“निज भाषा उन्नति अहे,सब उन्नति को मूल|
बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटत न हिये को सूल||”
हमारी सामजिक –राजनीतिक शक्ति का आधार ,जन-जन की भाषा
हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी हैं,जो सामाजिक कार्यो की मध्य्स्थ होने के कारण
क्षेत्रीयता और भौगोलिक बंधनों से परे हैं.भाषा जीवन की संजीवनी होने के कारण
भाव-विचार व्यक्त करने का प्रक्रति प्रदत माध्यम हैं.हिंदी ऐतिहासिक प्रक्रिया
हैं,उसका अपना अखिल भारतीय रूप हैं.हिंदी भाषी क्षेत्र काफी विस्तृत हैं.स्वयम
अर्जित किया हुआ इसका रूप हैं १४ सितम्बर ,१९४९ के दिन हमें अपनी अभिव्यक्ति को
हिंदी भाषा में करने की इजाजत मिली थी.भारतीय संघ की राज भाषा के रूप में संविधान
में मान्यता मिली.और १जनवरी ,१९६५ से हिंदी मुख्य राज भाषा के रूप में विधिवत
मान्यता मिली.हिंदी में शक्ति हैं,सामर्थ्य हैं,असर हैं.इसकी अपनी कई विशेषताएं
हैं-
१-हिंदी भाषा हैं लिपि नहीं –
हिंदी को देवनागरी में लिखा जाता हैं.यह
देवनारी लिपि हैं,न कि भाषा.जबकि हिंदी भाषा हैं,लिपि नहीं. किसी भी ग्रन्थ की
रचना की जाती हैं,उसका निर्माण नहीं होता.जिस तरह भवन बनाने के लिए रचना नहीं की
जाती बल्कि निर्माण किया जाता हैं.किसी भी विषय का सम्पादन नहीं होता,बल्कि
प्रतिपादन होता हैं.
२-नये शब्द गड़ने की शक्ति –
हिंदी के पास नये शब्द गड़ने के लिए
संस्क्रत की शक्ति होती हैं,जिससे प्रत्येक विषय के शब्द बनाये जा सकते हैं.इस
संबंध में डॉक्टर श्री कान्त जिचकर ने कहा था कि संस्क्रत में २००० धातुएं
हैं,जिनसे बनने वाले शब्दों की संख्या डेढ़ करोड़ तक हो जाती हैं,जबकि अंग्रेजी की संपदा
मात्र डेढ़ लालह ही हैं.
३-सहस्त्र वर्ष पुराना इतिहास-
हिंदी का इतिहास हजारों साल पुराना
हैं.यह संसार की सर्वश्रेष्ठ,सुनिश्चित व स्पष्ट व्याकरण वाली अपवाद विहीन भाषा
हैं.आधुनिक हिंदी का इतिहास ढेढ़ सौ वर्षों से अधिक पुराना हैं.
४-हिंदी से भावात्मक रिश्ता-
संविधान बनने पर हिंदी के साथ एक
भावात्मक रिश्ता था.जिसके कारण इसको संविधान में इसे राजकीय भाषा का दर्जा दिया
गया.समय बीतता गया और इसके साथ रंग भेद का रिश्ता जुड़ता गया जिससे हिंदी की तरफ से
मुंह मोड़ लिया गया.राजनीति ने हवा –पानी
देकर विडंबना इसकी कर दी.राष्ट्र भाषा हिंदी बनाये जाने पर एक राष्ट्र,एक भाषा का
नारा दिया गया.
हिंदी हमारी मिटटी से उपजी भाषा
हैं,उसकी अपनी जीवात्मा विद्यमान हैं.यह उदारता भाव के कारण ही इसमें शब्द भंडार
छिपा हुआ हैं.वास्तविक रूप से सम्मानीय दर्जा मिलना चाहये ,जिससे वह सभी के दलों
पर राज कर सके.हिंदी की लहर चंहु ओर अपनी सरसता प्रदान करती जा रही हैं.हमारे देश
में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी हिंदी का अलख जग चूका हैं.अंग्रेजो की
गुलामी से मिक्ति के पश्चात भारतीय संध की राजभाषा के रूप में संविधान में हिंदी
को मान्यता मिली .हिंदी का अखिल भारतीय रूप काफी बड़ा और स्वयम अर्जित किया हुआ
हैं.
हिंदी में शक्ति हैं,आकर्षण
हैं,प्रभाव हैं,असर हैं,अगर कमी हैं तो हिंदी देशवासियों में अपनी भाषा के प्रति
विशवास और अपने प्रति आत्मविश्वास की.लेकिन खेद की बात हैं की इतने लम्बें अरसे
बाद भी यह अपना वो मुकाम हासिल नहीं कर पाई.इसके प्रचार में सबसे अवरुद्ध कारक
अंग्रेजी भाषा का दबदबा.अंग्रेज चले गये लेकिन अपनी गुलामी की दासतान छोड़ गये.इसके
अलावा एक अन्य कारक आधुनिकता की दौड़ में भागता मानव,जिसके कारण मानव अपने बच्चों
में हिंदी बोलने.लिखने के प्रति प्रेरित तो कर ही नहीं पा रहा,बल्कि हिंदी के
प्रति सम्मान की भावना भी दर्शा नहीं पते.जबकि वर्तमान में स्थिति यह हैं की हिंदी
विश्व में अपने पंख फैलाकर पल्लवित हो रही हैं.इसका साक्षात उदाहरण प्रसिद्ध
साहित्यकार शेक्सपियर के घर में स्थित संग्राहलय में देवनागरी लिपि में लिखा हैं-‘यह शेक्सपियर का घर
हैं.’इससे
प्रदर्शित होती हिंदी के प्रति अंग्रेजों की अगाध श्र्दधा भाव.इसके अलावा अंक और
बहुत ही महत्वपूर्ण कारक हिंदी की राष्ट्र भाषा या राज भाषा की दव्द्न्द स्थिति.साथ
ही हिंदी को भारत में ज्ञान-विज्ञानं की भाषा न मानकर कहानी और कविता की भाषा माना
गया.
प्रतिवर्ष हम हिंदी दिवस मनाने की
पूर्ति हिंदी पखवाड़े तक ही ,’हिंदी
हमारी राष्ट्र भाषा हैं’आदि
नारों के साथ करके इति श्री कर लेते हैं.वास्तव में हमने अन्ग्रेही के दबे तले
हिंदी की कितनी जर्जर ,दयनीय,उपेक्षित,वैचारगी स्थिति कर दी हैं जो सोचनीय हैं.हमे
एस बात की टिल भर भी जलानी नहीं होती की हमने हिंदी भाषी क्षेत्रों में ही हिंदी
की,हिंदी कर दी हैं.राजनीतिक नारों ने हिंदी को एक राष्ट्र,एक भाषा दिए जाने से ओर
विडम्वना कर दी हैं.
मनुष्य का सर्वप्रथम अपने मुखाग्र
से निकला पहला शब्द ही उसकी जननी भाषा बन जाती हैं.हिंदी भाषा को विश्वस्तरीय
दर्जा दिलाने के लिए हमे इसके प्रचार-प्रसार में आने वाली बाधाओं का आत्मचिंतन कर
अवरोधों का निराकरण करने के लिए प्रयत्नरत रहना चाहिए.साथ ही निम्न प्रयास भी करना
चाहिए-
१-हिंदी के प्रति चेतना जाग्रत करना.
२-देशवासियों के प्रति हिंदी के प्रति
विशवास जगाना.
३-विना किसी सीमित रेखा के इसके हिमायती
होकर पक्षधर बनना.
४-हिन्दिनके प्रति समर्पण की भावना.
५-वित्तीय व्यवस्था में लेखा-जोखा हिंदी भाषा की
अनिवार्यता.
६-पाठशालाओं में हिंदी भाषा को विशेष दर्जा
देना.
७-हिंदी राजकीय भाषा को व्यवहारिकता में
लाना.
८-अधिकारियों का राजस्व कार्य में सही
तरीके से निर्वहन करना.
९-प्रचार-प्रसार कर जनचेतना में सांस्कृतिक
आन्दोलन बडाना.
१०-हिंदी भाषा में प्रांतीय,देशीय भाषाओं
को भी शामिल करना.
जननीभाषा का सर्वोपरी स्थान होने के
कारण वह आदरनीय और प्रिय हैं.प्रत्येक व्यक्ति को अपने दासत्व से छुटकारा पाने के
लिए अपनी भाषा का धनी होना चाहिए.सामाजिक भाषा के लिए उन्नति के लिए जननी भाषा का
जानकार होना उतना ही जरूरी हैं जितना किजीवन अस्तित्व के लिए जीवात्मा का.हमारी
राज भाषा या राष्ट्र भाषा की उत्पति पश्चमी हिंदी हैं जिसमे खड़ी बोली की प्रधानता
हैं और मेरठ की खड़ी बोली का आदर्श और मानक रूप हैं. भाषा में विभिन्न बोलियों का
मिशन होना स्वाभाविक हैं.साहित्य की विभिन्न विधाओं के लेखन कार्य को प्रभावशाली
बनाने के लिए हम अन्य भाषिक शब्दाबली का प्रयिग करते हैं और धीरे-धीरे वह हमारे
शब्द कोष सम्मलित होकर हमारी बिल्चाल का हिस्सा बन जाते हैं.अपनी स्वर प्रक्रिया
को प्रभावशाली वाक्य रचना को रोचक बनाने के लिए शब्द कोष में व्रद्धि होती हैं
,जिसका प्रभव सीधा हिंदी भाषा पर द्रष्टिगोचर होता हैं.हिंदी के समन्वयी गुणों के
कारण अन्य भाषिक शब्द अपना स्थान आसानी से बना लेते हैं.हिंदी अत्यधिक समर्द्ध
,जीवित भाषा होने के कारण सहजता से शब्द कोष में वृद्धि होती रहती हैं और भाषा को
विलक्षणता प्रदान होती हैं.
देशान्तरं और क्षेत्रान्तरणके कारण
अपनी बात से दुसरो को अवगत कराने और दूसरो की बात से अवगत होने के लिए भाषा जानना
जरूरी हैं.हम किसी भी भाषा में पारंगत नहीं होते बल्कि दूसरी भाषा का शब्द ज्ञान
रूपी ‘शब्दों
का ब्रिज’एक
दूसरे की बात समझाने में वफर स्टेट का कार्य करता हैं.सम्प्रेष्ण ,भव सम्प्रेष्ण
का भाव भाषा हैं.अन्य भाषिक शब्दों का प्रयोग करने का कारण यह नहीं किहम अपनी भाषा
से प्रे हो रहे हैं,बल्कि हम अपने वैचारिक आदान-प्रदान स्व उन तमाम लोगों तक अन्य
भाषिक शब्दों को पहुचने का माध्यम बन जाते हैं.सामाजिक रिश्तों में प्रगाड़ता आती
हैं,सम्मानीय भावना उत्पन्न होती हैं.विभिन्न भाषाओं के शब्दों का समन्वयता से
हमारे देश की अखंडता,द्रद्ता प्रगाड़ता को अटूट रिश्तों में सुद्रड़ता प्रदान करती
हैं.संविधान में भी कहा गया हैं कि ‘जिस
दिन यह विकसित और सक्षम हो जायेगी ,उस दिन इस राष्ट्र की भाषा बन जायेगी.’
हमें राष्ट्र की एकता और अखंडता के
लिए समस्त राष्ट्र बन्धुओं को अंक माला में पिरोने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग
करना चाहिए.जैसा की महात्मा गाँधी जी ने कहा है कि’राष्ट्र भाषा के बिना देश गूंगा हैं.’क्योंकि हिंदी में
इतनी समरसता ,मिठास,लरजता,आत्मीयता का भाव हैं किइसे जल्दी ही अपना लिया जाता हैं
. ‘हिंदी का
भविष्य ऊज्ज्वल,वर्तमान संतोषजनक और स्वर्णिम अतीत महान हैं.’