दो जून रोटी
दो जून रोटी
है तो यह पांच अक्षर का शब्द ,लेकिन मानव जीवन में कितना महत्व रखता हैं यह तो
मानव ही जानता हें.यह शब्द उसके अस्तित्व को झकझोर देते हैं.इन शब्दों की खातिर वह
दुनियां से लड़ जाता हैं.यहाँ तक की वह अपने स्वाभिमान को भूल कर इसे पाने की लालसा
में सारे संस्कारों को परे कर देता हैं.आखिर क्यों न करे? यह उसकी मजबूरी नहीं,
बल्कि जन्मजात दी हुई उसकी आवश्यकता हैं. इसी के लिए इंसानियत तक मर जाती हैं.इसे
पाने की यह लालसा ,भूख मिटाने के लिए अपने को ही बेच देता हैं.अपनी से ही
विश्वासघात कर देता हैं.अपनी ही निगाह में इतना गिर जाता हैं कि वह जीती जाती लाश
बन जाता हैं.इन्सान इसकी पूर्ति के लिए करे भी तो क्या न करे?इसके बिना उसका
गुजारा भी नहीं हो सकता हैं.जन्म लेते ही यह उसकी आवश्यकता होती हैं.पहले वह
माँ-बापू के पल्लू में बंधकर इच्छा पूर्ति करता हैं और यही बड़ा होकर अपने ही बाप
को अनदेखा कर देता हैं.उसकी माँ तब तक ही उसकी पालनकर्ता रहती हैं,जब तक किउसको
कोई दूसरा पालनकर्ता नहीं मिल जाता.अपनी इस दो जून की रोटी के भटकाव का रास्ता उसे
मिल जाता हैं.अपने सामने वह अपनी ही जन्मदात्री की उपेक्षा कर्ता जाता हैं.वह भूल
जाता हैं की इस काय को निवाला देने वाली यही माँ थी.अपनी ही दुनियां में मदहोश वह
रिश्तों को ताड़-ताड़ करता जाता हैं.एक वक्त ऐसा आता हैं,कब,वंश को चलाने वाली की
उपेक्षा भी इसी दो जून रोटी की खातिर होती हैं.बूड़ा,जर्जर शरीर दमखम से हारा अपने
बहु की शान बखारी में लग जाता हैं.उपेक्षाओ को सहते हुए वह अपने ही चाहने वालों की
उपेक्षा करने लगता हैं.अर्थात्अपनी हीपत्नी बेटी की.स्वाभिमानहीन जिन्दगी व्यतीत
करता जाता हैं.उसे टी केवल दो वक्त की रोटी की ही चिंता सताती रहती हैं,जिसके लिए
मिली उपेक्षा को भी वह अम्रत घूंट समझ पीता रहता हैं.यह दो जून रोटी उसके
स्वाभिमान से भी बड़ी हो जाती हैं.और क्यों न हो?पेट तो रोटी से ही भरा जाता
हैं,फिर चाहे यह रोटी कितने ही कड़वे घूंट पीने पर ही क्यों न मिलती हो या पल-पल
अहसास दिलाती मजबूरी को.हाय!यह दो जून रोटी...........