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सोमवार, 22 जनवरी 2018

                नारी,‘एक करूणामयी माँ’
 नारी विविधता में एकता का प्रतीक हैं.उसके रूप एक नहीं अनेक हैं.वह माँ,बहिन,पत्नी की भूमिका निभाती हैं.बच्चों के मुंह से पहला शब्द ‘माँ’ निकलता हैं.वह बच्चो की प्रथम शिक्षिका होती हैं.माँ शब्द सुनते ही मन में एक अजीब सी हलचल होने लगती हैं,मन हिलौरे लेने लगता हैं.मन मस्तिष्क में एक ऐसी यादों का चलचित्र घूमने लगता हैं जो अपने आप में एक अनूठा,अमित यादगार पलों से भरा उभर आता हैं.प्रत्येक व्यक्ति के मन में माँ के लिए एक सॉफ्ट कार्नर होता हैं.हम कितने भी बड़े हो जाए,चाहे जितने रिश्ते हमारे जीवन को सुद्रढ़ बनाने में जिम्मेदार रहे हो लेकिन जीवन में माँ से बढकर कोई नहीं होता हैं.शब्द हीन उसके प्रति कृतज्ञता हैं, जिसे कभी भी उतारा नहीं जा सकता हैं ‘मेरी माँ’ शब्द सुनते ही हम एक ऐसी ममतामयी दुनियां में पहुच जाते हैं,जिसका सफर अंतहीन होता हैं.प्रत्येक माँ की एक अपनी छवि होती हैं.सभी के लिए अपनी माँ का स्थान,दूसरों की माओं से सर्वोपरी होता हैं.एक दूसरे की माओं की तुलना करना उसकी त्यागमयी मूर्ति पर ऊँगली उठाना होता हैं.माँ का रिश्ता सब रिश्तों को ओछा बना देता हैं.एक माँ अपने बच्चों की परवरिश के लिए वो सब करती हैं,जितनी उसमे सूझ-बूझ होती हैं.बच्चों की परवरिश के लिए अपनी स्वार्थों ,इच्छाओं का बलिदान तक कर देती हैं.दुनियां के लोगों के सामने ढाल बनकर खड़ी रहती हैं.बच्चे बड़े होकर उसे कितना भी तिरस्कृत करे,अनादर करे लेकिन वह कभी इस व्यवहार से कभी भी दुखी नहीं होती हैं.बच्चों के मुख से माँ शब्द को सुनते ही वह अपने सब अनादर भूलकर प्यार से उसका माथा सहलाने लगती हैं.कहे गये कड़वे बचनों को परे कर मुख से आशीर्वाद भरे शब्दों की वर्षा होने लगती हैं. माँ एक ऐसी त्यागमयी मूर्ति हैं जिसका प्रेम अमित,अविरल,अनंत,असीम,सम्वेदनाओं से भरा हैं जिसको नश्वर करने में समस्त ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ सूक्ष्म हैं.जगत की कोई भी माँ ऐसी नहीं होगी,जिसके लिए बच्चों को प्यार करना बोझ हो.पौराणिक कथाओं में भी माओं के अनेकानेक रूप देखने-सुनने को ,जीवन में सरोकार करने के लिए उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए अपने को उस रूप में ढालने के लिए प्रेरणादायी बनती हैं.लेकिन मों की ममता, कठोरता,त्याग,स्वार्थ में कहीं भी भटकाव नहीं मिला जिससे उसका रूप उसके जीवन का संकट बन गया हो.यह एक अलग बात हैं कि इस आधुनिक मायावी,कलयुगी दुनियां ने अपने स्वार्थ के लिए एक नाटकीय प्रस्तुत कर माँ शब्द की तोहीन की हैं.जबकि माँ-बच्चें का रिश्ता,चाँद और तारें की तरह होता हैं.जिस तरह से चन्द्रमा में अपनी स्वयं की रौशनी नहीं होती हैं,वह सूर्य की रौशनी से चमकता हैं.यही समानता बच्चों के जीवन में माँ-बाप की होती हैं.माताओं को कागज के हाशियें पर रख दिया जाता हैं,खाली कागज पर हाशियाँ दिखता हैं.स्पष्ट होता हैं दीर्घ भाग पिता का,लघु भाग माता का.यही भूमिका ग्रहस्थ जीवन की हैं.इस हाशियें वाले पेज पर मंथन किया जाए तो स्पष्ट जीवन नैया उभर आती हैं.यह बात सही हैं कि जब पेज का बड़ा हिस्सा भर दिया जाता हैं तो उसके सामने साईड का हाशियाँ दिखता हैं.छोटा हैं जरूर,जब इसमें मुख्य बातें लिख दी जाती हैं तो प्रष्ठ का यही बड़ा हिस्सा ओछा लगने लगता हैं.कहने का तात्पर्य यह हैं कि इसी छोटे भाग में हम प्रश्न,उत्तर,संख्या आदि लिखते हैं जो किसी भी लेख के लिए मुख्य होते हैं और इन्ही शब्दों से उस बड़े हिस्से में लिखे हुए वाक्य समझ में आते हैं उही शब्द उन वाक्यों को परिभाषित तक करते हैं.आखिर हैं यह क्या हैं?यह क्या दिखाने चाहते हैं?इसी प्रकार माँ को जिन लेखकों ने हासियें की उपाधि से नवाजा हैं,वो शायद भूल गये कि हमने भूलवश माँ को कितनी बड़ी उपाधि से नवाज दिया,क्योंकि एक पुरुष का पूरा व्यक्तित्व नारी बिना अधूरा हैं.उसका अहंकार एस बात को स्वीकार करे या न करे .जीवन के हर प्रष्ठ पर नारी का अस्तित्व विद्यमान रहता हैं.पुरुष का यही अहंकारी रूप भाई,पुत्र,पिता,दामाद के रूप में ,जीवन में जीवत रहता हैं.
                   चन्द्रमा को माँ की उपमा दी गई और तारे उसके बच्चे.तारों की प्रदीप्ति से ही चन्द्रमा उज्ज्वलावान होता हैं.बच्चे अगर अच्छे बन जाते हैं तो माँ का मस्तक प्रज्ज्वलित हो जाता हैं.सैकड़ों तारे रूपी बच्चे गर्दिश में टिमटिमाते हैं.कोई तीव्र रोशन होता हैं,कोई धीमी रौशनी देता हैं,तो कोई विलुप्त की कगार पर होता हैं,तो कोई ऐसा भी दिखता हैं,तीव्र रोशन होता हुआ सदा के लिए शांत हो जाता हैं.यही आम जिन्दगी में भी होता हैं.एक माँ अपने लाखों –करोड़ों का बोझ उठा लेती हैं,उसकी चमक से चमकती भी हैं.तात्पर्य यह हैं कि अगर बच्चे गुमान करे ,देखों,मेरी चमक से आज तुम चमक रही हो,तुम्हारा मस्तक ऊंचा हैं.लेकिन उसका दुसरा अर्थ यह भी तो हैं मेरी चमक यह याद दिलाती हैं कि तुम्हारी जिन्दगी में मेरा अस्तित्व हैं ,अगर मैं नहीं होती तो इस दुनिया में तुम कैसे चमकते.हम दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं.लोरियों में,गीतों में,कहानियों में,किस्सों में हमेशा से चाँद-तारों को माँ-बच्चों की उपमा दी जाती रही हैं और दी जाती रहेगी.चन्द्रमा को माँ के समकक्ष मानने वालों ने दागी चाँद भी मना हैं.चाँद के इस दाग को किसी ने खूबसूरती के लिए ‘बिंदी’ माना हैं तो किसी ने कलंकित.रामायण की कथा में माँ कैकेई को समाज का,परिवार का कलंक माना हैं.स्वार्थन्धिता में पुत्र मोह वश कैकेई ने भगवान राम को वनवास दे दिया था. लेकिन मायावी द्रष्टिकोण छोडकर दूसरे द्रष्टिकोण से देखा जाए तो ,अगर माता कैकेई ने राम को वनवास न दिया होता तो शायद राम का चरित्र साधारण मानवीय रूप में ही होता.यह बात शत-प्रतिशत सही भी हैं राम को भगवान राम बनाने के लिए कठोर प्रवास चुना सिर्फ बेटे के सिंहासन की लोलुप्त्ता में.वैसे राम पर माता कैकेई का प्रेम भरत से अधिक था.अगर इस प्रसंग को थोड़ा गहराई से सोचा जाए कि हमारी आम जिन्दगी में भी इस तरह की घटना घटित होती हैं.एक माँ अपने बेटे का जीवन संवारने के लिए घर-परिवार से दूर भेज देती हैं.अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए अपने से अलग कर देती हैं.लेकिन उसका प्यार कम नहीं होता हैं.अलग रहकर भी उसके प्रति दिन-रत चिंता करती रहती हैं.माँ का प्यार ही उसे बिगाड़ने सुधरने के लिए ही जिम्मेदार होता हैं.माँ सौतेली हो या सगी,आखिर माँ,ममतामयी मूरत हैं जिसने ईश्वर को जन्म दिया,इसी कारण वो ईश्वर से बढकर हैं.हम बच्चे भाग्य शाली हैं जो हमारा पालन पोषण ,उसकी स्नेहमयी सघन शीतलमयी छत्र छाया में हुआ.सभी अधिकारों से बड़ा मात्रह्क होता हैं.जिसे हम जगत की सुख सम्रद्धि के बदले भी किसी को नहीं दे सकते.मात्र शक्ति इस धरा की सभी शक्तियों से सबसे बड़ी हैं जिसके विशालकाय ह्रदय में ममतामयी,करूणा मयी और वात्सल्य की त्रिवेणी सदैव प्रवाहित रहती हैं.अनंत गुणों से जडित माँ का बखान करने में हम शब्द हीन हो जाते हैं.वह ईश्वर की साक्षात स्वरूप,परमात्मा की तरह,समद्रष्टि,सम्वेदनशील,दाता एवं शक्ति की असीम पुंज,निःस्वार्थ,प्रेममयी मूर्ति,दृढ निश्चयी,उदारमना,विलक्षण सहनशील,साहस की प्रतिमूर्ति,ममता का सागर हैं.
                 माँ के व्यक्तित्व और कृतित्व का प्रभाव बच्चों पर पढ़ता हैं.ममता की छाँव तले हम बच्चों का सारा जीवन  व्यतीत होता हैं.हम ऊँगली थामकर जीवन के डग भरते हैं और नये-नये रास्ते जीवन के तय करते हैं.जब कही हम लडखडाते हैं तो हमे सम्भालने के लिए अपना हाथ थमा देती हैं.उसी के आंचल तले हम दुनिया दारी का पाठ पढ़ते हैं वो हमारी प्रथम शिक्षिका होती हैं.वो ही हमे उंगुली पकडकर बारहखड़ी का अ,आ,इ,ई.....लिखाती और पढाती हैं.हमारे व्यक्तित्व निर्माण में प्यार से ,दुलार से,डांट-डपटकर सही गलत में अंतर बतलाती हैं.जीवन में खुशियाँ बिखेरने वाली माँ हम बच्चों को ऐसे संस्कारों से जड़ित क्र एक सूत्र में पिरोती हैं कि हमे कदम डगमगाने पर हम सम्भल जाए हमे ऐसा मजबूत बनाती हैं.हमारे जीवन को शक्ति देने वाली माँ हमे आत्म विश्वासी बना के जीवन जीने की कला सिखाती हैं.उसका दुलार वह प्यार का झोंका होता हैं जिसमे दुआंओ से भरा ममता का आंचल होता हैं.व्यथित मन को बड़े ही सहजता से वो पढ़ लेती हैं वो हमेशा नजदीक ही रहती हैं.हमारी समस्याओं का सदैव चिन्तन करती रहती हैं ,मथती रहती हैं वो अपने प्यार से सहलाकर और दुआओं से ,चिंता मुक्त कर,वुहार देती हैं.    
                  सारे सुख एक ही नाम में समायें हैं क्योंकि हर रिश्ता हम बनाते हैं,एक यही रिश्ता हैं माँ का ,जो ईश्वर के जिम्मे हैं.सही भी हैं सब रिश्तो से बड़ा माँ का रिश्ता होता हैं.और सब गुरुओं से बड़ा गुरु माँ होती हैं जो हमे सांसारिक दुनियां के महत्वपूर्ण एवं दुर्लभ ज्ञान हमे प्रदान करती हैं.माँ हमे परेशनियों में मजबूती से खड़ा होना सिखाती हैं.पिता हमारे लिए सम्बल प्रदान बनते हैं तो माँ-दादी की आंधी के सामने पैर जमायें खड़ी रहती हैं.माँ पूरी दुनियां चलाती हैं.सभी का पेट भरने वाली माँ ही तो होती हैं जो भूखे पेट रहकर सबके सामने तृप्त होने का बहाना करती हैं.सारा स्नेह खाना बनाते समय रोटियों में लुटा कर,वह जीवन का हर सुख प्रदान करती हैं.उसका प्यार वह प्याला हैं जो कभी खाली नहीं होता.कभी-कभी वो मजबूर जरूर हो जाती हैं लेकिन वह थकती नहीं हैं.रविशंकर शुक्ल जी का कथन हैं कि – ‘माँ मभी नहीं थकती बच्चों के काम से जैसे कि नहीं थकती धूप जीवन के नाम से.’ लेकिन माँ जितना धैर्यवान कोई नहीं हो सकता,उसने अपना सब सुख चैन त्याग कर बच्चों को स्वतन्त्रता से रहने देती हैं.माँ के सामने हम बच्चे हजारों नाज-नखरे करते हैं लेकिन यह सब दिखावे की दुनियां के सामने विलुप्त हो जाते हैं.कितने ही काम हम माँ से हट करके कराते रहते हैं और माँ प्यार भरी झिडकी से सब काम करती रहती हैं.कितनी भी क्यों न थकी हो लेकिन वो हमेशा काम करने के लिए तत्पर रहती हैं.हम बच्चे जरा-जरा सी उलझनों में उलझ जाते हैं और थकहार कर बैठ जाते हैं लेकिन माँ ऐसे में हमे हिम्मत देती हुई ,भविष्य में आने वाली समस्याओं से निपटना सिखाती हैं.विषम परिस्थितियों का कैसे सामना करना हैं ,यह हमे सिखाती हैं.हम बच्चे अपनी रूठी हुई माँ को अपनी कभी बचकानी हरकतों से ,तो कभी नटखट शरारतों से उसे मना लेते हैं.
                  माँ शब्द में एक जादू होता हैं.हम बच्चे जब किसी मुसीबत में होते हैं तो उसकी हल्की सी मुस्कराहट वैध की तरह काम करती हैं पल भर में सब कुछ सामान्य हो जाता हैं.उसके नर्म हाथो का स्पर्श क्षण भर में दुःख तकलीफों को उडनछू कर देता हैं.एक सुकून सा अहसास कराती माँ की लोरियां हमे चैन की नींद सुलाती हैं.सही भी कहा गया हैं-माँ का दर्जा ईश्वर से बढकर हैं .क्योकि भगवान को खुश करने के लिए हम उसके सामने प्रतिदिन दीपक जलाते हैं और अपने सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं लेकिन माँ के आगे हमे यह सब नहीं करना पड़ता वो तो सब कुछ बिना किसी शिकायत के बच्चों के ही नहीं बल्कि परिवार के समस्त जन का ख्याल रखती हैं.उसके हाथ सदैव आशीर्वाद देने के लिए उठे रहते हैं और मुंह हमेशा दुआओं के लिए खुला रहता हैं.ऐसी होती हैं माँ.....उसके दुलार को बयाँ नहीं किया जा सकता.उसके दिए संस्कार,दुआएं जीवन को आसान बनाती हैं.उसका विशवास हम बच्चों की ताकत बनता हैं.माँ हमारे लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं.उसका आत्मविश्वास हमारे जीवन का प्रेरणा स्त्रोत बन जाता हैं.वो हमारे हर उस सवाल का जबाव ढूढने में हमारी मदद करती हैं जो हमारी पहुँच से बहुत दूर होते हैं.माँ केवल एक इंसानी मूर्त नहीं हैं बल्कि वह एक अद्रश्य ताकत हैं जो हमेशा छाया की तरह साथ रहती हैं.और हम अपनी दुआओं,आशीर्वादों,ममतामयी दुलार की वृष्टि करती रहती हैं.इसके इस असीम स्नेहभाव से सराबोर रहते हैं जिनको शब्दों में बयाँ नहीं कर सकते.इन एहसासों को सिर्फ महसूस कर सकते हैं ,किसी पन्ने पर वर्णित नहीं.हम वृक्ष रूपी सघन छाया तले वेफिक्री से जीवन गुजारते हैं.माँ के प्यार की गहराई को न तो व्यक्त किया जा सकता हैं और न ही शब्दों केरूप में किसी पन्ने पर काले अछरों में छापा जा सकता हैं.लेकिन उसके प्यार को अपने अनेह सिक्त शब्दों में बाँध कर उसके प्यार को ओर मजबूत बनाया जा सकता हैं.एक दिलासा का आलम बनता हैं.जावेद अख्तर का कथन हैं –‘मुझकों यकीन हेंस्च कहती थी जो भी अम्मा कहती थी,जब मेरे बचपनके दिन  थे,चाँद में परियां रहती थी.
      हमारे सुख-दुखों से जुड़ा एक रिश्ता जो स्वयं को मिटाकर,अपने को हमारे लिए जीवित रखती हैं.यह एक ऐसा अनूठा रिश्ता होता हैं जिसमे बच्चे माँ को कितना भी बोझ समझे,भले ही बड़े होकर उस पालनहार माँ के प्रति कडवाहट रखे लेकिन वो कभी बच्चों को बोझ नहीं समझती ,उसकी सब गलतियों पर पर्दा डाल देती हैं.ईश्वर के पश्चात् हम सबसे ज्यादा रिनिजं हैं तो केवल अपनी माँ के.जो हमे दुनियां में लायी और हमे जीने योग्य बनाया.इसलिए हम उम्र के किसी भी पढाव पर हो लेकिन माँ ,अपने आशीर्वादों से भरे हाथ उठाने का अधिकार मत खोना.हम बच्चों के सामने कितने भी झंझावत हो,कितनी भी मुश्किलें आये लेकिन शक्ति स्वरूपा माँ के सामने कोई नहीं ठहर पाता.वो हमेशा हमारे चारों ओर के दुःख-दर्द को मिटाकर खुशियों को बिखेर देती हैं.सब विपदाएं उसके सामने नत मस्तक हो जाते हैं.उसकी गोद में अजीब सा सुकून मिलता हैं.वह अपने बड़े से बड़े दुःख दर्द,संकट को सहजता से सह लेती हैं.लेकिन बच्चों पर जरा-सी भी आंच नहीं आने देती हैं.सही भी हैं कि बच्चो के व्यक्तित्व के विकास की जानकारी,उन्नति-अवन्ती की जिम्मेदारी माँ पर ही होती हैं.करूणा मयी माँ के बदौलत समाज में संस्कार ठहरे हुए हैं.अपनी धैर्यता के साथ विपत्ति का सामना करती हैं.वो दुक्द दर्द को अपने आंचल में समेटे हुए रहती हैं.जैसा कि टी.मालेज कहते हैं कि ‘माँ में भगवान की छवि होती हैं.हम भगवान के पास नहीं पहुच नहीं पाते इसलिए भगवान ने माँ को हमारे पास भेज दिया.’ वो बच्चों की प्रथम शिक्षिका कहलाती हैं.इस सम्बन्ध में बौद्ध धर्म गुरु दलाईलामा का कथन हैं कि ‘बच्चों की पहली गुरु माँ होती हैं.माँ ही बच्चों को प्रेम,करूणा और स्नेह का पाठ सिखाती हैं.मुझे भी प्रेम,दया के संस्कार मेरी माँ ने दिए,क्योंकि वह स्वयं दयालु थी.’माँ शब्द,शब्दों में ना बांधे जाने वाला एक अनमोल शब्द हैं.हमारी तेज रफ्तार का पहला कदम तो माँ ने ही ऊंगली पकडकर सिखाया.आज जो जीवन में आत्मविश्वास हैं,हौसला हैं,वो सब माँ के हर क्ग्रते कदम पर हमारा हाथ थामकर हौसला बढाने की वजह से हैं.मुनब्बर राणा कहते हैं कि- ‘शहर के रस्ते हो,चाहे गाँव की पगडण्डीयां,माँ की ऊँगली थामकर चलना मुझे लगा.दुश्मनों के सामने माँ ढाल बनकर हमेशा खड़ी हो जाती हैं.अपने दुःख-दर्द का बच्चो को भनक तक नहीं लगने देती और न ही उनके विकास में अवरूद्ध बनती.माँ-बच्चे का अटूट रिश्ता होता हैं.बच्चे उसका साथ भले ही छोड़ दे लेकिन माँ ,बच्चे के बचपन की यादों के सहारे अपना पूरा जीवन गुजार देती हैं.इस अटूट रिश्ते पर मुनब्बर राणा ने टिप्पणी की- ‘मैंने रोते हुए पोछे थे किसी दिन आंसू,मुद्दतों माँ ने नहीं धोया अपना दुपट्टा.ऐसा होता हैं माँ – बच्चों का रिश्ता.हर वक्त अपने बच्चे को चिंता मुक्त रखती माँ के सम्बन्ध में अमेरिकी वक्ता और कवि राल्फ वाल्डो ने कहा कि –‘इन्सान वो हैं,जो उसे उसकी माँ ने बनाया,जीना सिखाया,जीवन का प्रथम पाठ पढाया,प्यार से हम पैदा होते और प्यार हमारी माँ होती.’अब्राहम लिंकन कहते हैं कि ‘जो कुछ भी मैं हूँ और जो होऊंगा,वो मैं अपनी प्यारी माँ की वजह से हूँ.’ माँ अपनी तकलीफों को सहकर हमेशा बच्चों में खुशियाँ बांटती रहती हैं.DILLIGENCE IS THE MOTHER OF GOOD LOOK.हर पग पर कुर्वानी देने वाली माँ के चेहरे पर शिकन भर नहीं आती,वो तो हमेशा मुस्कराती रहती हैं.पग-पग पर साथ देने वाली माँ बच्चों की छाया बनकर उसे तकलीफों और परेशानियों से दूर करती हैं.प्रत्येक गम को विष का प्याला समझ कर ख़ुशी से पी लेती हैं.बच्चो के कदम पर आने वाले काँटों को निकालकर मखमली रास्ता बनाती हैं. EXPECTATION IS THE MOTHER OF ALL FRUSTATION.भगवान की प्रतिछाया कहलाने वाली ,ममतामयी रूप की अपनी ही परिभाषा गढ़ती वो बच्चों की आशा हैं,अभिलाषा हैं,जिसके कारण बच्चों की जीवन रूपी वगिया हमेशा महकती रहती हैं. गोड फेविन का कथन हैं कि ‘हर इन्सान की सफलता के पीछे एक महिला होती हैं या तो उसकी बीबी या उसकी माँ.अगर दोनों हैं तो इन्सान दुगुने आशीर्वाद के साथ होता हैं.’ममतामयी घनी शीतल मयी छाया तले पलने-बढने वाले बच्चे वास्तव में बढ़े ही भाग्य शाली होते हैं अगर उनसे समस्त सुख सम्रद्धि के बदले ममता मयी अधिकार माँगा जाए तो वो कतहि  नहीं  देगा.दिव्य शक्ति के रूप में धरा पर जो वास्तव में विद्यमान हैं तो वो हैं माँ.संसार के समस्त जीवों में सबसे प्रिय हैं वो होती हैं माँ.उसकी पूउजा ईश्वर से बढकर इसलिए की जाती हैं क्योंकि वो भगवान के समान अद्रश्य,अव्यक्त,अस्पष्ट नहीं हैं बल्कि उसका साक्षात स्वरूप हैं जो बच्चों पर अपनी करूणामयी ममता लुटाती हैं.उसके ह्रदय में स्नेह सिक्त धारा अविरल बहती रहती हैं.ईश्वर के जन्म दात्री होने के कारण सर्वमान्नीय हैं.स्त्री का नया जन्म उसके माँ के रूप में होता हैं.उसका निर्मल ह्रदय व मन बच्चों की तरह सरल,सहज,सुखमय होता हैं.ऍन.मार्टो लिंव्र्ग कहते हैं कि ‘सामान्य व्यक्ति सुबह से शाम तक काम करने के बाद फुर्सत पड़ जाता हैं लेकिन एक माँ का काम कभी खत्म नहीं होता हैं.’माँ अविरल नदी की धारा सम हैं जिसे रूकना सीखा ही नहीं हैं.वह सबके लिए सोचती हैं.सोफिया लाटेन का कहना हैं कि- ‘एक माँ कभी अपने लिए अकेले नहीं सोचती.माँ के अलावा ऐसा और कोई कर भी नहीं सकता हैं.’सच ही तो हैं.वह एक सजग प्रहरी की तरह सब का ख्याल रखती हैं.उसकी उस निःस्वार्थ त्याग भाव को किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता.उसकी अनगिनत खूबियाँ हैं.ई.एम.फास्टर कहते हैं कि ‘मुझे पूरा विश्वास हैं कि यदि सारे देशों की माएं आपस में मिल जाती हैं तो कभी युद्ध नहीं होते.’क्योंकि वह एक करूणामयी,त्यागमयी व निःस्वार्थ भाव वाली सजीव मूर्ति हैं.’विलियम गोल्ड स्मिथ का एस सम्बन्ध में कथन हैं कि- ‘मुझे तीन चीजें सबसे प्रिय हैं – माँ,घर,स्वर्ग.’माँ के सम्बन्ध में जब एक बच्चे से पूंछा गया कि तुम्हारा घर कहाँ हैं तो उसका सरल-सा जबाव था –जहाँ माँ हैं.’यह कथन था कीथ एल का.और सही भी हैं.माँ बच्चे का ऐसा अटूट शब्द हीं रिश्ता हैं.इस सम्बन्ध में कार्डिनल मार्मि लोड का कहना हैं कि ‘एक माँ सब जगह हो सकती हैं लेकिन एक माँ की जगह कोई नहीं ले सकता.’जब किसी इन्सान को अपना अतीत याद नहीं आयें तो समझों उसको माँ याद नहीं.मानवता का पाठ पढाने वाली माँ को बच्चो के आगमन होने से ही उसे मातृत्व माँ एहसास हो जाता हैं .वह दिन में भी खुली आँखों से बच्चों के भावी जीवन के सपने बुनने लगती हैं.उसका मन नये-नये विचारों में हिलोरे लेने लगता हैं.वह मन की खिडकियों से बादलों से घिरे खुले आसमान में बच्चे के खिलखिलाते,शरारतें करते,चित्रों को उनमे खोजने लगती हैं.वो अपनी ही दुनियां में बच्चों के इन्द्रधनुषी सपनों की लड़ियों को पिरोती हैं.बच्चे के रूप में अपने बचपन का प्रतिबिम्ब ढूढने में जुट जाती हैं और उन्ही में अपने खोये हुए अधूरे सपने को साकार होने का दिवास्वप्न देखने लगती.बच्चे के आगमन का आभास होते ही उसकी तो दुनियां ही बदल जाती हैं ,उसके जिन्दगी जीने का एक नया नजरिया बन जाता हैं और एक -एक सपनों का मनका एक अनदेखे,अनूठे रिश्ते के तार में गूथने लग जाती हैं.ऐसी होती हैं माँ....अपने बच्चो को विपरीत परिस्थितियों में जूझना सिखाती हैं लेकिन खुद जाती हैं पर उसमे नई स्फूर्ति का संचार करती हैं.माँ-बच्चें के अनूठे रिश्ते का ऐतिहासिक उदाहरण हैं लखनऊ के डा.आलोक चाटिया,सं १९९३ से अपने माता-पिता के लिए प्रतिदिन पत्र लिखते हैं.गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड्स में माता-पिता को सबसे ज्यादा समय तक खत लिखने की श्रेणी में ‘नेशनल रिकार्ड’सम्मान से नवाजा गया.
                   ‘माँ धरती की हरी दूब –सी माँ केसर की क्यारी हैं,पूरु स्रष्टि निछावर जिस पर माँ की छवि न्यारी.ये पंक्तियाँ जगदीश व्योम ने सही ही लिखा हैं क्योंकि माँ के विषय में कहना असम्भव ही नहीं नामुमकिन भी हैं उसकी ममता को किसी कवि की पंक्तियों ले लयबद्ध नहीं किया जा सकता और न ही उसके उपकारों को किसी कथाकार की कहानियों में उतारा जा सकता. स्रष्टि रचियता ब्रह्मा,पालनहार विष्णु और जीवन का उद्धार करने वाले शिव ये तीनो ही रूप में मानव को जन्म देने वाली माँ  हैं.इसलिए अगर इस जगत में सबसे बढकर हैं तो वो माँ ही हैं.जो एक सफल इन्सान बनाने के लिए अपने सारे अनुभवों को बच्चों के जीवन में डाल देती हैं.वह बिना किसी सीमा में बंधे पाठ्यक्रम की शिक्षा नहीं देती.उसकी शिक्षा तो बिना किसी अनुशासनबद्ध तरीके से पूरी होती हैं.हर दिन एक नया अनुभव सिखाने वाली माँ इसीलिए प्रथम शिक्षिका होती हैं.  उसके लाड-प्यार दुलार ,डाट-डपट में भी जीवन का सबक छिपा रहता हैं.माँ की शिक्षा में किसी डिग्री की जरूरत नहीं होती,उसका बच्चों को संस्कारवान बनाने में किसी शिक्षा की जरूरत नहीं होती.बच्चे का परिवार ही उसकी पाठशाला होता हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिले संस्कार,समस्त परिजन से मिले अनुभव ही पाठ्यक्रम होता हैं.जिन्दगी जीने का फलसफा सिखाने वाली माँ के सम्बन्ध में मुनब्बर राणा का कहना हैं कि- ‘कुछ नहीं होगा तो आंचल में छुपा लेगी मुझे माँ ,कभी सर पे खुली छत्त नहीं रहने देगी.’भगवान का हम भजन करते हैं ,य्नको हर जगह ढूढने की कोशिस करते हैं तो भगवान ने इसी कमी को पूरा करने के लिए माँ के रूप में भगवान को भेज दिया.माँ-बच्चे के इस अनमोल रिश्ते में एक अलग सा विश्वास होता हैं.गिर कर उठाना चलना सिखाती माँ बच्चें की किलकारियों में ही अपना सुकून ढूढ़ लेती हैं.वह अद्रश्य रूप में सदा ही हमारे आस-पास विद्यमान रहती हैं.इसकी ममता में इतनी गहराई होती हैं जिसे न तो किसी शब्दों में बयाँ किया जा सकता और ना ही परिभाषा में बांधा जा सकता.अनगिनत गुणों की खान्वाली उस माँ के सामने नत मस्तक हैं जो अपनी जन की प्रवाह किये बिना ही हम बच्चों को हर विकट परिस्थिति से निजात दिलाती हैं.प्यार का झरना बहाने वाली इस माँ का ममतामयी सागर कभी रिक्त नहीं होता.उदारमयी भावना वाली माँ आपदाओं से बचाने के लिए बच्चों के सिर पर आकाश रूपी संकटमोचक ढाल बन जाती हैं.बहुतेरे रूप वाली माँ बहु गुणों में पारंगत तो होती ही हैं साथ ही वह बच्चो की आदतों,क्रियाकलापों को पहचान कर उसके व्यक्तित्व का विकास करती हैं.उसकी हर सीख जीवन का पथ प्रदर्शक होता हैं.उसके विकास में अहम भूमिका निभाने वाली व भावनात्मक रूप से बच्चे से जुडी होने के कारण हमेशा सचेत रहती हैं.इस सम्बन्ध में जौहर कानपुरी कहते हैं कि ‘हमें इन झुर्रियों में आयतों का अक्स दिखता हैं.हम अपनी माँ के चेहरे की तिलावत करते रहते हैं.बच्चा क्या हैं?एक कच्ची माटी का लौंदा और माँ जिसे अपने निर्मल निःस्वार्थ भाव से दुलारत-फटकारती हुई उसे सच्चा,ईमानदार इन्सान बनती हैं.’ उसके इस प्यार को एहसान मानकर,कर्ज चुकाने की गुस्ताखी करना ही ध्रष्टता हैं.क्योकि यह ऐसा ऋण हैं जिसे हम कभी भी नहीं चुका सकते.अगर उसके ऋण चुकाने की कोशिस भी करे तो कौन-कौन से ऋण चुकायेंगे?इस दुनियां में हमे लाने से पहले जो उसने कष्ट उठायें,यहाँ तक कि अपनी म्रत्यु को भी दांव पर लगा दिया या उसकी ममता का कर्ज ,जो तुम्हारी ध्वनियों में बह रहा हैं जिसे उसने अपने दूध की अमृत मयी बूंदों से तुझे सींचा.या उन रातों का जो तेरी दुःख-तकलीफों में गुजारी.तेरी चिंता में अपने माथे की शिकनों को छिपा कर ,अपनी पीढा के अश्रुओं को पीकर सदैव अधरों पर मीठी-सी मुस्कान बिखेरती रहती हैं.हम माँ के ऐसे ममतामयी लुटाने वाले ऋणों की कड़ीयों में जकड़े हुए हैं,जिन्हें हम इस जन्म में क्या अगले साथ जन्म में भी कर्ज नहीं चुका सकते.हम कितने भी बड़े क्यों न हो जाए ,उसका हाटन हमेशा आशीर्वचनों के लिए उठा रहता हैं और मुख से हमेशा धीरज भरे बोल फूटते रहते हैं.हमारे ऊपर हाथी समान दुखों के पहाड़ को क्षण भर में भगा देती हैं.उसकी डांट में भी प्यार झलकता हैं और अधर हमेशा दुआओं में बुदबुदाते रहते हैं.विलक्ष्ण सहन शील के परिचायक माँ का ममत्व हमेशा हमारे जीवन में झांकता रहता हैं.किसी ने सही भी कहा हैं-
     ‘जिसमे होने से मैं खुद को मुकम्मल मानता हूँ,
     मेरे रब के बाद ,मैं बस ,मेरी माँ को जानता हूँ.’












         बस,तेरी ममता नहीं बदली......


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