नारी महिमा ................. केवल उन्हें भयमुक्त बनाया
जाय बल्कि निर्णय लेने की पूरी स्वतन्त्रता दी जाय.इसलिय आधी आवादी सम्पूर्ण समाज
का बहुमुखीं विकास तभी होगा जब महिलाएं सबल बनेगीं ,हर वर्ग के सामूहिक प्रयास से
न को सशक्त ओर स्वतंत्र बनाने के लिए उन्हें सही मायने में समझा जाए तथा उनके
सशक्तिकरण में अग्रसर होने वाले उन अवरुद्ध कारणों को जानना होगा जो उन्हें सबल
नहीं बना पा रहे हैं.हमें महिलाओं को चेतनमयीऔर विवेक्सम्पन्न बनाना होगा.जिससे वह
अपने जीवन में स्वतंत्र निर्णय लेने व स्वस्थ द्रष्टिकोण में सक्षम बनने के लिए
संकीर्ण विचार धाराओं से उबरना होगा.स्वतन्त्रता हमारे अंदर भी मौजूद हैं.उसे केवल
पहचानना हैं,उसको पाने के लिए हमे चुनौती स्वीकारना होगी.शिक्षित होकर भी वह
सशक्तता ,स्वतन्त्रता और सामर्थ्यता का वास्तविक अर्थ नहीं समझती.हमें उन समस्याओं
की जडो तक पहुँचना हैं जो किस्वाधीनता के बाद भी राजनैतिक,सामाजिक और कानूनी तौर
पर अनेकानेक प्रयास होने पर भी अपेक्षित सुधार नहीं हो रहे हैं.ग्लोबेलाईजेश्नके
द्वारा पश्चिमी संस्क्रती व जीवन शैली का तेजी से भारतीय शैली पर प्रभाव या
संक्रमण हुआ हैं,जिससे दुष्परिणाम हिंसा,बर्बरता,अपराधों का कारण स्त्री से जोड़
रहे हैं.बल्कि यह संक्रमणता हमारे समाज की जड़ों को तवाह और जर्जर कर रही हैं.इसका
कारण मानसिकता दोषी हैं.आधुनिकता के नाम पर घर-परिवार,मानमर्यादा,लोकलज्जा और अपयश
जैसी व्रतियों के मिटने की वजह से निरंकुश और अमर्यादायें बड़ी हैं.स्वतन्त्रता का
बोध कराने के लिए हमें उन्हें भय मुक्त करना होगा,तभी वे विकसित,सशक्त बनने की
दिशा में अग्रसर हो स्क्र्गी.हालांकि स्वाधीनता के बाद बल विवाह निरोध कानून,सती
प्रथा विरोध कानून,विधवा विवाह कानून,कन्या भ्रूण हत्या कानून,दहेज़ और यौन शौषण
अपराधिक कानून से निश्चित ही महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ हैं,जिससे उनकी समाज
व परिवार में स्थिति में सुधर देखने को मिला हैं.लेकिन अभी भी काफी प्रयास करना
बाकी हैं.महिलाओं को समानता का हक पाने के लिए उसे एक संतुलन अनुशासन की आवश्यकता
हैं,क्योंकि पुरुष वर्ग को अपना विरोधी मानकर या शोषण समझकर सशक्त नहीं बन
सकती.अपने स्वतंत्र वजूद को हासिल करने के लिए बच्चों को दोयम नहीं मानना हैं और न
ही दायित्वों को बंधन.क्योकि विध्वंस और विख्न्दं से कोई समाज फलफूल नहीं
सकता.अपनी सशक्त सहभागिता हासिल करने के लिए स्वयम विवेक से काम लेना होगा.शिक्षा
का पाठ्यक्रम नैतिक शिक्षा पूर्ण होना चाहिए,जिससे वो विवेक,बुद्धि और चेतना का
इस्तेमाल कर आत्मविश्वास से पूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हो सके.समाज को संस्कारी
व चेतन्यम्न्यबनाने का कार्य भी महिलाओं का ही हैं. केवल शिक्षित होकर कोई बेहतरीन
नागरिक नहीं बन सकता हैं.सभी,सुसंस्क्र्त,संस्कारवान बचपन से ही महिलाये ही नहीं
बल्कि सम्पूर्ण समाज का बहुमुखी विकास होगा.मुश्किल जरूर लेकिन असम्भव नहीं.
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
महिलाओं की बेहतरीन स्थिति और उनकी उपलब्धियों का दुनियां को बताने का जरिया
हैं.एक तरह से यह दिवस महिलाओं के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार करता हैं,ताकि वे
विकास के नये-नये सोपान टी करे.महिलाओं के तमाम दुश्वारियों के बावजूद हर क्षेत्र
में अपनी सफलताओं का प्रचं लहराया हैं.हमारे अस-पास कई जीवंत मशाले महिला
सश्क्तिक्र्ण की देखने को मिलती हैं,जो हमारे जिह्न में असर छोड़ जाती हैं और
जिव्न्त्पर्य्न्त आगे बदने की प्रेरणा देता हैं.महिलाओं को कभी यह नहीं सोचना
चाहिए कि वह परम्परावादी विचार धाराओं से घिरी पिंजरे में कैद पंछी हैं.अपनी यह
निराशावादी प्रवर्ती छोड़ एक नई उमंग के साथ जिन्दगी में आगे बदने के लिए अग्रसर
कदम बडाने चाहिए.इसके लिए हमे सकारात्मक द्रष्टिकोण रखना पड़ेगा.एक हौसलें बुलंद
करने वाला सकारात्मक द्रष्टिकोण जो महिलाओं को कामयाबी के रास्ते टी करे.महिलाओं
ने अपनी कामयाबी के झंडे गाड़े हैं.कभी वो जमीन में ऑटो रिक्शा या बीएस चलाती हैं
तो कभी वो आसमान में पायलट बन उन्मुक्त आकाश में विचरण करती हैं.दिल्ली में फिक्की
की महिला शाखा इंटरनेशनल मोनिट्री फण्ड की एमडी क्रिस्टीन ने वर्ल्ड इकॉनमी फौरम
ने कहा हैं कि’अगर
महिलाये सफल तो,अर्थव्यवस्था बदिया.बेहद महत्व रखता हैं.भारत का ३१.२%महिलाओं का
आर्थिक क्षेत्र में योगदान हैं.फोब्र्स पत्रिका में ५० महिलाओं में से केवल आठ
महिलाये ही भारत की हैं.केलेंडर में ८ मार्च को महिला प्रतीकातात्मक सम्मान के रूप
में अंकित करना चाहिए.महिलाएं अपने हक के लिए आवाज उठा रही हैं.वह जागरूक हुई
हैं,आन्दोलित भी.उसका परिणाम यह हुआ किसरकार को उसके हित में कारगार कदम उठाने
पड़े.इन सुविधाओं से महिलाओं की राह आसान ही नहीं हुई बल्कि सशक्तता की डगर पर भी
आई.पुरुषो का एकाधिकार माने जाने वाले क्षेत्रों में अब महिलाएं निकल पड़ी हैं,यह
राह उसे अबला से सबला बनाती हैं.इस पर केवल शिक्षित व शहरी ही नहीं बल्कि ग्रामीण
परिवेश की अशिक्षित महिलाएं भी आगे आ रही हैं.शान से सर उठा कर स्वाभिमान की
जिन्दगी जी रही हैं.अपने स्वाभिमान को बनाये रखने के लिए वो हर काम करने को तत्पर
रहती हैं.अब महिलाओं की चुप्पी तेज दमदार आवाज में बदल गई हैं जिसने व्यवस्था के
बहरे कानों में हुंकार भरी हैं.अब यह आवाज देश में कोनों-कोनों से महिला भागीदरी
के रूप में उठने लगी हैं.
महिला एक शक्तिपुंज के समान हैं
जिस पर समाज की व स्वयम की बंदिशों का आवरण पड़ा हुआ हैं.उसे अपने अंदर की छिपी
आंतरिक सबलता को पहचानना होगा उसकी जेहन से अपनी कोमलता का आवरण हटाना होगा तभी वह
समाज में बराबरी का दर्जा प्राप्त कर
सकेगी.उसे बोल्ड बनना होगा.आत्मविश्वास को प्राप्त करना होगा.उसे अपने आप से
साक्षात्कार करना होगा,तभी वो जीवन के निर्णयों में बराबरी का और ताकत में बराबरी
को हासिल कर पाएगी.और सबसे बड़ी बात उसे स्वयम की नजर मैं बराबरी का मानना होगा.यह
स्वीकार्यता उसे अंदर से लानी होगी.समाज को तभी विशवास दिला सकेगी,जब वह स्वयम पर
विशवास दिला सकेगी गब वह स्वयम पर विशवास करेगी.महिला माँ ,बहिन ,बहू ,बेटी के रूप
में औए न जाने कितने रिश्तों को निभाती हैं.धरती पर कदम रखते ही उसकी स्वांस के
साथ ये रिश्ते उसकी अंतिम सांस तक चलते रहते हैं.ये रिश्ते पुरुषों को चारों ओर से
घेरे रहता हैं.इनमे से कोई भी रिश्ता कम या ज्यादा नहीं होता हैं.किसी भी रिश्ते
को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता हैं.अगर इन रिश्तों में कभी उतार-चदाव आ जाता हैं
तो पुरुष अधूरा रह जाता हैं.वह उसके हर रिश्तों को पूरा करती हैं.इस बार २०१७ में
अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर थीम’बी
बोल्ड फॉर चेंज’
हैं.आप खुद को कई तरह से बदल सकती हैं.महिलायें अपने सुखों को भी कितनी सहजता से
बाँट लेती हैं.वह अपना प्यार पुरुषों को विभिन्न रूपों में देती हैं,जिसके बांटने
के सुख का एहसास पता भी नहीं चलता.महिला का अपने पति के साथ ऐसा वह रिश्ता हैं
जिसका आभास पुरुष को नहीं होता कि कैसे एक अनजान व्यक्ति रिश्तों ने बंधकर अपने
सम्पूर्ण जीवन को समर्पित कर देता हैं.यह सही हैं इस रूप में स्त्री की जिम्मेदारी
भी जुडी हुई हैं किकिसी भी महिला का सम्मान कभी कम न हो क्योंकि उसके इसी विशवास और
आचरण को देखकर अन्य का विशवास बना रहता हैं.बेटी के रूप में महिला यह विशवास जगाए
रखती हैं,कोई आसमान उससे बड़ा नहीं हैं.वह हर आंगन की एक फुदकती चिड़ियाँ हैं.वह हर
पिता का मान होती हैं.अपनी माँ का सम्बल होती हैं.बेटी की उपलब्धियों पर पिता को
बेटे जैसा नाज होता हैं.वह जीवन में ऐसा कोई भी काम नहीं करती जिससे उसको कम आंका
जाए लेकिन वह सामने वाले को खुश करने के लीये ऐसा वैसा कुछ नहीं करती हैं.उसके
विचार बोल्ड होते हैं जो आपकी पहचान आपसे कराते हैं और आपको आप बनाते हैं.अपने डर
पर काबू पाने के लीये अपनी सारी शक्तियों को एकत्र कीजिए और उस डर पर विजय पताका
फहराएगी.किसी कम से डर कर मत कीजिए बल्कि हिम्मत व आत्मविश्वास के साथ हाँ कहिये
तो आप एक नये विश्वास के साथ भरी हुई होगी.अपने आप को खुद व खुद पहचानिए ,कदम
कितना भी छोटा हो या बड़ा,उस पर बदने की दिशा में कदम बडाईये.
महिलाओं को कठपुतलियों कहा
जाता हैं.मौन मोम की गुडिया की तरह उसे घर शोभा बडाने वाला समझा गया लेकिन अब
गूंगी गुड़ियाँ में जुवान आ गई हैं,उसके बोल फूंटने लगे हैं.वह अब महिला वर्जित
स्थलों पर हुंकार भरेगी और वक फूटेगा कि बीएस अब ओर नहीं सूर्य अपनी दिशा बदले या
ना बदले लेकिन ,अब और नहीं.कोने-कोने से एक ही हवा बहेगी और उस हवा में इस
कठमुल्लावादी पुरुष समाज का गुमान वह जाएगा.परम्परा का वास्ता देने वाली सोच
लुद्क्ति नजर आएगी.जद से इन्हें फेंकने,नये सोच का नये आसमान बनायेगे और ये आसमान
उन कुरीतियों पर तलछट बन जम जाएगा.दासता मुक्ति की किरणों को भेदकर बहार निकल
जायेंगी.
जारी हैं.....................................