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गुरुवार, 14 सितंबर 2017

जो कुछ हूँ, सब आपके वजह से हूं. ........
माँ शब्द सुनते ही मन में अजीब सी हलचल होने लगती हैं, मन हिलोरें लेने लगता है।मेरी मां शब्द ऐसी ममतामयी दुनिया में ले जाता है,  जिसका सफर अनंत है।मन मस्तिष्क में ऐसी यादों का चलचित्र घूमने लगता है जो अपने आप में एक अनूठा, अमिट यादगार पलों से भरा उभर आता है?शब्द हीन हैं उसके प्रति कृतज्ञता के, जिसे कभी नहीं उतारा जा सकता।मेरी मां, मेरे लिए क्या थी, यह उनके जाने के बाद एहसास हुआ।जब से होश संभाला, मैंने उन्हें हमेशा दूसरों के लिए सर्वस्व न्यौछावर करते देखा।मुँह से उफ किए बिना किसी स्वार्थ के सभी के दायित्वों को निपटा देती।पर माथे पर जरा सी भी थकान की सिकन तक न होती।पता नहीं आज बहुत आपकी याद आ रही हैं।बहुत दूर चली गई, पर एक पल के लिए भी अपने अलग नहीं कर पाई।आज जो कुछ भी हूं आपके दिए गए संस्कार, सीख, हुनर की वजह से हूं।अपनों के बीच जो इज्जत मिलती हैं, उसकी हकदार सिर्फ और सिर्फ आप ही हो।सच ही कहा है कि बच्चों की प्रथम शिक्षिका माँ ही होती है।एक शिक्षिका और माँ दोनों भूमिकाओं में आपने न्यायसंगत ढंग से निर्वाहाकिया।अपनी ममत्व की आड में कभी व्यवहार में उच्छृंखलता नहीं आने दी।आपने केवल पालन पोषण कर बडा ही नहीं किया, बल्कि दुनिया के बीच अपनी जगह बनाने का हुनर भी सिखाया।आपकी हमेशा से ही यहीं कोशिश रहती थी कि मैं किसी से कम न आंकी जाऊं।मेरी विकलांगता को, मेरी खुशियों के बीच आडे नहीं आने दिया।मुझे पढाई के साथ हस्तकला का भी शौक था, तो आपने अपना हुनर तो दिया ही, साथ ही ढूंढ ढूँढ कर मुझे नई कलाओं में पारंगत करने की पुरजोर कोशिश करती।ऐसा नहीं कि केवल वह ममत्व ही नहीं लुटाती, गलत राह चलने पर डांटती फटकारती भी थी।कभी अपनी असहाय होने पर निराश होती, तो उससे उबरने के लिए बैचेन हो उठती।नैतिक मूल्यों की शिक्षा तो दी, लेकिन सामाजिकता का पाठ उन्हीं से सीखा।कैसे वो दिन रात हम बच्चों की परवरिश के साथ, परिवार के अन्य सदस्यों का ख्याल रखने में पीछे नहीं हटती।कहने को मेरी माँ प्रवेशिका पास थी, पर आचार विचार में वो सर्वोपरी थी।एक विशेष सीख जो मुझे अपनी मां से मिली, वो थी संतोषी प्रवृत्ति।ऐसा नहीं जो मिला, उसी में संतोष करो बल्कि उसमें संतोष करके और अधिक आगे बढकर सफलताओं की सीढी पार करो।ऐसी थी मेरी माँ.....! जब साथ में थी तब इस बात का एहसास नहीं था ,लेकिन आज महसूस होता हैं कि मैनें आपसे क्या पाया।आज आपकी अनुपस्थिति बहुत खलती हैं, विचलित हो जाती हूँ कि कैसे आपके पास बैठकर मन की बात करूं.......! मेरी जिंदगी में आपका स्थान ईश्वर से भी ऊपर है।मेरे पास न होते हुए भी कमजोर समय में मेरी ताकत हो।आज आपके ही कारण लोगों के बीच बैठकर गौरवान्वित महसूस करती हूं।आप मेरे लिए क्या थी, क्या हो, शब्दों में बयां नहीं कर सकते।बहुगुणी की धनी, साक्षात स्वरूप ईश्वर की, संवेदनशील, दाता एवं शक्ति की असीम पुंज, नि:स्वार्थ, प्रेममयी मूर्ति, उदारमना, विलक्षण सहनशील , ममता का सागर बयां करने में शब्दहीन हूँ।ऐसी थी मेरी माँ. ....!
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