नारी महिमा................. सामाजिक-राजनीतिक मोर्चे पर
महिलाओं को प्रमुखता देने में हिचक की ठंडी वर्फ पिघलने लगी हैं.उसकी क्षमताओं पर
भरोसा कर वह संकटमोचक ठाल के रूप में करना यह परम्परावादी समाज में स्त्री
वर्चस्वता का संकेत हैं.ऍन.माचुंग ने द सेकंड शिफ्ट में इसका साक्षात उदाहरण १६
मार्च,सन१९९९ को शिरोमणि द्वारा गुरु प्रबन्धक कमेटी की नव निर्वाचित अध्यक्षता
बीबी जागीर कौर जो ७४ वर्षो के इतिहास में प्रथम महिला चुनी गई,सं १९९१ की
जनगणनामें औरतो को जबाव देने की अधिक्रत किया गया.सं २००१ की जनगणना में ज्घु करने वाली महिलाओं का अलग से कालम दिया गया.७०-८०
के दशक में ऐतिहासिक अध्ययन में बताया गया किआज भी दोहरी आय वाले परिवार की
वास्तविकता बताती हैं कि कैसे आज भी ७०%स्त्रियाँ दोहरी जिम्मेदारी का बोझ उठा रही
हैं.उनकी आर्थिक स्वतन्त्रता को स्वीकार कर तो लिया गया हैं ,लेकिन घरेलू
जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया.एक और घरेलू जिम्मेदारियां बच्चों की देखभाल और
दूसरी ओर आर्थिक सम्बल होने का अहसास उन्हें जकड़े रखता हैं.
धर्म और ईश्वर तो जीवन से जुडी
जाग्रत उत्प्रेरकता हैं फिर भी ये कुप्रथाएँ हिन्दू समाज में कहा से आई,जबकि
मुस्लिम,पारसी,ईसाई समाज में स्त्रियाँ चीखों ,लपटों ,दर्दनाक मौत से महफूज
हैं.कुप्रथाओं का कारण अशिक्षा ,कुदृष॒टिकोण,नासमझी की आग जिस पर शिक्षा विस्त्रत
द्रष्टिकोण का पानी डालकर श्राप मुक्त करना होगा.गैर सरकारी ‘वुमन पोलिटिकल वाच’की अध्यकक्षा श्री
मति मीरा नायर कहती हैं किस्त्रियों की हिदायतों को बंधन मानने का कारण,पुरुष
प्रधान समाज में निर्णय होने,आदेश देने का कार्य पुरुषो का होना हैं.साहित्य में
स्त्री की स्वाधीनता ज्यादा दर्शाई गई हैं.स्त्री की स्वतन्त्रता केवल सम्बिधान
में दी गयी आयतों से समाधान नहीं क्योंकि स्म्बिधाब में लिंग समानता,मताधिकार दिए
जाने पर भी क्रान्ति की धरा मंधिम पड़ी हुई हैं,जिसमें एक कारण आर्थिक विकास की
मद्धिमता ,जिसमे पुरुषों का एक बड़ा वर्ग भी वंचित हैं.जिससे स्त्री विकास की
यात्रा अवरुद्ध हुई .स्त्री –पुरुषों
का विश्लेष्ण करने में अंग्रेजी मुहावरा दोहराया जाता हैं कि ‘पर्सनल इस पोलिटिकल’जबकि यह थी तो कहा
जा सकता हैं कि ‘पोलिटिकल
इस पर्सनल’
स्त्री ही हें.स्त्री का अमानवीय रूप अर्थात ग्लोबल शोषण का शिकार ग्लोबल स्त्री
ही हैं.इसका कारण ग्लैमर हैं.आदुनिकता की पैदाईश महत्वाकान्क्षायं हैं.प्राचीनकाल
से यह जघन्य सच ही हैं जिसे आधुनिकता का नांदिया जाता हैं कि पूरी जगत में स्त्री
स्वेच्छा से एक मुद्दत से इजाजत देती रही और दे रही हैं.
आधुनिकता के नाम पर अपने को उच्च
मानने की महत्वाकान्क्षाओं में से अपने आप से पूछें किक्या ये आदिम स्त्री से एक
कदम आगे बड़ी हैं या चार कदम पीछे चली गयी.नुमाईश के नाम पर कमाना ही समझदारी का
राज नहीं बल्कि आसमान से गिरी खजूर के पेड़ पर अटक गई.औरतों का गहना ही उनका
सौन्दर्य का सामन कम, गुलामी की नकेल बन गया हैं.गहने औरतों का ब्रांड देकर उसके
साथ छलावा हो रहा हैं क्योंकि औरत और आभूष्ण एक दूसरे के पर्याय हो गये
हैं.प्राचीन समय में औरत और गहनों को परम्पराओं से जोड़े रखना तो आधूनिक काल में
फैशन परवर्ती और विज्ञापन बाज़ार मिलकर उसे बंदी बना रहे हैं.इसे मोह्बंद का प्रभाव
उसके व्यक्तित्व पर पड़ता हैं.तात्पर्य यह हैं किइस मोहपाश के छलावे के प्रति अंधी
पट्टी मानकर समझौता करना समझदारी नहीं बल्कि अपने प्रति दगाबाजी करना हैं.एटलश ऑफ़
वीमेन एंड मेन इन इंडिया में एक ऐसा हथियार साबित हो रहा हैं जिसमे औरतों को
नक्शों में दर्शाया जा रहा हैं.उनके प्रति लिंग भेद भाव ,विभिन्न प्रकार की
योजनाओं को बनाने की स्थिति सुधारने में लाभदायी हैं.क्योकि सही आकने न होने
पर,उपलब्ध आक्नो के आधार पर भविष्य की लकीरे खींच दी जाती हैं.
अदूरदर्शितापूर्ण
निर्णय और नैतिक मूल्यों का गला घोटकर भविष्य के प्रति अनिश्चता की भावना रखने
वाली महिला के सम्बन्ध में अरस्तु ने कहा हैं कि-‘औरते तो हर तरह से पुरुष से कम व कमजोर
हैं.उसके मुंह में पुरुष से कम डांट हैं क्योंकि भारत देश में ६०%महिलाये काम करने
पर भी,निर्वाचक प्रक्रिया में भागीदारी का सिर्फ २९%हैं.यह महिला स्श्क्तिक्र्ण के
नाम पर नकली लोकतांत्रिक रचना का नाटक रचा जा रहा हैं.डार्विन का सिद्धांत ‘जो क्षमतावान
होगा,वही उभरकर आयेगा,बाकी सब नष्ट हो जाएगा’,यह
मानकर भी नहीं चलना चाहिए.पद्मविभूषण सम्मानित समाजसेविका श्रीमती ईलावेन भट्ट का
विचार हैं कि-दहेज़ के महिषासुर जैसी अन्य कुप्रवर्तियो का अंत महिलाओं को आर्थिक
सत्ता की जिम्मेदारी सौपी जाएँ.हालांकि औरतो ने अपने विश्वास व कर्मठताओं से
वर्जित क्षेत्रों में कदम रखकर वर्जनाओं की ठेर सारी दीवारों को ठहाया और अपमान के
खानों में अपने लिए सम्मान अर्जित कर अँधेरे में विशवास का दिया जलाया हैं.प्रथम
आईपीएस अधिकारी श्रीमती किरण वेदी तमाम ताकतों और दबावों को झेलते हुए हासिल करवा
दिया कि ‘व्यवस्था
उतनी ही भ्रष्ट हो सकती हैं जितनी किहम उसे होने दे सकते हैं.’अगर हम सम्भलना चाहे
सम्भल सकते हैं.म्धुकिश्व्र की लोकप्रिय पत्रिका’मानुषी’महिलाओं के हक से परिचित कराके तमाम
शोषण महिलाओं की आवाज न गई हैं.चर्द्र्कांत देवताले कहते हैं कि-एक औरत का धड भीड़
में भटक रहा हैं.उसके हाथ अपना चेहरा ठुड रहे हैं.उसके पाँव जाने कब से,अपना पता
पूछ रहे हैं.बीजिंग सम्मेलन का मुख्य दर्शन यही हैं कि’विकास प्रक्रिया में
महिलाओं का स्थान वस्तुपरक न होकर ,विषयपरक होना चाहिए.’ होहई व्यर्वाला
पहली फोटोग्राफर सं १९४२ के दौरान विश्व द्वितीय युद्ध के जीवंत द्र्श्यो को लेकर
यह सिद्धा कर दिया कि’अगर
महिलाओं को स्वतन्त्रता दी जाए तो वे प्रत्येक परिस्थितियों का फायदा उठाकर पुरुषो
से आगे निकल सकती हैं.’विश्व
बैंक ने नया नारा दिया था किनारी उत्थान की द्रष्टि से किया गया निवेश अच्छा
अर्थशास्त्र होता हैं,क्योंकि स्त्री,स्त्री समाज का आधा हिस्सा और राजनितिक
शब्दावली में इसका अर्थ पचास फीसदी वोट.महिलाओं के सम्बन्ध में वशीर वद्र कहते हैं
कि’हम भी दरिया
हैं ,हमे भी अपना हुनर मालूम हैं जिस तरह भी चल पड़ेगे ,रास्ता हो जाएगा.’ऋणोंसे मुक्ति
दिलाने में समाजसेविका इला भट्ट जो सेल्फ एम्प्लोयेडवीमेन एसोसिएशन नामक संगठन की
संचालिका,जिन्होनें सं १९७४ में स्थापित संगठन ने कामकाजी और श्रमिक महिलाओं को
संगठित करने में अहम भूमिका निभाई.स्त्री मुक्ति व उत्थान में न्यायमूर्ति
वी.आर.क्रष्ण अय्यर का कथन उद्धत है कि ‘महिलाओं
की स्थिति सुधारने में विफलता के लिए समाज के शक्तिवान लोगो की कमजोर इच्छाशक्ति जिम्मेदार
हैं.प्रशासन के पाखंड और उसकी कथनी व करनी में बेहूदा अंतर हताश करता हैं.’म्रणालपांडे कहती
हैं कि’स्त्री
वामा हैं यानि स्त्री शक्ति पुरुष की विरोधी नहीं,बल्कि स्रष्टि के अधूरेपन की
पूरक हैं,स्त्री के वामा रूप की हमारे पूर्वजों ने इसलिए कल्पना भी की थी की अपनी
सारी स्वभाव और रूपगत विविधता समेत पुरुष और स्त्री मिलकर सम्पूर्णता को प्राप्त
करे.वे सच्चे अर्थो में एक दूसरे से सहचर-सहचरी बनी,लेकिन कई झमेलों के चलते
स्त्री का सह्चरी रूप अवमूल्यन का एक ऐसा शिकार हुआ किवह रह गई मात्र अनुचरी.’ संक्षेप में कहे तो
हमे दैवीय अवतार की नहीं ,मानव उत्थान की उत्क्रष्ट आवश्यकता हैं.महिलाओं को अपने
उत्थान के लिए प्रताडनाओं व अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने वाली अर्थात मानवीय
उत्थान का साक्षात उदाहरण भंवरी देवी बनना होगा,जिन्होंने के अघोषित महिला सम्मेलन
में शामिल होने के लिए जाते समय कहा था कि’अत्याचार
और अत्याचारियों से लडती रहूंगी .
भारत में १८ साल तक प्रधानमन्त्री
रही श्रीमती इंदिरा गाँधी ,महिला राज्यपाल व सांसद रही प्रतिनिधियों से आशा की
जाती रही किअब सार्थक ठोस कदम उठाया जाएगा,लेकिन इस पर श्री मनोहर लाल लोहिया जी
का वक्तव्य था कि’कितने
दुःख की बात हैं किजिस देश की प्रधानमन्त्री एक महिला हैं ,वहाँ की करोड़ो महिलाओं
के लिए शौचालयों की व्यवस्था नहीं हैं.’समाज
और राष्ट्र निर्माण में महती भूमिका
होने पर भी अर्द्ध सामन्ती व्यवस्था के कारण सामाजिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ
हैं.रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी ने कहा हैं कि’अगर
स्त्री जाती का दुखी होना अवश्यम्भावी हैं,अगर यही तुम्हारी व्यवस्था हैं तो फिर
जहाँ तक सम्भव हो,उसे अनादर में रखना उचित नहीं हैं.आदर से दुःख और व्यथा ओर बड
जाती हैं.इसका एक कारण सुश्री अंजना अनिल,विश्व विद्यालय,ल्घुकाम्कार १९८९,के
शब्दों में-‘औरत,औरत
को न मारे ,तो कभी न हारे .’
महात्मा गाँधी जी का कथन हैं कि
‘जीवन में जो
कुछ पवित्र और धार्मिक हैं,स्त्रियाँ उसकी विशेष संरक्षिकायें हैं’.पुरातन समय यानि सं
१९५२ के समय की महिलाएं आंगन भर धरती और खिड़की भर धूप की चाहरदीवारी में पुरुष
प्रधान समाज में कैद थी.आसफ अली के शब्दों में महिला अधिकार एक आभूष्ण से अधिक
महत्चपूर्ण नहीं हैं.इस अधिकार क्र साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ हैं,जिसके लिए
सचेत रहना होगा.महिलाओं को आजादी तभी मिलेगी ,जब तक वह अपनी गुलामी को अपनी नियति
न मानकर विद्रोह करे.तो यही से एक नई गूँज की तरंगे उठकर उसे आगे ले जायेगी,लेकिन
उसके व्यक्तित्व विकास के लिए उसकी कर्मठता,नैतिकता,मातार्त्वता को समाज में
सम्मान दिलाना होगा.नारी मुक्ति का झंडा न फहराकर बल्कि उसके द्वारा किये गये
कार्यो के योगदान को समाज हित में परिभाषित करने की जरूरत हैं.जैसा किअरस्तू ने
कहा हैं कि-‘नारी
की उन्नति और अवन्ती पर ही राष्ट्र की उन्नति और अवन्ती निर्भर हैं’.औरत जननी
हैं,स्रष्टि की रचयिता होने पर भी जब उसके अधिक अधिकारों की बात आती हैं तो
पुरुषों के समकक्ष दर्जा क्यों दिया जाता हैं?उसके लिए अधिकार पुरुष से ज्यादा
होने चाहिए क्योंकि उसके कर्तव्य भी तो पुरुषों से ज्यादा हैं.इस सम्बन्ध में
जायसी का कथन हैं किस्त्री और पुरुष विश्व रूपी अंकुर के दो पत्ते हैं.महिला दिवस
मानकर ही छुट्टी नहीं की जा सकती बल्कि मुक्ति के पिंजरे से निकलने के लिए महिलाओं
को नियम तोडकर स्वयम फैसले लेने की पहल करनी पड़ेगी और खुद को पड़ना पड़ेगा की वह
क्या कर सकती हैं?तभी कुछ बदलाव हो सकता हैं.विश्व भर में महिला मुक्ति को लेकर जो
हलचल मची हेनुसका परिणाम यह हुआ किपुरुष वर्चस्व वाले जो कितने भी श्रम साध्य हो
या बेकार से बेकार हो लेकिन उससे प्रवेश सिद्ध कर दिया.पूर्व आईपीएस अधिकारी
श्रीमती किरण वेदी के शब्दों में शिक्षा महिला समाज की पहली गारंटी हैं.महिलाये
अपनी स्थिति का सम्पूर्ण विश्लेष्ण कर स्वयम को पुरुष की सम्पत्ति न समझे और उसके
एकाधिकार वादी रवैये को खत्म करने की दिशा में प्रयास शुरूकर स्वयम को मानसिक स्तर
पर पुरुष की गुलामी से मुक्त करे.प्रेमचन्द जी का मत हैं कि-‘नारी सब कुछ सह सकती
हैं,दारुण से दारुण दुःख,बड़े से बड़ा संकट,अगर नहीं सह सकती तो अपने यौवन काल की
उमंगो का कुचला जाना.’प्राचीन
मिथक को तोड़े वह बच्चे पैदा करने वाली मशीन नहीं हैं और न ही पुरुष सुरक्षा की
गारंटी हैं.अनादर नाम की चीज राख की तरह होती हैं.बहार से ताप दिखाती नहीं,जब
आत्मसम्मान कम हो जाता हैं,तब अनादर भी अन्याय लगता हैं.उसे वेदना महसूस नहीं
होती,तभी तो नारी दुःख का अनुभव करने में शर्माती हैं.
शिक्षित वर्ग की महिलाओं में अपने को
पूर्णतया सिद्ध कर अप्रत्याशित परिवर्तन किये बल्कि अशिक्षित और प्राचीन अंचलों
में भी पुरातन पंथी विचार छोडकर आगे आई हैं.कदम आगे बड़करपरिवर्तन की लहर आई हैं.सं
१८५७ में नारीवाद का जिक्र पुरुष समाज के विरुद्ध छेड़ागया एक अभियान था जिसका अर्थ
था ‘वह
विचारधारा जो एक स्त्री को अपने जायज अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाती
हैं.वर्तमान में यही परिवर्तन उसी विचारधारा का परिणाम हैं विचारधारा का संकेत था
की क्रान्ति दबे पाँव आ रही हैं,जो लोग नारीवाद को ढकोसला कहते थे ,उनके लिए
चेतावनी थी.’जब
महिला आरक्षण विधेयक आने पर सांसद पुरुषों ने कहा था कि’यह संसद परकटी
महिलाओं की विरासत हो जाएगी’.महिला
आरक्षण ३०%मिलने पर भी सं १९९८ में हुए चुनावों में कुल ४५७६ उम्मीदवारों के
मुकाबले में महिलाओं की संख्या 267 थी जिससे जीती केवल ४३ महिलाये.इनमे से कुल प्रतिशत
उन महिलाओं का हैं जो राजनीति में महज डमी बनकर लाई गई.कहने का तात्पर्य –विहार में
रावड़ीदेवी,मध्यप्रदेश में छबीला नेताम,अलका नाथ,नईदिल्ली में मीरा कुमार या सोनिया
गाँधी.तात्पर्य यह हैं कितादाद में इजाफा हुआ हैं न किसुधार की संज्ञा मानी जा
सकती हैं.दोस्तोयव्स्की का कथन हैं कि’अन्तत:सुन्दरता
ही इस दुनियां को बचेगी.उनके इस वक्तव्य का अर्थ हैं किस्त्रियों की कोमलता और
सम्वेदना से था, नहीं कहा जा सकता.पर यह सच हैं किस्त्री ही दुनियां बदल सकती
हैं.उसे न्रशंसता और क्रूरता से बचाकर मानवीय समवेदना,प्रेम और जागरूकता की ओर ले
जा सकता हैं.
आज भी महिलाओं के लिए दिल्ली
दूर हैं,क्योंकि जो स्थिति हैं हैं वह ‘नक्कारखाने
की तूती’की
स्थिति बनकर रह गई हैं.अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में
वास्तिवक प्राशन्गिकताहैं की इसके जरिये महिला समाज को अभिव्यक्ति का मौक़ा मिला.’नारीवाद’का जिक्र सर्वप्रथम
सं १८७५ में एक लेख में किया गया था जिसका अर्थ था कि’वह विचारधारा जो एक
स्त्री को अपने जायज अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाती हैं.’नारीवाद हो या कोई
भी विवाद जब जड पकड़ने लगता हैं तो कुछ नकली प्रारूप और स्वयम्भू मठाधीश भी सर
उठाते जरूर हैं,लेकिन मुद्दा कभी न कभी उछल लेता जरूर ही हैं.मीडिया ने एक लतीफे
की तरह प्रस्तुत कर प्रचारित किया कि ‘महिला
पुरुष विद्वेषी हैं,अहंकार से चूर हैं,परिवार तोड़ना चाहती हैं.’नारी स्वतन्त्रता
परिवर्तन में अशिक्षा नारी के लिए अभिशाप बन गई हैं,क्योंकि अशिक्षा ही नारी को
पुरातनवादी परम्परावादी व्यवस्था पर सीधा प्रहार करने व गहराई से सूझबूझ का परिचय
देने में प्रबल कदम हैं जिससे वह अपनी व्यवहारगत द्रड़ता,योग्यता व सक्षमता के आधार
पर नारी प्रस्थिति परिवर्तन की कर्णधार बनेगी.
जेम्स स्टीफन कहते हैं कि ‘पुरुष से नारी अधिक
बुद्धिमती होती हैं क्योंकि वह पुरुष के कम जानती हैं,किन्तु समझती ज्यादा हैं.’ अशिक्षा के साथ साथ आर्थिक पराश्रिताभी
इच्छाओं,कल्पनाओं के पंख तोडकर दम घोट रही हैं.आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनकर
स्वतन्त्रता का जीवन जीने को अग्रसर हो रही हैं.साथ ही शिक्षित नारी का दायित्व
नारी अशिक्षा के अन्धकार को दूर करना,उनके सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करना जिससे
सीमित दायरे से बाहर निकले.नारी परिवर्तन तभी सम्भव हैं जब स्वयम को उठाने का
प्रयास करके स्वयम में चैतन्यता लाये तभी सभी प्रयास सफल होगे.क्योकि विवेकानंदजी
कहते है कि ‘स्त्रियों
की स्थिति में सुधार न होने तक विश्व में कल्याण का कोई मार्ग नहीं हैं.किसी पंछी
का एक पंख के सहारे उड़ना असम्भव हैं.’विकास
में महिलाये तभी साधक होगी जब उन्हें विकसित महिलाओं का रूप दिया जाएगा अर्थात
महिलाओं को प्राइमरी शिक्षा देना,स्वास्थ्य की रक्षा करना,रोजगार शुदा बनाकर
महिलाओं को विकास की मुख्य धरा के साथ जोड़ सकेगे.पूर्ववर्ती वसीयतों और विरासतों
से पहचानी जाने वाली स्त्रियाँ अबूझ और अलौकिक उदाहरण बना दी जाती हैं जिन्हें
जल्दी ही स्म्रतियों और स्मारकों में बदल दी जाती हैं.दरअसल ये स्त्रियाँ पुरुष
प्रवर्ती की पोषित और उसी से पोष्ट हैं.इसलिए इसका समुदाय दुर्भाग्य से ‘स्त्री का
नहीं,पुरुष का ही हैं,क्योंकि वे उसी की परिधि हैं’.पुरुष के रिफ्लेक्सं में हैं.घर,घराने
में और घराना श्रद्धा और परम्परा में बदल जाता हैं.राल्फ दल्फो एमर्सन का कथन हैं
कि ‘नारी
वह हैं जो अपने चारों ओर दर्द की बजाय ख़ुशी ब्खिरने की इच्छा से बदकर रूप रंग और
चरित्र को निखारने वाली कोई श्रंगार सामग्री संसार में नहीं हैं.’विशेषज्ञों की राय
और पुरुष प्रधान समाज की विचार धारा हैं कि’स्त्री
शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण वर्तमान में पंचायत विभाग में उच्च पड़ में
विराजमान होने पर भी ,उनके व्यवहारिक जीवन में निर्भीकता,दबंगता का अभाव स्पष्ट
दिखाई देता हैं.वह अपने गरिमा और पद के ठांचेमें अनुकूल महसूस नहीं कर रही हैं और
इसका प्रत्यक्ष प्रभाव विकास कार्यक्रमों पर पड़ता हैं और इसीलिए उनका अवांछित शोषण
होता हैं.शिक्षा के अनभिज्ञता ,दब्बूपन,कार्यक्षमता का अन्देखाप्न के अलावा एक ओर
अहम मुद्दा हैं.महिला पंचायत सदस्य का अपने जीवन के प्रति सकारात्मक द्रष्टि कोण नहीं रखना.ग्रामीण महिलाओं की
वास्तविकता को चरितार्थ करती कवि की यह पंक्तियाँ-‘गीली लकड़ी ,चूल्हा चौका.चिंता,बेलन और
धुआँ .भीगा अंजन,बजते कंगन,यह गोरा तन और धुआँ.मेंहदी रचे हाथों पर आजीवन बस यही
लिखा हैं.’
चूंकि एक स्त्री ,पुरुष के समान
सोचने,विचारने,कार्य करने की क्षमता रखती हैं.इसलिए उसे भी पुरुष के समान
व्यक्तित्व विकास के समान अवसर मिलना चाहिए.हजार कष्ट सहकर भी सुजीवन को आकार देती
हैं.विवाह को दासता और लिंगाधार पर दोयम व्यवहार करना अनुचित हैं न किउसका
स्वाभिमान ,सम्मान और गरिमा ठोकर मारने के लिए.महिला प्रिवेर्त्न के लिए असमानता
के विरुद्ध संघर्ष की जरूरत हैं.संगठनों के साथ पुरुषवर्ग को भी समकक्ष समझते हुए
अग्रणी बनने को प्रोत्साहन करना होगा.पड़ी-लिखी औरते ग्रहस्थ जीवन यापन कर रही
हैं,उन्हें अपने ज्ञान को य्व्य्हारिक में शामिल करना होगा.निरक्षता तो अभिशाप है
ही ,साथ ही आप अपने आस-पास मिलने-जिलने वाले सदस्यों से उनकी समस्याओं को रखकर
समाधान ठूढे .जयशंकर प्रसाद जी का कहना हैं कि ‘नारी की करुणा,अंतर्जगत का उच्चतम विकास
हैं,जिसके बल पर समस्त सदाचार ठहरे हुए हैं.’महिलाओं
के विकास के सम्बन्ध में रश्मि रमानी के शब्दों में-‘विश्व महिला दिवस पर
,महिलाओं की प्रगति के दाबे करने या आंकडें पेश करने के बजे,पुरुषो को जो नारी का
अपना पूरक या प्रक्रति की भाँती समझता हैं,तो उसे सामंजस्य स्थापित कर बहस के बजाय
व तोल पीटने के बजे उसकी स्थिति सुधारनी होगी.सहज अधिकार उसे दया या भीख समझकर नहीं
बल्कि हक समझकर दे और उसके स्वतंत्र अस्तित्व के लिए संघर्ष में साथ
दे.समाजसेवी,प्रसिद्ध मॉडल और भूतपूर्व मिस इंडिया नजीफाअली का कहना हैं कि’सरकार की आलोचना
करने के बजाय राजनीतिक सरकारी तन्त्र में शामिल होकर और कुछ जिम्मेदारियां लेकर हम
ज्यादा अच्छे से लोगो की सहायता कर सकते हैं.
स्त्री मुक्ति की प्रकिया में
छटपटाहट की गूँज ,क्मूवेश,वैश्विक स्त्री की ममतामयी आनुवांशिकी को खो जाने वाली
हैं.उसके उत्तरदायित्व प्रजनन सत्ता,पूंजी एवं फैसले की लड़ाई की ओर ज्यादा खुंदक
पूर्ण बना दिया हैं.डार्विन का सिद्धांत हैं किजो क्षमतावान होगा,वह उभरकर सामने
आयेगा,इस सिद्धांत पर चलकर उसके परम्परागत व्यूह रचना को तोड़कर अपनी सत्ता बनाई और
अपने समुदाय को खदेड़ दिया.कलाकार ने घरेलू स्त्री को ‘आदिम’बताया.साथ ही
विकासशील स्त्री ने अपनी ही जातिको नकारा और यही नकार और वैल्यूज समाज में स्थापित
होकर मापदंड बनकर दोहराए जये और विकासशील स्त्री ने अन्य स्त्री समुदाय को ही
प्रकारांतर से कमजोर और बाद में नष्ट करने में जुट गई.हिट्ल कहते हैं किनारी उस
न्र कुल के समान हैं जो प्रत्यक वायुवेग के पास नत ही जाता हैं,किन्तु विशाल
झंझावत उसे तोड़ नहीं सकते.पुरुष संसार निष्कंटक और निद्व्न्द बना रहा हैं क्योंकि
पुरुष वर्ग का बनाया गया रिकग्निशन कैटगराईजड हैं अर्थात ‘स्त्री,स्त्री के
खिलाफ हो’.विश्व
महिला दिवस पर स्त्री की छाया उपस्थिति,भौतिक उपस्थिति के खिलाफ एक विचारणीय पहल
होनी चाहिए.स्त्री का दैहिक शोषण समाज में समानता और स्वतन्त्रता को नष्ट करने
वाला भयावह कृत्य हैं.स्त्री देवी हैं,उस्क्सा शरीर पवित्र मन्दिर हैं.उसके
प्रांगण को अपवित्र करना नाईंसाफी हैं.गूँजती पीडिता,समवेत चीखें,सिसकने की झड़ी
बरसती हैं.जैसा किसीमा भारद्वाज का कथन हैं कि-‘नारी को अपना वजूद कायम रखकर अपनी एक
अलग पहचान बनानी चाहिए ,उसे अपनी इच्छानुसार ही प्रगति की राह चुननी चाहिए.इससे
उसकी अलग पहचान प्रखर तो होगी ही.उधार या विरासत में मिली ख्याति का ठप्पा भी नहीं
लगेगा.नारी बनावटी जीवन शैली की होड़ से बचे और उन मूल्यों को परिवार में स्थापित
करे जिससे एक स्वस्थ समाज वजूद में आयें और प्रत्येक व्यक्ति को,वर्ग को अपना
अधिकार मिलें.नासिरा शर्मा का कहना हैं कि’बाज़ार
की भूमिका नारी के इर्द-गिर्द घूम रही हैं’.
वह बेसिक पहचान से मुकरकर यथार्थ के दायरे में अपना विकास कर रही हैं.एकल परिवार
ने मानव अधिकार की चेतना को इतना बल दिया हैं किऔरत एक व्यक्तिवादी विचारधारा का
समर्थन करने पर मजबूर हो गई हैं.शिक्षित वर्ग को अपने ज्ञान की गठरी को तिजोरी में
न रखकर अर्जित ज्ञान को व्यवहारिकता में लायें न कि उस पर गुमान कर नीचा
दिखाए.ज्ञान और कर्म की विसंगति का एक प्रकार का एक प्रकार का अन्तर्द्वन्द
उत्पन्न करता हैं.इसलिए ज्ञान को कर्म में बदलकर सम्मानीय बनाये.केवल साक्षर बनकर
ही कार्य की इतिश्री नहीं की जा सकती बल्कि उनके अंदर के अन्धकार और अज्ञानता को
दूर करना होगा.
पूरी दुनियां की स्त्री अपने को
इस्तेमाल किये जाने की इजाजत देती हैं,जो कि एक जघन्य सच हैं.यह उसकी आधुनिक
सह्म्तिया,उसकी महत्वाकांक्षाओं की पैदाईश हैं. परन्तु उसकी इन अपेक्षाओं में किसी
विचार का विस्तार नहीं हुआ हैं,बल्कि उसका आएना वही पारम्परिक हैं जिसके नेपथ्य
पुरुष ही हैं.आज भी दुनियां भर में पुरुषों के हाथ की कठपुतलियाँ हैं फिर चाहे वो ‘मानव बम’धनु हो या वीरू
जिनके जधन्य अपराध में उनके ही चीथड़े उड़े अर्थात स्त्रियों का हर क्षेत्र में
दुरूपयोग हैं.ऐसा क्यों?शोषित स्त्री का एस तरह इस्तेमाल किया जाना एक नया मानवीय
और खौफनाक रूप सामने आया हैं जिसे स्त्री जानते हुए भी मानती नहीं.फैशन परेडो में
सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में गठरी भर-भर नोट कमाने वाली प्रतिष्ठित स्त्री वर्ग को
सोचना होगा अपने आप में प्रश्न पूछकर जबाब ठूठनेहोगे और जबावो को तलाशना होगा
जिसमे पुरुष समाज,बाज़ार और मानसिकता ने स्त्री को आधुनिकता के नाम पर क्या बना रखा
हैं?ऐसे प्रश्नों का जबाव तलाशने होगें.क्या स्त्री एक कदम भी आगे बड़ी हैं या चार
कदम पीछे चली गयी हैं?समझदारी की एक किरन पहुचानी होगी.
औरतों की अधिकतर हार का कारण उनका तर्कपूर्ण
लड़ाईयों के स्थान पर भावुकता और दूसरों की सहायता के बीच न्याय पाने के लिए स्त्री
अधिकारों का उपयोग करना सीखेब.कानून से बड़करकोई सहयोग नहीं.कानून ही आपको सुरक्षा
,सही विचार ,सीधा रास्ता दिखा सकता हैं.कानून चाहे सम्विधान की धाराओं के रूप में
हो या धार्मिक नियम या राष्ट्र के अपने अनुशासन की शक्ल में हो,प्रत्येक नागरिक के
जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं.मणिमाला के नजरिये में सह्स्त्रब्दी के
चमत्कार आविष्कार ने स्त्री जाति की जिन्दगी पर सीधा असर कर विज्ञान की नई स्त्री की
रचना कर डाली.नतीजन औरत की कोख पर स्वयम का नियन्त्रण न होकर बल्कि औरत का शरीर एक
प्रयोगशाला बनकर रह गया.इस तकनीकि ने पुरुषों की बांझपन की कमी पर पर्दा दाल कर
पति के पितृत्व की भूख का सम्मान करे हालांकि हजारों महिलाओं को बांझपन के अभिशाप
से मुक्त किया.पारम्परिक मान्यताएँ टूटकर पुरुषों को पौरुषत्व पर प्रभाव डाला और
बेटा और बेटी की पैदाईश के लिए औरतों को जिम्मेदार मानने व दंड और ईनाम देने की
मानसिकता प्रभावित हुई.समाज का महिला वर्ग जो न सिर्फ अपने अस्तित्व में पुरुष के
समक्ष हैं बल्कि अपने आप में परिपूर्ण और सोच व अनुभव का जीवंत ससार भी हैं.उसी
महत्वपूर्ण वर्ग को कभी उत्पीडन से मुक्ति नहीं मिली.समाज का तर्कशास्त्र कहना हैं
कि’एक स्त्री
गलत हैं और एक पुरुष सही हैं.’ऐसा
इसलिए क्योंकि स्त्री स्वयम पुरुष की गलत बात मानती हैं और कभी प्रतिकार भी न करने
का कारण-‘उसके
कदमों तले कोई सुद्र्ड आधार नहीं.रश्मि रूमानी ने सही ही कहा हैं कि-‘औरतों की आजादी का
मुहावरा एक शगल बनाता जे रहा हैं और उसके अधिकार और समानता की बातें फैशनेवल
सब्जेक्ट.’एक
चीनी कहावत में कहा गया हैं कि-पुरुष सोचता हैं किवह जानता हैं,पर स्त्री कही उससे
अधिक जानती हैं.’स्त्रियों
के साथ हो रही अभद्रता,शोषण ,यातनाओं ने नारी मुक्ति समानता ,अधिकार आदि शब्द झूठे
पड़ गये और नारी प्रगति व श्रेष्ठता के सारे दावे खोखले.महिलायें कोख से लेकर
कार्यालय तक कही भी सुरक्षित नहीं हैं.धनाड्य परिवार की महिलाएं भी इसकी शिकार
हैं.दहेज़ को जोड़ने वाली ,शादी की शोपिंग करने वाली नारी ही इसकी शिकार होती हैं.इन
सब बातों ने यह सिद्ध कर दिया हैं कि ध्रतराष्ट्र मरा नहीं बल्कि उसके नये संक्रमण
जन्म ले चुके हैं.क्यिकी आम आदमी ,डरपोक नेता,व्यस्त विचारक गुमसुम और कानून
विसंगतियों के गर्त में बिलबिला रहा हैं.पुरुषत्व की संकीर्ण मानसिकता के विषय में
म्रदूला सिन्हा लेखिका महिला चेतना का समर्थन करते हुए कहती हैं कि-आज एक सदी में
नारी ने स्वयम को बदला हैं,जिसमें पुरुषों ने उसका साथ नहीं दिया वह आप भी ६०-७० वर्षो पहले वाली मानसिकता
में जी रहा हैं.महिला व्यक्तित्व विकास को लेकर पुरुष का प्रतिद्वन्दी घोषित किया
जाने लगा हैं.आज महिला व्यक्तित्व को पुरुष अपना प्रतिद्वन्दी मानने लगा हैं.इसलिए
अगली सदी में नारी मुक्ति के रास्तों को यथार्थ कर्मशीलता,मात्रत्व
,नैतिकता,योगदान को एक सही दिशा देने और उनका सम्मान करने की जरूरत हैं.शारीरिक
अक्षमताओं के चलते दोयम दर्जे का घोषित करना व समाज की धुरी ,समाज में पुरुष के
इर्द-गिर्द घूमना इसमें बदलाव आया हैं.महिलाओं ने समझ लिया हैं कि’गुलामी उसकी नियति
नहीं हैं.२१वी सदी की इवार्ट लिखने वाली नारी ही हैं.महिला विकास के सम्बन्ध में
कहा हैं किवीमेन बिहाइंड द मेन ‘में
कविता नागपाल प्रसिद्ध अभिनेत्री के शब्दों में-‘विवाह को बंधन नहीं बल्कि इसका एक नया
रूप माने एक दूसरे का सम्मान देते हुए ,अपने तरह से जीने की इजाजत दे.’स्त्री पुरुष
असमानता के विषय में संस्क्रत कर्मी और शिक्षा कर्मी आशा कोटिया का कहना हैं किएक
सन्गठन से जुडकर कुछ एक कार्यक्रम कर लेने से ही उत्तरदायित्व पूर्ण नहीं हो
जाता.महिला उत्थान व पतन के लिए मामले में भेदभाव करना औचित्व नहीं क्योंकि
लेखक,लेखक ही होता हैं.उसे लेखक और लेखिकाओं के अलग-अलग मंचों और वर्गों में बांटा
ही गलत हैं.
जारी हैं..............