायावी द्रष्टिकोण छोडकर दूसरे द्रष्टिकोण से देखा जाए तो ,अगर माता कैकेई ने राम को वनवास न दिया होता तो शायद राम का चरित्र साधारण मानवीय रूप में ही होता.यह बात शत-प्रतिशत सही भी हैं राम को भगवान राम बनाने के लिए कठोर प्रवास चुना सिर्फ बेटे के सिंहासन की लोलुप्त्ता में.वैसे राम पर माता कैकेई का प्रेम भरत से अधिक था.अगर इस प्रसंग को थोड़ा गहराई से सोचा जाए कि हमारी आम जिन्दगी में भी इस तरह की घटना घटित होती हैं.एक माँ अपने बेटे का जीवन संवारने के लिए घर-परिवार से दूर भेज देती हैं.अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए अपने से अलग कर देती हैं.लेकिन उसका प्यार कम नहीं होता हैं.अलग रहकर भी उसके प्रति दिन-रत चिंता करती रहती हैं.माँ का प्यार ही उसे बिगाड़ने सुधरने के लिए ही जिम्मेदार होता हैं.माँ सौतेली हो या सगी,आखिर माँ,ममतामयी मूरत हैं जिसने ईश्वर को जन्म दिया,इसी कारण वो ईश्वर से बढकर हैं.हम बच्चे भाग्य शाली हैं जो हमारा पालन पोषण ,उसकी स्नेहमयी सघन शीतल मयी छत्र छाया में हुआ.सभी अधिकारों से बड़ा मात्रह्क होता हैं.जिसे हम जगत की सुख सम्रद्धि के बदले बी किसी को नहीं दे सकते.मात्र शक्ति इस धरा की सभी शक्तियों से सबसे बड़ी हैं जिसके विशालकाय ह्रदय में ममतामयी,करूणा मयी औरवात्सल्य की त्रिवेणी सदैव प्रवाहित रहती हैं.अनंत गुणों से जडित माँ का बखान करने में हम शब्द हीन हो जाते हैं.वह ईश्वर की साक्षात स्वरूप,परमात्मा की तरह,स्म्द्रष्टि,सम्वेदनशील,डाटा एवं शक्ति की असीम पुंज,निःस्वार्थ,प्रेममयी मूर्ति,दृढ निश्चयी,उदारमना,विलक्षण सहनशील,साहस की प्रतिमूर्ति,ममता का सागर हैं.
                 माँ के व्यक्तित्व और कृतित्व का प्रभाव बच्चों पर पढ़ता हैं.ममता की छाँव तले हम बच्चों का सारा जीवन  व्यतीत होता हैं.हम ऊँगली थामकर जीवन के डग भरते हैं और नये-नये रास्ते जीवन के तय करते हैं.जब कही हम लडखडाते हैं तो हमे सम्भालने के लिए अपना हाथ थमा देती हैं.उसी के आंचल तले हम दुनिया दारी का पाठ पढ़ते हैं वो हमारी प्रथम शिक्षिका होती हैं.वो ही हमे उंगुली पकडकर बारहखड़ी का अ,आ,इ,ई.....लिखाती और पढाती हैं.हमारे व्यक्तित्व निर्माण में प्यार से ,दुलार से,डांट-डपटकर सही गलत में अंतर बतलाती हैं.जीवन में खुशियाँ बिखेरने वाली माँ हम बच्चों को ऐसे संस्कारों से जड़ित क्र एक सूत्र में पिरोती हैं कि हमे कदम डगमगाने पर हम सम्भल जाए हमे ऐसा मजबूत बनाती हैं.हमारे जीवन को शक्ति देने वाली माँ हमे आत्म विश्वासी बना के जीवन जीने की कला सिखाती हैं.उसका दुलार वह प्यार का झोंका होता हैं जिसमे दुआंओ से भरा ममता का आंचल होता हैं.व्यथित मन को बड़े ही सहजता से वो पढ़ लेती हैं वो हमेशा नजदीक ही रहती हैं.हमारी समस्याओं का सदैव चिन्तन करती रहती हैं ,मथती रहती हैं वो अपने प्यार से सहलाकर और दुआओं से ,चिंता मुक्त कर,वुहार देती हैं.    
                  सारे सुख एक ही नाम में समायें हैं क्योंकि हर रिश्ता हम बनाते हैं,एक यही रिश्ता हैं माँ का ,जो ईश्वर के जिम्मे हैं.सही भी हैं सब रिश्तो से बड़ा माँ का रिश्ता होता हैं.और सब गुरुओं से बड़ा गुरु माँ होती हैं जो हमे सांसारिक दुनियां के महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ ज्ञान हमे प्रदान करती हैं.माँ हमे परेशनियों में मजबूती से खड़ा होना सिखाती हैं.पिता हमारे लिए सम्बल प्रदान बनते हैं तो माँ-दादी की आंधी के सामने पैर जमायें खड़ी रहती हैं.माँ पूरी दुनियां चलाती हैं.सभी का पेट भरने वाली माँ ही तो होती हैं जो भूखे पेट रहकर सबके सामने तृप्त होने का बहाना करती हैं.सारा स्नेह खाना बनाते समय रोटियों में लुटा कर,वह जीवन का हर सुख प्रदान करती हैं.उसका प्यार वह प्याला हैं जो कभी खाली नहीं होता.कभी-कभी वो मजबूर जरूर हो जाती हैं लेकिन वह थकती नहीं हैं.रविशंकर शुक्ल जी का कथन हैं कि – ‘माँ मभी नहीं थकती बच्चों के काम से जैसे कि नहीं थकती धूप जीवन के नाम से.’ लेकिन माँ जितना धैर्यवान कोई नहीं हो सकता,उसने अपना सब सुख चैन त्याग कर बच्चों को स्वतन्त्रता से रहने देती हैं.माँ के सामने हम बच्चे हजारों नाज-नखरे करते हैं लेकिन यह सब दिखावे की दुनियां के सामने विलुप्त हो जाते हैं.कितने ही काम हम माँ से हट करके कराते रहते हैं और माँ प्यार भरी झिडकी से सब काम करती रहती हैं.कितनी भी क्यों न थकी हो लेकिन वो हमेशा काम करने के लिए तत्पर रहती हैं.हम बच्चे जरा-जरा सी उलझनों में उलझ जाते हैं और थकहार कर बैठ जाते हैं लेकिन माँ ऐसे में हमे हिम्मत देती हुई ,भविष्य में आने वाली समस्याओं से निपटना सिखाती हैं.विषम परिस्थितियों का कैसे सामना करना हैं ,यह हमे सिखाती हैं.हम बच्चे अपनी रूठी हुई माँ को अपनी कभी बचकानी हरकतों से ,तो कभी नटखट शरारतों से उसे मना लेते हैं.
                  माँ शब्द में एक जादू होता हैं.हम बच्चे जब किसी मुसीबत में होते हैं तो उसकी हल्की सी मुस्कराहट वैध की तरह काम करती हैं पल भर में सब कुछ सामान्य हो जाता हैं.उसके नर्म हाथो का स्पर्श क्षण भर में दुःख तकलीफों को उडनछू कर देता हैं.एक सुकून सा अहसास कराती माँ की लोरियां हमे चैन की नींद सुलाती हैं.सही भी कहा गया हैं-माँ का दर्जा ईश्वर से बढकर हैं .क्योकि भगवान को खुश करने के लिए हम उसके सामने प्रतिदिन दीपक जलाते हैं और अपने सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं लेकिन माँ के आगे हमे यह सब नहीं करना पड़ता वो तो सब कुछ बिना किसी शिकायत के बच्चों के ही नहीं बल्कि परिवार के समस्त जन का ख्याल रखती हैं.उसके हाथ सदैव आशीर्वाद देने के लिए उठे रहते हैं और मुंह हमेशा दुआओं के लिए खुला रहता हैं.ऐसी होती हैं माँ.....उसके दुलार को बयाँ नहीं किया जा सकता.उसके दिए संस्कार,दुआएं जीवन को आसान बनाती हैं.उसका विशवास हम बच्चों की ताकत बनता हैं.माँ हमारे लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं.उसका आत्मविश्वास हमारे जीवन का प्रेरणा स्त्रोत बन जाता हैं.वो हमारे हर उस सवाल का जबाव ढूढने में हमारी मदद करती हैं जो हमारी पहुँच से बहुत दूर होते हैं.माँ केवल एक इंसानी मूर्त नहीं हैं बल्कि वह एक अद्रश्य ताकत हैं जो हमेशा छाया की तरह साथ रहती हैं.और हम अपनी दुआओं,आशीर्वादों,ममतामयी दुलार की वृष्टि करती रहती हैं.इसके इस असीम स्नेहभाव से सराबोर रहते हैं जिनको शब्दों में बयाँ नहीं कर सकते.इन एहसासों को सिर्फ महसूस कर सकते हैं ,किसी पन्ने पर वर्णित नहीं.हम वृक्ष रूपी सघन छाया तले वेफिक्री से जीवन गुजारते हैं.माँ के प्यार की गहराई को न तो व्यक्त किया जा सकता हैं और न ही शब्दों केरूप में किसी पन्ने पर काले अछरों में छापा जा सकता हैं.लेकिन उसके प्यार को अपने अनेह सिक्त शब्दों में बाँध कर उसके प्यार को ओर मजबूत बनाया जा सकता हैं.एक दिलासा का आलम बनता हैं.जावेद अख्तर का कथन हैं –‘मुझकों यकीन हेंस्च कहती थी जो भी अम्मा कहती थी,जब मेरे बचपनके दिन  थे,चाँद में परियां रहती थी.

      हमारे सुख-दुखों से जुड़ा एक रिश्ता जो स्वयं को मिटाकर,अपने को हमारे लिए जीवित रखती हैं.यह एक ऐसा अनूठा रिश्ता होता हैं जिसमे बच्चे माँ को कितना भी बोझ समझे,भले ही बड़े होकर उस पालनहार माँ के प्रति कडवाहट रखे लेकिन वो कभी बच्चों को बोझ नहीं समझती ,उसकी सब गलतियों पर पर्दा डाल देती हैं.ईश्वर के पश्चात् हम सबसे ज्यादा रिनिजं हैं तो केवल अपनी माँ के.जो हमे दुनियां में लायी और हमे जीने योग्य बनाया.इसलिए हम उम्र के किसी भी पढाव पर हो लेकिन माँ ,अपने आशीर्वादों से भरे हाथ उठाने का अधिकार मत खोना.हम बच्चों के सामने कितने भी झंझावत हो,कितनी भी मुश्किलें आये लेकिन शक्ति स्वरूपा माँ के सामने कोई नहीं ठहर पाता.वो हमेशा हमारे चारों ओर के दुःख-दर्द को मिटाकर खुशियों को बिखेर देती हैं.
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