बस,तेरी ममता नहीं बदली......
तू ही नहीं,सभी,मेरे दुनिया में आने की ख़ुशी से खुश थे,
तरह-तरह के सपने बुनते,मेरे भविष्य के,
लेकिन,जब मेरी किलकारी गूंजी तेरे आंगन में,
जग की रीति की समझ,अनबूझ रही मुझमे,
सब के उदास होने का कारण ,समझ न पाई मैं,
क्या,इसलिए,घर का चिराग नहीं मैं,
‘दहेज की गठरी’ले जाने वाली बेटी हूँ मैं,
‘समाज के ठेकेदार’,कैसा यह ‘आवरण’ओढे,
बात कुछ मेरे समझ आई,पर.....
तू क्यों उदास हो गई ? शायद.....
बेटा न देकर ,’समाज का बोझ’मुझकों जन्म दिया,
मेरे बढ़ते कदम इसी को भी ‘फूटे आँख न सुहाए’,
पर..तेरा यह रूद्र रूप क्यों ?
मैं तो...तेरा ही अंश..थी,
सदैव ढाल बनकर खड़ी रहती थी....,
फिर ऐसा क्या हुआ.....?
जो,निर्दयी जमाने के आगे छोड़ गई...,
लेकिन...,तेरे दिए ‘संस्कारों’ने जूझना सिखाया...,
साथ ही...,’पहाड़ से दुःख’ ने,‘पत्थर दिल’बनाया...,
पर...कभी-कभी तेरी याद....करके,
निर्जीव से हुए अधरों पर हंसी आती,
सोचती...याद करती....फिर उन यादों में खो जाती,
कैसे... तू ,गालों से लुढकते आश्रुओं....को ,
प्यार भरी...थपकी से गालों को सहलाती...,
याद हैं मुझे,थककर जीवन संघर्षों से बैठ जाते,
तो तेरे आंचल तले ,दुनियां का सुकून पाते,
माँ,तेरे ‘अनगिनत पहलू’
जिसमे विराट शख्सियत समाई,
रीति बदली,जमाना बदला,दुनियां बदली.....,
पर कभी नहीं बदली ,तो बस माँ तू नहीं बदली.......