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मंगलवार, 19 सितंबर 2017

महिला कल्याण कार्यक्रम –           नारी महिमा ..........
                औरों के हाथों नहीं पलती हूँ,
                 अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ|
                                       -मैथलीशरण गुप्त जी
             जब उक्त पंक्तियों को महिलायें अपने जीवन में सार्थक करेगी,तभी महिला दिवस की सार्थकता होगी,क्योंकि महिला दिवस हमारे समाज पर एक ऐसा प्रश्न चिह्न बना हुआ हैं जिसका समाधान व सार्थक परिणाम नहीं प्राप्त हो रहे हैं.पुरुष प्रधान समाज में महिला अस्तित्व और उसकी पहचान कहाँ  तक?उसके सम्मान की कसौटी क्या हैं?नारी परमेश्वर की बनाई एक अलग मिटटी से हैं,जिसे जितना तपाया जाता हैं,वह उतना ही निखरती हैं.उसका अस्तित्व कल भी था,आज भी हैं और कल भी रहेगा.मेलिंडा गेट्स का कथन हैं कि-आवाज के साथ एक औरत,एक मजबूत महिला हैं. नारी के बिना स्रष्टि अधूरी हैं.महिलाओं को सशक्त बनने के लिए खुद में साहसपूर्वक बदलाव लाना अनिवार्य हैं.नारी अक्षम व कमजोर नहीं हैं बल्कि एक च्न्गरी हैं,लेकिन व्ही मूर्धन्य कवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने कहा हैं किअबला जीवन हाय,यही तुम्हारी कहानी,आंचल में हैं दूध,आँखों में हैं पानी.शास्त्रों में नारी का स्थान सर्वोच्च हैं,कहा गया हैं,जहां नारियो की पूजा की जाती हैं,वहां शान्ति का वास होता हैं.लेकिन व्यवहार में पुरुषप्रधान समाज में उसकी स्थिति बड़ी ही दयनीय हैं.नारी शक्ति का सकारात्मक पहलु यह हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में विकास के झंडे गाड़े हैं,अपनी पहचान बनाई हैं.महात्मा गाँधी जी ने कहा हैं कि-महिलाएं आश्चर्यजनक हैं.ऐसे बर्ताव करती हैं मानों सब कुछ अच्छा हैं.उस बिंदु पर भी जब दुनियां उनके कंधों पर हो और जीवन उगलियों की कोर से फिसल रहा हैं.व्ही उसका दूसरा पहलू बड़ा डरावना हैं.वीभत्स दशा हुई हैं,अत्याचार हुए हैं,प्रताड़ना मिलती थी लेकिन अब शायद इसलिए ज्यादा हो रहे क्योंकि वह चुप नहीं बैठ रही हैं.वह सशक्त बनकर पुरुष प्रधान समाज के लिए कड़ी चुनौती बन गई हैं.हमारा सम्विधान व कानून इसके लिए प्रतिबद्ध हैं.नारी के बड़ते कदम की ओर हमें उसका साथ देना होगा.जी.दी.एंडरसन ने लिखा हैं किनारीवाद महिलाओं को सशक्त करने की विचारधारा नहीं हैं.महिलाओं तो हैं ही सशक्त.यह तो उस ताकत के प्रति दुनियां का नजरिया ब्द्लन्र की पहल हैं.अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस नारी के सम्मान और गौरव के लिए समर्पित दिवस हैं,लेकिन प्रतिवर्ष दिवस मनाने पर हम शायद एक कदम आगे तो आगे बड़ते हैं ,तो दो कदम पीछे हो जाते हैं.उपलब्धियों की रौशनी की चकाचौंध में स्याह सच कराहता नजर आता हैं और उसकी कडवाहट गले तक आ जाती हैं.फिर कही से तमस भरे माहौल में विकास की एक चिंगारी नजर आने लगती हैं.विषमता भरा माहौल चारोतरफ हैं.

                 महिला दिवस मनाने की सार्थकता सही मायने में तभी होगी जब नारी को जीने का पूरी स्वतन्त्रता से निजता से,शुचिता से अधिकार मिले,तभी देश का विकास होगा.जैसा कि बराक ओबामा जी ने कहा हैं किजिस देश की अर्थव्यवस्था और नीति निर्माण में महिलाओं की ज्यादा से ज्यादा सहभाजिता होती हैं.वहां समाज के सफल होने के बराबर बड़ जाते हैं.अब स्त्री ने स्वयं की शक्ति को पहचान लिया हैं.सशक्त स्त्री की अभिव्यक्ति कई प्रकार से देखने को मिल रही हैं,उसने सिद्ध कर दिया हैं किवह एक दूसरे की दुश्मन नहीं,बल्कि सहयोगी हैं.पुरुष इस बात को स्वीकारे या नहीं कि स्त्री के बिना कोई भी काम पूरा नहीं हैं ,उसके काम को कितना भी अनदेखा कर दे.मारग्रेट थैचर का कहना हैं कि यदि आप किसी काम के बारे में कथनी चाहते हैं तो एक आदमी से पूछिये,यदि आप काम को हुआ देखना चाहते हैं तो एक औरत से पूछिये.दुनियां की आधी आबादी अपने सुनहरे भविष्य की राह पर हैं.सदियों तक पर्दे में रहा उसका चेहरा जिसके सपने कभी आँखों में ही दम तोड़ देते थे,अब हकीकत की रौशनी में साकार हो रहे हैं.सोच बदल रही हैं तो समाज में भी बदलाव आ रहा हैं.पुरुष प्रधान समाज में नारी अस्तित्व से जुडी मानसिकता में परिवर्तन आ रहा हैं.लेकिन फिर भी महिलाओं का वकास आकड़ो तक नहीं पहुच पा रहा हैं.क्योकि आस्कर वाइल्ड का कथन हैं कि-सभी महिलाएं अपनी माँ की तरह बन जाती हैं,यह उनकी त्रासदी हैं.कोई पुरुष नहीं बनता,यह उसकी त्रासदी हैं.हाँ ,यह सही हैं कि महिलाये फैसले स्वयं लेने लगी हैं.किसी समय में उसे पुरुष मात्र की छाया माना जाता था लेकिन आज उसे इन्सान समझा जाने लगा.क्योकि जेम्स थ्र्ब्र कहते हैं कि महिलाये पुरुषों से अधिक बुद्धिमान होती हैं ,क्योंकि वो जानती कम हैं और समझती ज्यादा हैं.प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं ने अपना मुकाम हासिल किया हैं.उसकी आवाज महिला,महिला की घोतक बन गई हैं.पुरुष इसलिए सफल हैं क्योंकि उसके पास पत्नियां हैं और स्त्रिया इसलिए असफल हैं क्योंकि उनके पास सलाह देने वाली पत्नियां नहीं हैं ,ऐसा डिक वैन डाईक का सोचना हैं.आज युवतियों ने आत्मविश्वास के साथ सही तरीके से बात कहना सीखी हैं,घर के पारम्परिक संरक्षित पुरुष कबच से बहार निकलकर संघर्ष करके अपनी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हासिल की हैं.बुलंदी का नया आयाम हासिल कर एक नया आसमान बनाया उर जिसके सदके महिलाओं ने आधे-अधूरे के दायरे को दरकिनार करते हुए अपनी आलोकित किया हैं.वे अधिक परिणाम पाने के लिए महिलाओं को राजनीतिक अधिकार दिए हैं उन्होंने पारिवारिक,सामाजिक सीमाओं को छोडकर उन्हें मन,विचार,अधिकार निर्णय आदि सभी पहलुओं में स्वतंत्र बनाने की आवश्यकता हैं.फतेह्गड साहिब में जन्मी गुलपनाग(गुलकीरत कौर)ने सं १९९९ में मिस इंडिया का खिताब जीता.वे अभिनेत्री नेत्री होने के साथ-साथ समाजसेविका,फिल्म प्रोड्यूसर उद्दमी,पायलट,बईक्र और स्वतंत्र सोच वाली घुमक्कड़ महिला हैं.उनकी जिज्ञासा हैं कि महिलाओं की भूमिका सिर्फ माँ तक ही सीमित क्यों की जा रही हैं,एक पुरुष प्रोफेसर होने के साथ-साथ पिता हो सकता हैं,तो एक महिला माँ होने के साथ प्रोफेसर क्यों नहीं हो सकती?’                                                                                               जारी हैं............................................
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