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मंगलवार, 9 जनवरी 2018

       “रिश्तों  की अपनी एक परिभाषा होती हैं”
प्रकृति अपने आप में एक विराट पुस्तक हैं जिनका हम इससे नजदीकी रिश्ता बनाएं उतना ही वह उसे हम पढ़ते जायेंगे.इससे जितनी तल्लीनता से लेंगे,उसे खुद-व-खुद समझ आती जाती हैं.इसी तरह से हमारे मानवीय रिश्तें हैं जितनी हम इसमे पारदर्शिता रखेंगे,समय-समय पर आपसी गिले-शिकवें व दरारों को विचार-विमर्श व समझदारी से भ्रेब्गे ,उतने ही आपसी समझ से रिश्तों की बुनियाद मजबूत बनेंगी.सभी का अपना-पना व्यक्तित्व होता हैं,सभी अपने नजरियें से रिश्तों को देखते हैं.किसी एक का व्यक्तित्व दूसरे से मेल नहीं खाता कें.हम अपने नजरियें से रिश्तों को देखते हैं.अगर दूसरों के नजरियें से देखेंगे तो दूसरा प्सह्लू भी दिखता हैं.आज हम अपनी बात सुनना चाहते हैं जबकि सुनना एक अच्छे श्रोंता बनना आपसी सम्बन्धों की गरिमा बढाता हैं.
  संवेदनहीन नहीं,सम्वेदनशील बनियें-  वैज्ञानिक की दुनियां में हम इतने हाईटेक हो गये हैं कि हम अपने आप को ही भूल से गये हैं .आज पहचान सार्वजनिक न रहकर व्यक्तिगत हो गई हैं.यही व्यक्तिगत पहचान बनाने के चक्कर में आदमी दिन-रत खपत रहता हैं.इसका प्रभाव हमारे सामजिक,मानवीय परिवेश पर पड़ा ही हैं,साथ ही नैतिक मूल्य भी अछूतें नहीं रह सके.एक समय था जब हम बिंदास होकर जीवन जिया करते थे.वक्त की परवाह न करते हुए अपने ढंग से जीवनयापन करते थे.ऐसा लगता था ,जैसे वक्त हमारे बांयें हाथ की मुट्ठी में बंद हैं.लेकिन अब आज हालात यह हैं कि हमारा वक्त ,हमारी बंद मुट्ठी में बंद रेत की तरह फिसलता जा रहा हैं और हम उसके पीछे तूफ़ान एक्सप्रेस की तरह भागते ही जा रहे हैं.......भागते ही जा रहे हैं.....संवेदनहीन संसार में किसी को भी अपने आस-पास हो रही घटनाओं का क्या ,साथ रहने वाले सदस्यों की दिनचर्या का अता-पता नहीं रहता हैं.व्यस्त भरी जिन्दगी ने मानव को संवेदन शून्य बना दिया हैं.आज उसकी स्थिति निरीह प्राणी की तरह हो गयी हैं.हम अपनी आसमां छूती चाहतों को ,कल्पनाओं के पर लगाकर स्व्तित्र जीवन यापन करने की चाह में भावनाओं को पैरों तले कुचलते हुए, अपने ही राग अलापते हुए, आगे बढ़ते जा रहे हैं.एक समय था गब हमारी इच्छाओं पर भावनाओं का पहरा हुआ करता था.बन्धनहीन होकर उन्मुक्त गगन में विचरण कर.उन्माद को प्रे ढकेलते थे लेकिन आज इन सबसे मनुष्य पलायन कर गया हैं.वो अपनी ही दुनियां में इतना व्यस्त हो गया हैं कि अपने बजूद से सही ढंग से मुताफिक नहीं हो पा रहा हैं.उवासी भरी जिन्दगी में एक ही ढर्रे पर जीवन काटे जा रहा हैं.प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अपने पराये तो हुए ही लेकिन उसका आत्म प्रेम,संवेदना,सहयोगिता.स्वाभिमान जैसे शब्दों की शब्दकोश में रिक्ति हो गई हैं.जीवन में एक विरक्ति सी आ गई हैं.अपने आप से रूबरू होने के लिए फिर वाही विस्मृत हुए क्षणों को सांझा करना होगा.एकाकी परिवार ने संयुक्त परिवार के घोंसलों पर अपनी चादर बिछा दी हैं उसे हटाना होगा.रिश्तों की सूझ-बूझ मिटती जा रही हैं.रिश्तों में लचीलापन अपनी सीमाओं को पार कर गया हैं.आधुनिकता की ढंडी परत ने रिश्तों की गर्माहट को खत्म कर दिया हैं.कल्पनाओं में इन्सान इतना विशवास कर विचरण करने लगा हैं कि उसके मन से रिश्तों को सहेजने वाली स्म्रतियों को याद करने या उनको फिर से बुनने में या फिर से उलझे रिश्तों को सुलझाने में वह अपने समय की बर्वादी समझने लगा हैं.मनुष्य की सरलता,सहजता,सहयोगिता,सन्तोषी प्रवृति,सहभागिता ये सब उसके खुशनुमा गिन्दगी के राज थे अब उन पर आधुनिकता की परत चढ़ गयी हैं.रिश्तों में आई दरारों को रूठा मनाई से पाटने का काम चल जाता था.समय रहते मानने की आत्म प्रवंचना आज की बहुत बड़ी जरूरत बन गई हैं.क्योकि आज मनुष्य एक ऐसी अँधेरी कोठरी में कैद होता जा रहा हैं,जहां उसका अपना,स्वयं का कोई वजूद ही दिखाई नहीं देता हैं,उसकी कभी न देह से अलग होने वाली व दिन-रत चलने वाली छत्र-छाया आज उससे कोसो दूर छिटक गयी हैं.आज हमे आपस में बैठकर रिश्तों में सरलता,सहजता की,विशवास की मिठास घोलनी होगी.उसमे अपनी आत्मीयता से सम्वेदना का स्न्चर्ण करना होगा.
जिन्दगी का आनन्द ही रिश्ता हैं- रिश्तें तो हमारे जीवन का अहम हिस्सा होते हैं.हर रिश्ते का सफलता का एक मूल मन्त्र होता हैं.रिश्तों में नफरत,ईर्ष्या,नापसन्दी नहीं होना चाहिए.पूर्वाग्रह हमारे रिश्तों के बीच दरारें खड़ी कर सकते हैं.और कभी-कभी खड़ी भी कर देते हैं.रिश्ता कोई भी हो हर रिश्तें का अपना एक महत्व होता हैं.इन्हीं रिश्तों की वजह से हमारा वजूद हैं इस बात को समझना चाहिए.रिश्तों को बड़ी ही सूझ-बूझ से निभाना चाहिए क्योंकि जरा सी भी चूक दरार का कारण बन जाती हैं.असल जिन्दगी का हिस्सा होने के कारण उह हमारे जीवन गुजारने का साधन बन जाते हैं.अगर इनका सहारा न हो यह हमारा जीवन एक भुलभुल्लैया बन कर रह जाएगा.रिश्तें हमारे में एक नई ऊर्जा का संचरण कर,हमे स्फूर्तिदायक बनाते हैं.रिश्तों से घिरे होने के कारण हमारा जीवन खुशहाल बन जाता हैं, हमारी बांछे खिल जाती हैं.मन प्रफुल्लित होकर वाग-वाग हो जाता हैं.क्योकि जीवन का आनन्द ही रिश्ता हैं.निःस्वार्थ  भाव से बनाएं गये रिश्तों में सीखे छिपी होती हैं.स्नेह का दायरा बढ़ता हैं.प्रत्येक रिश्तें की अपनी एक अहमियत होती हैं.इसलिए इन्हें संभालकर रखना चाहिए.
रिश्तों की प्रथम पाठशाला परिवार होता हैं-  जैसा कि थॉमस जेफरसन ने कहा हैं कि ‘मेरे जीवन का सबसे खुशनुमा पल वे थे,जो मैंने अपने घर पर अपने परिवार की छाँव में बिताएं थे.’सही भी हैं हम जन्म लेते ही हमारे आस-पास कई रिश्ते गुंथ जाते हैं.परिवार में शामिल होते ही कई रिश्तो का मकड़जाल आस-पास बिखर जाता हैं.ममता,त्याग,सहयोग की भावना,संवेदनशीलता ,सहभागिता,अनुशासन,प्रबन्धन इन सबका पाठ हम घर से ही सीखते हैं.रिश्तों को बनाने का न गणित लगाया जाता हैं और न ही तर्क-वितर्क किया जाता हैं.ये प्राक्रतिक व सामाजिक होते हैं जो प्रेमभाव व सहजता से चलते हैं.बनिया साईं की तरह ,नफे-नुक्सान से रिश्ते नहीं चलते हैं.रिश्तों की गरिमा को समझना चाहिए,यह अनमोल होते हैं.इनकी कीमत किसी सीप से निकले मोती से कम नहीं होती हैं.अपनी उपेक्षा से तोड़ने की कगार पर नहीं पहुँचना चाहिए क्योंकि एक बार अगर तागा टूट गया तो फिर जुड़ता नहीं हैं और अगर जुड़ता भी हैं तो उसमे गाँठ पड़ जाती हैं.कभी – कभी तो यह गाँठ भी नहीं जुडती.इसलिए परस्पर दोषारोपण करने न करके एक नई दिशा देने का प्रयास करना चाहिए.
रिश्तों में ज्यादा अपेक्षाएं न रखें- रिश्तों का बंधन निःस्वार्थ भाव से होना चाहिए. संबंधों को बचाना हैं तो ज्यादा अपेक्षाएं नहीं रखना चाहियें.क्योकि अपेक्षाएं पूर्ण न होने पर व्यक्तिगत संबंधों में विकार उत्पन्न हो जाता हैं.ओर विकार से विघटन होता हैं जो बेहद पीड़ादायक होता हैं.इसलिए हमे सभी की अपेक्षाओं के अनुरूप ही काम करना चाहिए जिससे रिश्ते की गिरः को थामें रखा जा सके.विघटन से उत्पन्न निराशा होती हैं,इससे बचना चाहिए.प्रेम अगर आज लेने की अपेक्षा रखते हैं तो उससे अधिक देने का प्रयास करे.आपसी रिश्तों को बहुत ही संभालकर रखना पड़ता हैं.कई मोड़ो पर जीवन जीना,रिश्तों को संभालना दुश्वर हो जता हैं.ऐसे समय में रिश्तों में आई कटुता से बाहर निकलना चाहिए.हर रिश्तें की अपनी गरिमा होती हैं.रिश्तों के बिखराव के कर्ण हम दल-दल में धंसते चले जाते हैं.इस मुश्किल स्थिति में एक साथ बिखरे रिश्तों को सम्भालना हो जाता हैं,परस्पर दोषारोपण,कटु आलोचना की शुरुआत होने लगती हैं.ऐसे रिश्ते अगर संभालने पर भी न संभले तो ऐसे में रिश्तों को विच्छेद ही कर देने में भलाई होती हैं.इसलिए रिश्तों की डोर को निःस्वार्थ भाव से पनपने दो,अपने आप ही उन्मुक्त गगन तले वायु में विचरण करते आसमां को छूते नजर आयेंगें.
रिश्तों में लचीलापन होना चाहियें- रिश्ता कोई भी हो ,लचीलापन होना उस रिश्ते की स्थिरता की विशेषता हैं.तनावग्रस्त रिश्तें को अवधि निम्नतम होती हैं,वो टूटने के कगार पर होते हैं.रिश्तों में एहसासों की नमी बेहद जरूरी हैं.जैसे सूखी रेट हाथों से फिसल जाती हैं.ऐसे ही रूढ़ रिश्ते सूखे रेट की तरह होते हैं.रिश्तों में हमेशा ताजगी बनाएं रखने क्व लिए हमे समय-समय पर उन रिश्तों की अहमियत याद दिलानी चाहिए.सुंदर रिश्ते रोटी की तरह होते हैं.सुंदर रिश्तों में माँ की रोटी की महक और ऊष्मा होती हैं ,जो हमारे जीवन को सींच देती हैं.विशवास और सम्मान के धागों से बुनें रिश्ते अटूट और मजबूत होते हैं.रिश्तों का सबसे बड़ा इम्तिहान होता हैं कि वो अस्मत भी हो और हाथ भी न जोड़ें.हर मजबूत रिश्तें की सफलता का मूल मन्त्र हैं-आपको पता होना चाहिए कि कब सहारा देना हैं और कब दखल देना हैं.
रिश्तों में पारदर्शिता होनी चाहिए- रिश्तो को मजबूती प्रदान करने के लिए हमें समय-समय पर मन में छिपें कुप्रव्रतियों की सफाई करके मन में पार्देर्शिता लानी चाहिए.क्योकि नकारात्मक विचारों और भावों को दूर करके ही उनकी जगह सकारात्मकता को जगह देने र ही रिश्तों में परफेक्शन आती हैं.आज की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में समय की वजह से रिश्तों की सुध-बिध भूल जाते हैं.उदासीन रिश्तों में नवीनतम आशाओ का संचरण करने के लिए हमे समय रहते आपसी विचार विमर्श से व वार्तालाप करना चाहिए,क्योंकि रिश्तें ज्वार-भाता में उस लहर की तरह होते हैं,जो सब समन्दर में रहती हैं तो तब तक मामूली सी जान पडती हैं,लेकिन जब समुद्र से बाहर अति हैं तो सूनामी बन जाती हैं.हमें समय रहते वक्त-वक्त पर संवाद द्वारा नई स्फूर्ति प्रदान करना चाहिए.फिर इस हाईटेक की दुनियां में दूरियाँ भी छोटी हो गई हैं.इस भागमभाग की जिन्दगी में वक्त निकालकर रिश्तों में आयें मनमुटाव को तोडकर नहीं बल्कि एक दूसरे को समझकर रिश्तों को निभाया जा सकता हैं.
रिश्तें हवा की तरह खामोश होते हैं-  रिश्ते हमारे आस-पास अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.यह हमे सदैव अपनी उपस्थिति की श्वांस दर्ज कराते हैं क्योंकि रिश्ते बहुत ही नाजुक सूखे रेत को हल्के व खुले हाथ से दबाएँ मुट्ठी की तरह होते हैं.ये ऐसे में तो बने रहते हैं लेकिन जब मुट्ठी को कसकर बंद किया जाता हैं हो ये फिसलने लगते हैं.रिश्तों में पसंदी-नापसन्दी की इतनी अहमियत नहीं होती हैंजितनी कि इनकी उपेक्षा व बेरूखी दिखाने में होती हैं क्योंकि ऐसा करने से रिश्ते टूटने के कगार पर पहुँच जाते हैं.रिश्तों का बिखराव हमारी जिन्दगी के सफर को मुश्किल बना देता हैं. नर्क बनी जिन्दगी में एक दूसरे की उपेक्षा, उत्पीडन का दौर चलता रहता हैं.सम्बन्ध विच्छेद हमारे रिश्तों की गरिमा घटा देता हैं जिससे आपसी संबंधों में टकराव उत्पन्न हो जाता हैं.इसलिए रिश्ते तितलियों की तरह होते हैं,इन्हें बड़े ही संभालकर रखना चाहिए,जिससे आपसी टकराव से चोट न पहुचे और न ही रंग,बैरंग हो साथ हो आपसी टकराव से पंख छितर न जाएँ.
रिश्तों में अहंकार नहीं होना चाहियें- रिश्तों में बिखराव आने से हमारी स्थिति ‘हम बहुरि अकेला’यानि कि हम फिर अकेले जैसी हो जाती हैं.ऐसे में उथले जीवन जीने वालों के कई नाते रिश्तें बन जाते हैं जबकि गहरा जीवन जीने वाला रिश्तों की कान्त-छांट करवाता रहता हैं.रिश्तों को जितनी ज्यादा ख़ुशी देंगे,उससे भी ज्यादा खुशी मिलती हैं.इसलिए हमारे विचार-विमर्श में ज्यादा से ज्यादा ख़ुशी देने वाले विचार होना चाहिए तभी हमें वास्तविक जीवन में ख़ुशी मिलेंगी.इसलिए रिश्तों में अहंकार नहीं होना चाहिए क्योंकि अहंकार हमारे रिश्तों को खोखला कर देता हैं.इसे मजबूती प्रदान करने के लिए दिमाग से नहीं दिल से काम लेना चाहिए.अगर रिश्तों को द्रढ़ता प्रदान करना हैं तो आशंकाओं और खामियों को नजर अंदाज कर आगे बढना चाहिए.अहंकार की जगह स्वाभिमान को स्थान देना चाहिए.जब हम रिश्तों को ख़ुशी देते हैं तो ह्मे दुगुनी ख़ुशी बदले में मिलती हैं.इसलिए रिश्तों में निःस्वार्थ भाव होंसा चाहिए और हमारे विचार भी ,सोच भी अहंकार रहित ख़ुशी देने वाला बनाना चाहिए.
रिश्तों को देखने का नजरियाँ निष्पक्ष होना चाहिए-  हर व्यक्ति का अपना एक नजरियाँ होता हैं.सभी का व्यक्तित्व विभिन्न होता हैं.किसी एक का व्यक्तित्व दूसरे से मेल नहीं खाता हैं.हम अगर दूसरों के नजरियों से देखेगे तो दूसरा पहलू भी दिखता हैं.आज हम केवल अपनी बात ही सुनना चाहते हैं,जबकि सुनना एक अच्छे श्रोता बनना आपसी सम्बन्धों की गरिमा बढ़ता हैं.यह सही हैं कि आत्माभिव्यक्ति प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता है.आत्माभिव्यक्ति को सुनना और पसंद करना भी एक अच्छे रिश्तें को सीन्च्नें जैसा हैं.हमे अपनी वाक्पटुता से रिश्तों में मिठास घोलना चाहिए.यह सब आपसी समझ से होता हैं.हममें जितनी आत्म समझ होगी,रिश्तें उतने ही मजबूत होगे.रिश्तों को बनाएं रखने के लिए आपसी समझ बूझ व सामंजस्य भी अति आवश्यक हैं.समाज सामाजिक सम्बन्धों का जाल हैं.क्योकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के नाते उसे अपने अस्तित्व को बनाएं रखने के लिए दूसरों की आवश्यकता होती हैं.हमें रिश्तों के प्रति बंधन निरपेक्ष पूर्ण होना चाहिए.कोई बड़ा या कोई छोटा नहीं होना चाहिए.अगर हमें अपने रिश्तों को बचाने के लिए झुकना भी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए क्योंकि रिश्ते आसमान में लटके बादलों की तरह होते हैं.जैसे झुके हुए पानी से भरे बादल हमेशा बरसने को झुकने को तत्पर रहते हैं उसी तरह हमे अपने रिश्तों के बंधन को इसी तरह ही सोचना चाहिए.इससे हम कईयों की भावनाओं को बचा सकते हैं.
रिश्तों में दया की भावना नहीं,बल्कि आत्म समर्पण की भावना होनी चाहियें-  प्रेम मांगने से नहीं मिलता बल्कि वह तो देने का नाम हैं.इसलिए रिश्तों में दया की भावना नहीं होनी चाहिए बल्कि समर्पण की भावना होनी चाहिए.और न ही ज्यादा अपेक्षाएं रखना चाहिए,क्योंकि जहां अपेक्षाओं को शामिल किया वाही रिश्तें भी मृत प्राय हो जाते हैं.कुदरती तौर पर प्रेम पाना स्वाभाविक प्रक्रिया होती हैं.माँ-बाप बच्चों से प्रेम करते हैं उनका प्रेम निःस्वार्थ होता हैं.उनका प्रेम झरने में बहते पानी जैसा होता हैं.कुदरती तौर पर जैसे पानी झरना से या पहाड़ से नीचे की तरफ गिरता हैं,उसी तरह प्रेम भी हमेशा झुकता हैं अर्थात नीचे की तरफ उतरता हैं लेकिन बच्चे माँ बाप के प्रति यह स्वाभाविक प्रक्रियां नहीं अपना पाते हैं.वह चक्र से मुक्त होकर अचेतन हो जाता हैं.जैसा कि गुरजिएफ ने कहा हैं कि ‘जो व्यक्ति अपने माँ-बाप को प्रेम कर पायें उसे ही मैं मनुष्य कहता हूँ क्योंकि यह बड़ी कठिन यात्रा होती हैं.’
रिश्तों में आपसी सामंजस्यपूर्ण व्यवहार होना चाहिए- प्यार करना हो या रिश्ता बनाना हो,अपेक्षा नहीं रखना चाहिए सुर न ही आलोचना करनी चाहिए.वो भी दो मंझधार में झूल रहे हैं,ऐसे में हमसफर बनना चाहिए.जरा दूसरों के नजरिये से भी दुनियां देखनी चाहिए.अनगिनत सवाल खड़े कर कटघरा तैयार नहीं करना चाहिए.ऐसा होने पर रिश्तों के बीच डीएम घुटने लगेगा.अपनी महान बनने के होड़ में रिश्तों को नर्क में मत धकेलिए.जिन्दगी को असल नजरिये से देखना चाहिए, न कि अपनी महत्वत्ता प्रदर्शित करने के चक्कर में प्रशंसा का अभाव दिखाई देने लगता हैं,अहंकार जन्म लेता हैं और रिश्तों में कडवाहट भर जाती हैं.जब हम इन सबसे परे होते हैं तो रिश्तों की महक दूर-दूर तक फैलती हैं.आत्मप्रशंसा के चक्कर में सम्मान करना भूल जाते हैं.तारीफ़ के दो बोल से आत्मा को झंकृत कर देते हैं.मन प्रफुल्लित हो तरंगित होने लगता हैं.किसी की प्रशंसा और सम्मान करने से रिश्तों में प्रगाढ़ता आती हैं.रिश्तों को मजबूती देना हैं तो आपसी सामंजस्यपूर्ण व्यवहार से ही जीवन को तरंगित किया जाना चाहिए.
रिश्तों की बुनियाद एक तरफा नहीं होती-   आपसी सहयोग से ही दुनियां चलती हैं,एकांगी जीवन नर्क तुल्य हो जाता हैं.हमे सरगम की लड़ियाँ साथ लेकर ही चलना पड़ेगा तभी जीवन तरंगित हो पाएगा.रिश्तों में हम एक तरफा समझौता नहीं कर सकते हैं.प्यार की गहराई रिश्तो में कितनी भी क्यों न हो ,क्योंकि रिश्ते समझौते से नहीं चलते हैं.आपसी सहयोगपूर्ण व्यवहार आधिपत्य से रिश्तों को बखूबी निभा सकते हैं.इसका किसी का असर प्रभावहीन होना चाहिए.नियम शर्तों में किये गये रिश्तों का जीवनकाल ज्यादा नहीं होता.एक तरफा रिश्तों की कोई बुनियाद नहीं होती.सड़क के दो किनारों या गाड़ी के दो पहियों की तरह रिश्ते होते हैं,जो एक दूसरे के बिना अधूरे होते हैं.रिश्ते नाजुक होते हैं.स्थितियों के अनुसार इनमे उतार चढाव आता जाता हैं क्योंकि जरूरी नहीं आपसी सोच एकसार हो.रिश्तों को बनाएं रखने में विश्वशनीयता भी जरूरी होती हैं.ऐसे में सहमती-असहमति के दौरान बीच का रास्ता अपनाकर रिश्तों को बचाने में समझदारी होती हैं.कभी-कभी नजदीकी रिश्तों में समरसता दिखाई नहीं देती हैं.इसलिए सावधानीपूर्वक रिश्तों की डोर को टूटने से बचाना चाहिए.गाँठ पढने से रिश्तों में पहले जैसी गर्मी,महक ताजगी नहीं रहती.इसलिए ‘रिश्तों की डोर लचीली होनी चाहिए,न की सख्त.’                          
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