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गुरुवार, 14 सितंबर 2017

               'भावी निर्माता अपना भविष्य बुनता'
अंधेरे किसी कोने मे ,शांत चित्त, एकाग्र हो,
बैठा है ,जाने किस उधेड बुन में,
लाचारी उसकी, हैं मजबूरी भूख मिटाने की,
कागज कलम पकडने वाले हाथों में,
थमा दी, जिन्दगी का बोझ उठाने की मजदूरी,
ऑंखों में हैं उसकी सजीली सपनों की दुनिया,
एक- एक खपची में बसता सपना,
आशंका है, कहीं टूट न जाए ये आशाएं ,
डर है, उलझ न जाए सपने,   इन    गोल - गोल घेरों में,
कहीं सूख न जाए सपनें, इन सूखी खपचियों से,
सजग हो,सधे हाथों से, ढेरों स्वप्नों को आपस में गूंथता,
देखो ! नन्हें हाथों की दस्तकारी,
एक नमूना  हुआ तैयार, ये भी हो जाएगा,
लेकिन कब होगा साकार, 'मेरा अपना सपना'!!!!

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