'पंख फैला, आसमान को लांघने को बेताब '
उनींदी सी सुबह, सूखे पत्ते सा जर्जर तरु,
रात ढली, सुबह का करे स्वागत!
विशाल गगन तले, शाखा पर बैठा परिन्दा युगल,
अम्बर झूमे, धरती नाचे, सरगम गाती हवाऐ,
ऑंखों मे सपने सजाए, गान करे पंछी,
घनी बदरिया चिंताओ की छट गई,
मन से पतझर, मन से खिलता पलाश,
मेघो से पार आता संदेश ,
आओ, उड़ चले नीलामवर मे,
पंख फैलाए ,आसमान को
लांघने को बेताब! !!!!