'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल'
हिंदी हमारी मिट्टी से उपजी भाषा हैं, उसकी अपनी जीवात्मा विद्यमान हैं।यह उदारता भाव के कारण ही इसमें शब्द सम्पदा का भंडार छिपा हुआ है।वास्तविक रूप से सम्मानीय दर्जा मिलना चाहिए, जिससे वह सभी के दिलों पर राज कर सके।हिंदी की लहर चहुँ ओर अपनीसरसता प्रदान करती जा रही हैं।हमारे देश में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी हिंदी का अलख जग चुका है।अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के पश्चात भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में संविधान में हिंदी को मान्यता मिली।हिंदी का अखिल भारतीय रूप व क्षेत्र काफी विस्तृत है।इसका अपना रूप स्वयं ही अर्जित किया हुआ है।इसकी अपनी विशेषताएं हैं-
*हिंदी भाषा है, लिपि नहीं।
*नए शब्द गढने की शक्ति।
*सहस्र वर्ष पुराना इतिहास।
*शब्द संपदा का अनूठा भंडार।
*हिंदी से भावात्मक रिश्ता।
हिंदी में शक्ति है,आकर्षण है, प्रभाव है, अगर कमी है तो हिन्दी वासियों में अपनी भाषा के प्रति विश्वास और अपने आत्म विश्वास की।
लेकिन खेद की बात है कि इतने लंबे अरसे के बाद भी यह अपना वो मुकाम हासिल नहीं कर पाई।इसके प्रचार में सबसे बडा अवरूद्ध कारक अंग्रेजी भाषा का दबदबा।अंग्रेज चले गए, पर अपनी गुलामी की दास्तां छोड गए।इसके अलावा एक ओर अन्य कारक, आधुनिकता की दौड में भागता मानव, जिसके कारण मनुष्य अपने बच्चों में हिंदी के बोलने, लिखने के प्रति प्रेरित तो कर ही नहीं पाते, बल्कि हिंदी के प्रति सम्मान की भावना भी नहीं दर्शा पाते। जबकि वर्तमान में स्थिति यह है कि हिंदी विश्व में अपने पंख फैलाकर पल्लवित हो रही है।इसका साक्षात उदाहरण प्रसिद्ध साहित्यकार शेक्सपियर के घर में स्थित संग्रहालय में देवनागरी लिपि में लिखा है- ' यह शेक्सपियर का घर है'।इससे प्रदर्शित होती है हिंदी के प्रति अंग्रेजों की अगाध श्रद्धा भक्ति।इसके अलावा भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक हिन्दी की राष्ट्र भाषा या राज भाषा की द्वंद स्थिति।साथ ही हिंदी को भारत में ज्ञान विज्ञान की भाषा न मानकर, कहानी, कविता की भाषा माना गया।हिंदी दिवस मनाने की महत्ता केवल हिन्दी पखवाड़े के बीबीत जाने तक, वही चिर परिचित नारों के साथ कि' हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है' आदि के साथ होती हैं।
हिंदी भाषा को विश्व स्तरीय दर्जा दिलाने के लिए हमें इसके प्रचार प्रसार में आने वाली बाधाओं का आत्मचिंतन कर अवरोधों का निराकरण करने के लिए प्रयत्न रत रहना चाहिए। साथ ही निम्न प्रयास भी करना चाहिए-
*हिंदी के प्रति चेतना जागृत करना।
*देश वासियों में हिंदी के प्रति विश्वास जगाना।
*बिना किसी सीमित रेखा के इसके हिमायती होकर पक्षधर बनना।
*हिंदी के प्रति समर्पण की भावना
*वित्तीय व्यवस्था में लेखा जोखा में हिंदी भाषा की अनिवार्यता।
*पाठशालाओं में हिंदी भाषा को विशेष दर्जा देना।
*हिंदी राजकीय भाषा को व्यवहारिकता में लाना।
*अधिकारियों का राजस्व कार्य में सही तरीके से निर्वहन करना।
*प्रचार प्रसार कर जनचेतना में सांस्कृतिक आंदोलन बढाना।
*हिंदी भाषा में प्रान्तीय, देशीय भाषाओं को भी शामिल करना
चाहिए।
हमें राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए तथा समस्त राष्ट्र बंधुओं को एक माला में पिरोने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करना चाहिए।जैसा कि महात्मा गांधी जी ने कहा है कि-' राष्ट्र भाषा के बिना देश गूंगा हैं।' और स्वयं को हिंदी में सराबोर कर हिंदी को नया आयाम देना चाहिए क्योंकि हिंदी भाषा में अपनी मिठास, लरजता, आत्मीयता का भाव होने के कारण इसे जल्द ही अपना लिया जाता है।
' हिंदी का भविष्य उज्ज्वल, वर्तमान संतोष जनक और स्वर्णिम इतिहास महान है'।
हिंदी हमारी मिट्टी से उपजी भाषा हैं, उसकी अपनी जीवात्मा विद्यमान हैं।यह उदारता भाव के कारण ही इसमें शब्द सम्पदा का भंडार छिपा हुआ है।वास्तविक रूप से सम्मानीय दर्जा मिलना चाहिए, जिससे वह सभी के दिलों पर राज कर सके।हिंदी की लहर चहुँ ओर अपनीसरसता प्रदान करती जा रही हैं।हमारे देश में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी हिंदी का अलख जग चुका है।अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के पश्चात भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में संविधान में हिंदी को मान्यता मिली।हिंदी का अखिल भारतीय रूप व क्षेत्र काफी विस्तृत है।इसका अपना रूप स्वयं ही अर्जित किया हुआ है।इसकी अपनी विशेषताएं हैं-
*हिंदी भाषा है, लिपि नहीं।
*नए शब्द गढने की शक्ति।
*सहस्र वर्ष पुराना इतिहास।
*शब्द संपदा का अनूठा भंडार।
*हिंदी से भावात्मक रिश्ता।
हिंदी में शक्ति है,आकर्षण है, प्रभाव है, अगर कमी है तो हिन्दी वासियों में अपनी भाषा के प्रति विश्वास और अपने आत्म विश्वास की।
लेकिन खेद की बात है कि इतने लंबे अरसे के बाद भी यह अपना वो मुकाम हासिल नहीं कर पाई।इसके प्रचार में सबसे बडा अवरूद्ध कारक अंग्रेजी भाषा का दबदबा।अंग्रेज चले गए, पर अपनी गुलामी की दास्तां छोड गए।इसके अलावा एक ओर अन्य कारक, आधुनिकता की दौड में भागता मानव, जिसके कारण मनुष्य अपने बच्चों में हिंदी के बोलने, लिखने के प्रति प्रेरित तो कर ही नहीं पाते, बल्कि हिंदी के प्रति सम्मान की भावना भी नहीं दर्शा पाते। जबकि वर्तमान में स्थिति यह है कि हिंदी विश्व में अपने पंख फैलाकर पल्लवित हो रही है।इसका साक्षात उदाहरण प्रसिद्ध साहित्यकार शेक्सपियर के घर में स्थित संग्रहालय में देवनागरी लिपि में लिखा है- ' यह शेक्सपियर का घर है'।इससे प्रदर्शित होती है हिंदी के प्रति अंग्रेजों की अगाध श्रद्धा भक्ति।इसके अलावा भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक हिन्दी की राष्ट्र भाषा या राज भाषा की द्वंद स्थिति।साथ ही हिंदी को भारत में ज्ञान विज्ञान की भाषा न मानकर, कहानी, कविता की भाषा माना गया।हिंदी दिवस मनाने की महत्ता केवल हिन्दी पखवाड़े के बीबीत जाने तक, वही चिर परिचित नारों के साथ कि' हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है' आदि के साथ होती हैं।
हिंदी भाषा को विश्व स्तरीय दर्जा दिलाने के लिए हमें इसके प्रचार प्रसार में आने वाली बाधाओं का आत्मचिंतन कर अवरोधों का निराकरण करने के लिए प्रयत्न रत रहना चाहिए। साथ ही निम्न प्रयास भी करना चाहिए-
*हिंदी के प्रति चेतना जागृत करना।
*देश वासियों में हिंदी के प्रति विश्वास जगाना।
*बिना किसी सीमित रेखा के इसके हिमायती होकर पक्षधर बनना।
*हिंदी के प्रति समर्पण की भावना
*वित्तीय व्यवस्था में लेखा जोखा में हिंदी भाषा की अनिवार्यता।
*पाठशालाओं में हिंदी भाषा को विशेष दर्जा देना।
*हिंदी राजकीय भाषा को व्यवहारिकता में लाना।
*अधिकारियों का राजस्व कार्य में सही तरीके से निर्वहन करना।
*प्रचार प्रसार कर जनचेतना में सांस्कृतिक आंदोलन बढाना।
*हिंदी भाषा में प्रान्तीय, देशीय भाषाओं को भी शामिल करना
चाहिए।
हमें राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए तथा समस्त राष्ट्र बंधुओं को एक माला में पिरोने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करना चाहिए।जैसा कि महात्मा गांधी जी ने कहा है कि-' राष्ट्र भाषा के बिना देश गूंगा हैं।' और स्वयं को हिंदी में सराबोर कर हिंदी को नया आयाम देना चाहिए क्योंकि हिंदी भाषा में अपनी मिठास, लरजता, आत्मीयता का भाव होने के कारण इसे जल्द ही अपना लिया जाता है।
' हिंदी का भविष्य उज्ज्वल, वर्तमान संतोष जनक और स्वर्णिम इतिहास महान है'।