नारी महिमा ........................... महिलाओं का
शिक्षित होना तभी सार्थक होगा जब वह अपने आस-पास के माहौल में शिक्षा प्रसार करे|इस सम्बन्ध में
प्रसिद्ध शिक्षाविद मैत्रियी पद्माभं का कहना हैं कि’हमारी परिस्थिति और
पाश्चत्य में काफी अंतर होने का कारण एक या शहर की ,केवल ग्रहस्थिति ही न संभाले ,बल्कि
अपने आस-पस की गली मोंह्ल्लेकी अशिक्षित महिलाओं को शिक्षित करे|ऐसा करने से ही पड़ाई
सार्थक होगी|प्रतिवर्ष
महिला दिवस मनाने की सार्थकता तभी सिद्ध होगी ,जब हम अशिक्षित व देहात स जुडी
महिलाओं में अत्याचारों का विरोध करने व स्वयम निर्णय लेने के लिए जागरूक बनाई
जिससे वो अपने उद्धेसयों के प्रति दृढ संकल्पित होकर अपनी काबलियत सिद्ध कर सके,ऐसा समाजसेविका
डॉक्टर श्रीमती सविता ईमानदार का वक्तव्य हैं|इसके
अलावा अपनी संभावनाओं को नहीं पहचानती उनकी स्थिति में बदलाब आना मुमकिन नहीं हैं|लेकिन कुछ भी हो
,कैसे भी हो हमे हमारी लड़ाई लडनी ही होगी|प्रख्यात
कवियत्री अनामिका जी ने लिखा हैं कि समकालीन कविता का स्वभाव इसलिए स्त्री से
मिलता हैं क्योंकि वह स्वभाव से ही अन्तर्मुखी कम बोलती हैं और जो बोलती हैं
,इशारों से,उसके संकेत लोगो के डीकोड नहीं होते हैं|नये पुरुष को नई स्त्री के योग्य बनना
पड़ता हैं|इसीलिए
लोगो को भी स्त्री स्वभाव का कर्म समझने के लिए समकालीन कविता की तरह यूग्यता
विकसित करनी होगी ,इससे उसे वह सब मिलेगा जो पहले किसी को किसी से नहीं मिला ही
नहीं-एक अनुप्म्प आन्तरिकता,स्वयम में पूर्ण रहकर चारों ओर पूर्णता विकीर्ण करने
का शौअर और एक मग्न पारस्परिकता जो सार्थक जीवन की शर्त हैं|कवि श्याम सखा की
पुस्तक ‘औरत
को समझना हैं’में उन्होंने मार्मिकता से स्त्री मन के अंतर
द्वीपों में विचरण करते हैं|’नारी
एक कविता हैं,उसे भला कब किसने लिखा और
होना नारी? और नारी होना ,क्या हैंसिर्फ एक गारी|अपनी कविता के माध्यम से उन पुरुषो का
आईना भी दिखाती हैं,जो अपने पौरुष के दम्भ में स्त्री को इन्सान नहीं केवल मादा
देह के रूप में जानते और मानते हैं|
प्रयास और
प्रभाव –
मार्टिन लूथर ने कहा हैं कि’हमारे जीवन का अंत
उस दिन से शुरू हो जाता हैं,जिस दिन हम उन विषयों पर चुप रहना सीख लेते है या शुरू
कर देते हैं,जो हमारे जीवन में मायने रखते हैं क्योंकि जब हम अपनी आवाज को शांत कर
लेते हैं तो हम शोषण का शिकार होने लगते हैं लेकिन जब आवाज उठाते हैं तो हम इस दुनियां
को बदल सकते हैं|’महिलाओं
ने लीक से हटकर पहचान बनाई,जो दूसरों के लिए प्रेरणा बनी,इन पर अभिमान होना चाहिए|सकारात्मक नजरिये से
बनाईअपनी अलग पहचान|आज
की नारी इन महिलाओं की कहानी में,जिनकी सूरत में अपना अस्तित्व ठूढ रही हैं|ये
उनकी हौसले की ताकत बनी|जीतती
गई कभी संघर्ष से हारी नहीं|आज
वे जिस मुकाम पर पहुँच गयी हैं जो काबिले तारीफ़ हैं|इन्होने विपरीत हालातों में रहकर अपना
एक मकसद बनाया किकाम करना ही जीवन हैं|मुश्किल
से मुश्किल हालातों में काम किया |ये
महिलाये टूटी नहीं सबके लिए प्रेरणा बनी|
महिलाओं की सबसे बड़ी मुश्किल हैं किवह जल्दी
ही उत्साहित हो जाती हैं|जैसा
किअरस्तु ने कहा हैं किअगर महिलाये नहीं होती तो दुनियां में मौजूद अरबों-खरबों
रूपये का कोई मतलब नहीं होता|दुनियां
में ऐसी कई कामयाब महिलाये हुई जिनके नाम जाने-मने हैं,ऐसी ही कुछ फीमेल लीडर्स
हैं जिन्होंने दुनिया में बदलाव की बयार में अपना नाम इतिहास के पन्नों पर लिख
लिया|आतंक
के साए से निकलकर आज कश्मीरी युवा महिलाओं ने न सिर्फ अपने इलाके में ही महिला
सश्क्तिकरण का अलख जगाया बल्कि पूरे देश में मिशाल बनकर उभरी|इन महिलाओं ने
अलगाववाद और आतंकी गतिविधियों के बीच में अमन और चैन का पाठ पडाया|रूडिवादी सोच को
मिटने के लिए किसी ने व्यवसाय में नाम कमाया तो किसी ने नजरिया बदलने के लिए
शिक्षा का अलख जलाया|ये
घाटी में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रही हैं|अपनी बात खुलकर सामने रख रही हैं|पिताकी जांबाज और
जुझारू बेटी नेवी अफसर बनना हो या झुग्गी झोपडी में पली-बड़ी वर्ल्ड फेमस
फोटोग्राफर बनी हो|इन्होने
महिलाओं से जुड़े सोशल फोबिया से निजात दिलाने की चुनौती स्वीकार की|सरपंच बनी हो या
डेंटिस्ट या व्यवसाय में महारत हासिल की हो शुरुआत में इनके जीवन में संघर्ष अवश्य
रहा लेकिन सफलता इनका मुकाम हैं|इनके
हिम्मत और हौसलों की नई मर्मस्पर्शी कहानियां हैं,जो इतिहास के पन्नों पर लिखी
जायेगी|
जैसा कि मोहम्मद अली जिन्ना
ने कहा था कि ‘दुनियां
में दो चीजें ही सबसे ज्यादा शक्तिशाली हैं यक कलम और दूसरी तलवार|इन दोनों की बिच
प्रतियोगिता और दुश्मनी लगातार चलती रहती हैं|लेकिन
एक तीसरी शक्ति हैं जो इन दोनो से ज्यादा शक्तिशाली हैं ,वह हैं महिलाओं की शक्ति|’ऐसी ही शक्ति
महिलाओं ने वैज्ञानिक बनकर नेवी,ऑफिसर बनकर,दिखलाई हैं|मार्श मिशन से लेकर
१०४ सैटेलाईट की लौन्चिंग तक सभी प्रोजेक्ट को लेकर वर्ल्ड के इसरो चर्चा का
सब्जेक्ट बना हुआ हैं|और
उतनी ही चर्चा का विषय स्पेस में ठाक जमा रही महिलाओं का हैं,जिन्होंने ईस्मो अपनी
भूमिका निभाई|साईंटिस्ट
बनने की प्रेरणा का स्त्रोत इन महिलाओं के लिए भले ही विभिन्न रहा हो लेकिन मकसद
सभी का एक ही था|अपने
सपनों का आसमान छूने के लिए घर की चहारदीवारी से बहार निकली तथा जिन्हें पुरुष की
मिल्कियत समझा जाता था|उन्होंने
अपनी भूमिका निर्वाह कर उन मान्यताओं को खारिज कर दिया जिसे सिर्फ पुरुषों का ही
एकाधिकार समझा जाता था|जैसा
मेरी वून स्टेनो क्राफ्ट के शब्दों में-‘महिलाओं
के पास सिर्फ पुरुषों को नहीं ,खुद पर भी काबू होने का हौसला भी होना चाहिए|’एक्सपर्ट अधिवक्ता
सुधांशु एस|पांडे
ने कहा हैं कि’अगर
महिलाये कमजोर होती तो १५ साल कैसे नौकरी करती|’वह
पुरुषों की तरह जान्वाजी से हर टास्क पूरा करती हैं|लेकिन अभी तक महिलाओं को स्थायी कमीशन
नहीं मिला|पुरुष
प्रधान सोच को बदलना होगा जिससे महिलाओं को बराबरी का हक मिल सके|मानवीयता के आधार पर
सम्बेद्नशील होकर हमें उन्हें हर रोले देकर बराबरी का हक दिलाने की जरूरत हैं| ‘स्त्री स्वतंत्र
व्यक्तित्व हैं,सबको मानना ही होगा|’
महात्मा गांधीजी ने कहा हैं
कि ‘महिलाएं
आश्चर्य जनक हैं |ऐसे
बर्ताव करती हैं मानों सबकुछ अच्छा हैं|’
जब दुनियां उनके कंधों पर हो और जीवन उँगलियों की कोर से फिसल रहा हो|महिलाओं के आगे बदने
की यात्रा में कई रुकावटें हैं,उनका सबसे बड़ा रोग हैं किलोग क्या कहेगे?क्रिस्चियन
ड़ोर कहते हैं किभगवान ने दो सबसे ज्यादा खुबसूरत चींजे बनाई हैं-‘पहली महिलाएं और
दुसरे फूल’|घर,परिवार,समाज,देश
में महिलाओं का अतिमह्त्वपूर्ण योगदान रहा हैं और रहेगा|बुधायना कोमल कहते
हैं कि ‘क्रान्ति
में महिलाएं हमेशा सबसे आगे रही हैं’|महिलाये
आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं|कामकाज
के साथ-साथ घरों में भी ८४%महिलाएं खुद से जुड़े फैसले ले रही हैं,लेकिन ५%ही अपने
पति पसंद के चुन पाती हैं|मार्लिन
मुनरों के शब्दों में-‘समझदार
महिला चीजों को पसंद करती हैं,उनसे प्यार नहीं|हर
बात सुनती हैं,पर उन पर विशवास नहीं|इससे
पहले कोई उसे छोड़े वे खुद ही लोगों से अलग
हो जाती हैं|’
इतिहास भी हर जगह आनुवांशिक
परम्पराओं की गाथा हैं, मातृवंश की नहीं|पिता
के बारे में सभी जानते हैं किवे क्या थे?लेकिन हमारी मांओं,दादियों
,नानियों,पत्नियों,बहिनों की उपलब्धियां कहाँ गम हो गई ,उन्हें इतिहास के पन्नों
पर क्यों नहीं उकेरा गया?अगर जानकारियाँ उपलब्ध हैं तो बीएस इतनी सी कि कितने
बच्चें हैं?उनके नाम क्या हैं?बीएस और कुछ नहीं |किसी ने कहा हैं कि’ईश्वर के बराबर ही
हम नारी के ऋणी हैं|पहले
तो स्वयम अपने जीवन के लिए|दूसरे
हम इस जीवन को जीने योग्य बनाने के लिए|’
नारी की सबसे बड़ी बात होती
हैं -घर संसार को बसाना,बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करना,शिक्षित करने के साथ ही
संस्कारवान बनाना|स्त्री
बच्चो के लिए प्रेरणा स्रोत होती हैं,वह बच्चों के आने वाले कल को श्रेष्ठ बनाती
हैं|ये
काम पुरुष का होता हैंलेकिन निभाती स्त्री ही हैं|पुरुष तो अपने सुख और प्रधान बनने के
प्रयास में कही भटक जाता हैं|स्त्री
का सारा जीवन परिवार को संवारने में,बच्चों के लिए समर्पित हो जाता हैं|वह यह सोच-समझकर
नहीं करती बल्कि नैसर्गिक रूप से सब कुछ सहजता से होता चला जाता हैं,क्योंकि वह
समझती हैं किबड़ों को तो अच्छे-भले बुरे की समझ हैं|महिलाओं पर हो रहे अत्याचार शोषण का वह
मुकाबला क्या करे,उफ़ तक नहीं करती|चुपचाप
रहती हैं,सोचती हैं किशायद पुरुष कमजोर हैं इसलिए पाप को सर ऊपर से गुजरने दे रहा
हैं|इसके
लिए प्रत्येक पुरुष दोषी नहीं हैं,पर प्रत्येक पुरुष कमजोर हैं,लेकिन पापी केवल
पाप करने वाला ही हैं|स्त्री
तो केवल अपने लिए आत्म सम्मान तो चाहती ही हैं जब हम एक ही कोख से उत्पन्न हुए हैं
तो यह दुर्व्यवहार असमानता क्यों?जब समानता का दर्जा मिल जाएगा तो उसके अंदर की
असुरक्षा की भावना स्वत ही समाप्त हो जायेगी|क्योकि
असमानता मिलना ही सबसे बड़ा अन्याय हैं,जिसका पुरुष वर्ग का फायदा उठा कर मजबूर कर
देता हैं और वह अपने विरुद्ध हो रहे अन्याय पर एक शब्द का भी इजहार नहीं कर पाती
हैं|लेकिन
इस अत्याचार में केवल पुरुष वर्ग ही नहीं बल्कि कुछ प्रतिशत महिला वर्ग का भी हैं
जो स्त्री होकर भी समजात को नहीं समझती हैं,बल्कि अन्याय होने में साथ देती हैं|वर्तमान में बदलाव
आया हैं लेकिन शिक्षित होना केवल कारगार उपाय नहीं हैं बल्कि यह एक उसके
विकासोत्पाद्क में एक कदम हैं|लेकिन
सर्वप्रथम समानता के साथ स्वतन्त्रता मिले तब निश्चित रूप से शिक्षित होना
उद्धेश्य परक होगा|महिलाएं
शिक्षित हो रही हैं लेकिन उसे निर्णय लेने के अधिकार की स्वतन्त्रता चंद महिलाओं
को ही हैं|उच्च
शिक्षित महिलाये जैसे-जज ,टीचर,वकील ,डॉक्टर आदि दुसरे के फैसले सुनती जरूर हैं
लेकिन स्वयं के निर्णय नहीं ले पाती|इसके
लिए दोषी सामाजिक वातावरण हैं जिसमें उनके रग-रग में रीति रिवाजों को भर दिया हैं|इनके विरुद्ध
निष्पक्षता ,बैखोफ होकर निर्णय नहीं ले पति|जागरूकता
आई जरुर हैं ,बंदिशों को तोडा जरूर हैं|हाँ
वक्त लगेगा लेकिन बदलाव आयगा जब कोई महिला दिवस या आन्दोलन की जरूरत ही न पड़ेगी|महिला शिक्षित हुई
हैं जिससे उसकी योग्यता,क्षमता व दक्षता में इजाफा हुआ,आत्मशक्ति बड़ी,लेकिन
वातावरण बदलने में अभी समय लगेगा|वातावरण
में केवल पुरुष को ही नहीं,स्त्री को भी बदलना होगा,स्वयम को एस योग्य बनना होगा
की वह दूसरे के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने स्वामी विवेकानन्द जी ने बड़ी ही सरलता से
बताया हैं किसबसे पहले हम मनुष्य हैं न कि स्त्री-पुरुष|फिर ये असमानता
क्यों?हमें समझना चाहिये कि हम एक दूसरे के लिए बने हैं|ईश्वर ने कुछ
शारीरिक बनावट के कारण स्त्रियों को कमजोर कर दिया जरुर हैं,लेकिन वह किसी से कम
नहीं हैं|वह
पुरुषों पर भी भारी हैं|पुरुष
शारीरिक बल से बलवान हैं|यह
सही हैंलेकिन भतरी हिम्मत के मुकाबले में महिला से पीछे हैं|हिम्मत,आत्मबल की
बात की जाये तो स्त्री पुरुष से आगे हैं|हर
पुरुष की कामयाबी के पीछे स्त्री का हाथ होता हैं|स्त्री के बिना पुरुष से बलवान बनाती
हैं|वह
ईश्वरीय मन्दिर के समान पवित्र हैं,न्याय संगत व्यवहार करती हैं|वह निःस्वार्थ भाव में
सेवाश्रु करती हैं|उसके
कपट का दूर-दूर तक नाम भी नहीं होता|निश्चल
भाव से व्यवहार करती हैं|त्यागमयी
मूर्ति हैं |जब
स्त्री अपने आत्मबल को जगा देती,तो उसके सामने पुरुश्ब्ल भी फीका पड़ जाता हैं|वह हर संकट का
शौर्यता के साथ कठिन से कठिन परिस्थितियों में सिंहनी सी दती रहती हैं|लेकिन शारीरिकता उसे
कमजोर बना देती हैं,शारीरिक दमन होता हैं,दैहिक बल से शोषण होता हैं,वाही उसे विवश
कर देती हैं|कोमलता
उसकी प्रवृति हैं लेकिन उसका गलत फायदा उठाकर शोषण किया जाता हैं|लेकिन उसकी सौन्दर्यता,कोमलता,संस्क्रती
उसे तेजस्वी बनाते हैं|वह
अपने कोमल मधुर स्वभाव से व परम्परागत जीवन शैली से सभी को आकर्षक करती हैं|नारी की सबसे बड़ी
ताकत उसकी प्रेंभाव्ना हैं,यानि किमानवीय गुड प्रेम,प्यार,स्नेह ,जो उसके रग-रग
में भरा हुआ हैं|वह
त्यागमयी प्रेम की धारा से सरावोर हैं|वह
उसकी भावना हमेशा प्रेमसिक्त धारा में सबको जोड़ना होता हैं|प्रेम की ऐसी गाँठ
से बाँध देती हैं कि उसको छोड़ना नामुमकिन हो जाता हैं|महिलाओं के सर्वगुण
सम्पनता उसे उच्च सिंहासन पर बैठा देती हैं,लेकिन उसके इस संघर्षमय जीवन के कर्मो
का फल पुरुष वर्ग के अहमवादी सोच में गूम हो जाता हैं|उनकी कठमुल्लावादी
सोच की रौशनी में छिप जाता हैं|उसकी
सबसे बड़ी कमजोरी हैं वो धार्मिक रीतियों में ऐसी बंधी हुई हेंजिन्हे वह चाहकर भी
कभी न छोड़ेगी|धार्मिक
रीति यानि किकर्तव्यपरायणता ,परोपकार आस्था|महिलाओं
को समानता मिलना आज की तारीख में असम्भव जरूर लग रहा हैं लेकिन समाज को देनी होगी
और स्त्रियों को आगे आना होगा,क्योंकि पुरुष के समान ही नारी को पूर्ण समानता
मिलनी चाहिए क्योंकि मानवता का यह जन्म सिद्ध अधिकार हैं|वह इसके लिए मैदान
में डटी रहेगी चाहे जितना फिर संघर्ष ही क्यों न करना पड़े.पुरुषवर्ग को अपने आँखों
पर पड़ी पट्टी को खोल लेना चाहिए क्योंकि चीनी कहावत में कहा गया हैं कि-‘जो सबसे सरल हो उसे
अनुकरण से और जो सबसे कडवा हो उसे अनुभव से|इन तीनो तरहो से इन पर अम्ल करके अपनी
आँखें खुली तो विकट परिस्थितियां बन जायेगी ,जिनका कोई समाधान भी न होगा.कहते हैं
कि-‘अति
सर्वत्र वर्ज्यते’|
ऐसी महिलाये जिन्होंने दमखम
दिखाया जो दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी.दुनियां की कुछ ऐसी महिलाऍ जिन्होंने
पुरुषों के क्षेत्र में सम्भाली कमान तथा विभिन्न क्षेत्रो में अपनी अद्भुत
प्रतिभा दिखाई और दुनियां को अपने हुनर का लोहा मनवाया.
भारत में स्त्रियों की
भूमिका को लेकर प्रख्यात समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया जी का कथन हैं कि-‘भारत को सावित्री
नहीं, द्रोपदी चाहिए.’यानि
किजो अपना निर्णय स्वयम ले सके,मर्दों का मुंह न ताके और जो अपने हिसाब से समाज
में अपना स्थान बना सके.कैरोलिन बीत पीड़ी की यक एसी महान महिला थी जो इस पीड़ीके
लगभग सभी लेखकों के जीवन का न केवल एक अभिन्न हिस्सा बन गई थी,वरन उन सभी के लिए
वे एक प्रेरणा स्त्रोत भी थी.जिन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों के बावजूद एक
जिम्मेदारी तथा पारम्परिक के रूप में निभाया.इन्होनें अपनी कृतिहार्ट बिट तथा ऑफ़ द
रोड में बीत पीड़ीके बारे में व्याप्त अनेक भ्रांतियों को खंडित करने का काम
किया.उन्ही के शब्दों में-‘इन
बुद्धि जीवियों की जीवन शैली की नकल करने वाले कभी नहीं जान पाए किये लोग कितनी
दरिद्र व दयनीय स्थिति में जी रहे थे......लोग सोचते थे कि मुक्त सेक्स,ड्रग्स तथा
समाज के नियमो से मुक्त केवल आनन्द और आनन्द की स्थिति में जी रहे थे लेकिन हकीकत
इसके एकदम विपरीत थी.’
लैंगिक अंतर के विषय में
सामाजिक,आर्थिक,सांस्क्रतिक एवं राजनीतिक स्तर पर भी परिवर्तन हो तो रहे हैं लेकिन
यथा योग्य परिणाम नहीं मिल रहे हैं.केवल कानून बना देने या अधिकारों की बात कर
देने से ही समाज में बदलाव नहीं आ सकता हैं.अगर सामाजिक बदलाव हो भी रहा हैं तो
उसका सीधा सा अर्थ समग्र वैचारिक बदलाव.फिर भी महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन
निश्चित ही आकलन का विषय हैं.दिसम्बर सं २०१२ में हुए निर्भया काण्ड ने शायद
महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन हुए और इस परिवर्तन का कारण इस काण्ड से सम्बन्धित
क्रांतिकारी रूप से उजागर किया गया हैंऔर लिखा भी गया.लेकिन लैंगिक भेद किस प्रकार
से हैं इसका साक्षात उदाहरण आईटीआई मुम्बई में हुई मानविकी एवं समाज विज्ञानं
विभाग की छात्रा अर्पिता विशवास जो कास्ट एंड जेंडर पर रिसर्च कर रही थी जिन्होंने
अपने ब्लॉग पर महिला विरोधी टिप्पड़ी पर लिखा किफैशन शो के दौरान लडकों से पूछा गया
किसुन्दे लडकियाँ यहाँ हैं?तो नहीं के जबाव में खाई किबहार जाकर अति सुंदर लडकियाँ
मिल जायेगी.वो रोटियाँ बेलेगी और लडके पैर द्बायेगें.इस कथन के विरोध में आवाज
उठाई.कहने का तात्पर्य यह हैं कि इस मुद्दे को मजाक कहकर माफ़ी मांगकर रफादफा कर
हाथ झाड लिए.अब इस प्रश्न यह हैं किहमारे समाज में मजाक लैंगिक भेद पर आधारित ही
क्यों होता हैं?उनका मानना हैं किलडकियों का जन्म भोग के लिए हुआ हैं वह बुद्धिहीन
होती हैं.
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के
पुत्र अभिजीतकी टिप्पणी ‘डेंटेड
पेंटेड’महिलाये,दिग्विजय
सिंह की टिप्पणी ‘सौ
टका टंच मॉल’,अधिवक्ता
जनरल ऑफ़ बेस्ट बंगाल की कोलकाता उच्च न्यायालय की टिप्पणी’सुंदर स्त्री की तरह
की गई मनमानी व सनक पूर्ण मांगें’आदि
देश व समाज के लिए घातक स्थिति हैं.जो यह प्रदर्शित करता हैं किकिस तरह समाज में
लिंग भेद को प्रदर्शित करता हैं ऐसे में मात्र कानून बना देने से सुधार नहीं
होगा,बल्कि समाज की चेतना व चिन्तन स्तर में सुधार लाना होगा.लैंगिक विषमता मिटाने
के लिए बरावरी के अहसास को लोगो के अंदर जगाना होगा.बोल्डनेस के नाम पर अश्लील
सामग्री परोसी जा रही हैं.स्त्री विचार विमर्श का नारा कही भी सुनाई नहीं दे रहा
लेकिन आज उह नारा नगाड़े-बाजों के साथ शब्दकोश में शामिल हो रहा हैं ऐसा प्रतीत हो
रहा हैं किस्त्री स्वतन्त्रता का जिन्न बोतल में बंद था जो बाहर निकलकर हडकम्प मचा
रहा हैं.अब आधी आबादी नये अवतार की रौशनी झरने लगी हैं.जैसा किएलन बार्किं ने कहा
हैं कि’मेरा
स्त्री होना,मेरी सीमा नहीं हैं और मुझे लगता हैं किकिसी की भी नहीं होनी चाहिए.’
यह बात सही हैं किस्त्री
शासित हैं.प्रक्रति के कुछ गुणों के कारण स्त्री पुरुष में भेद हैं.उसका
सौन्दर्य,कोमल भावनाएं,वर्तमान की जटिल परिस्थितियों ने उसे क्रूर व भौतिक वादी
होने के लिए उकसा दिया हैं.उसने आपको कैसे सुरक्षित रखकर अपनी अस्तित्वता बताई हैं,यह
उसने बतला दिया हैं.लेकिन उसे इन सब से जूझकर अपने अंदर की स्त्री को बचाकर रखना
होगा.इस सम्बन्ध में ट्रेसी एलिस रोज कहती हैं कि ‘मेरी तमन्ना और प्रतिज्ञा यही हैं कि हम
(औरतें)अपनी असली प्रक्रति और स्त्रीत्व को कभी न भूले.हमें याद रहे किहम इस देह
की समा के पार भी जानती समझती हैं,पर फिर भी ये देह हमारे लिए एक पवित्र और सुंदर
तालबद्ध घर हैं.’क्योंकि
अब स्त्रियों को आजादी मिल गई हैं,लेकिन उसकी स्वतन्त्रता को दाम्पत्य में टूटन और
दम्पत्तियो के अलगाव का कारण बताया जा रहा हैं.इसे तालमेल में बैठाने के लिए युवा
वर्ग जूझ रहा हैं.मूल्यों का विघटन हो र्हाहएं.स्त्रियों की आजादी एकबंद पिंजरे
में पंक्षी को आजाद करने के समान घटित हो रही हैं,वे सम्भल नहीं पा रही हैं.इस
आजादी के बहाव में बहती जा रही हैं.ऐसा लगता हैं किवो पुरुष की आजादी पर लगाम कसना
चाहती हैं और बताना चाहती हैं किअब हमारी आजादी की तानाशाही भी देख लो.स्त्री में
एक पुरुष्ट की परवर्ती जाग्रत हो रही हैं.पुरुष तो स्त्री बन नहीं सकता हैं,लेकिन
स्त्री जरूर स्त्री बन क्र खतरनाक होती जा रही हैं.पुरुषों को सामंजस्य बिठाने के
लिए
कोमलता और
सम्बेद्ना की जरूरत होती हैं.एक दूसरे की पूरक और सहयोगी बनकर ग्रहस्ती ढो सकना यह
एक पुराना जूमला सिद्ध हो रहा हैं.इस सम्बन्ध में अनेक महिलाओं ने जिनमें जेर्मन
ग्रीयर ने वाधियाकरण के अनेक स्त्रोतों की खोज की,पश्चिम में क्लारा जेत्लिन ने
सार्वजनिक निर्णयों में स्त्री की भूमिका साइमन द बोडवा ने स्त्री उपेक्षा के
जैविक कारणों का अध्धयन किया लेकिन भारत की लौह महिला मानी जाने वाली श्रीमती
इंदिरा गाँधी जी ने इस प्रक्रिया में कोई विमर्श नहीं किया.वे राजनीतिक अधिनायकवाद
की एक रूपक बनकर रह गई .
वर्तमान में महिलाओं को अपनी
गुलामी का अहसास हो गया हैं वह अब इसके विरोध आवाज उठा रही हैं.उसने अपनी दादी
,नानी को परिवार में एक पहचान होने पर भी मर्दों का रवैया उनके प्रति भेदभाव पूर्ण
उपेक्षापूर्ण रहा वो इसने देखा इसका परिणाम यह हुआ किमध्यम वर्गीय महिला ने अपनी
आत्महन्ता प्रक्रति को ताकत बना अपनी जड़े जमानी शुरू कर दी ,व्ही एक वर्ग आक्रमक
के उदय ने बगावत कर दी.पाश्चत्य सभ्यता ने उस पर काफी प्रभाव डाला जिसका परिणाम
स्त्री को पोशाक के खुलेपन व व्यवहार ,भाषा के लिए तिलांजली दी गई.जिसने स्त्री के
निजी विशिष्टता में विलुप्त होने का एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैं.यह भी
वास्तविकता हैं किस्त्री पुरुष समानता –स्वतन्त्रता
के समाज में एक भ्रमित असंतुलित और दिशाहीन का माहौल उत्पन्न कर दिया हैं.क्योकि
स्त्रियों की केवल भेष भूषा ही नहीं बदली उनकी वाचालता में भी अभद्रता आ
गई.मर्दाना अंदाज नजर आ रहा हैं.शायद उसे इस तरह अपनी जीवन की सार्थकता समझ आती
हैं.सामन्ती वर्ग को सबक सिखाना चाहती हैं.उसके आक्रामक व्यान उसके भाषा के मानक
को धुल कहता रहे हैं.साहित्यकार,रचनाकार,कविगण साहित्य के पन्नो पर विभिन्न विधाओं
के रूप में रस रंजक साहित्य परोस रहे हैं.और दूसरी तरफ महिला रचनाकारों की एक बड़ी
जमात बिना किसी सरोकार और प्रतिबद्धता के साथ स्त्री विमर्श कर रही हैं.एक ओर
दासता झेलती अभिशप्त नारी,तो दूसरी ओर पुरुष की शतरंजी विसात पर उसके ही मोहरों ओर
चालो से नेस्त्नावुद करती हैं.लेकिन समाधान केवल गुलाम या शोषण बन जाने से नहीं
होगा.संवेदनाहीन ,आक्रामक ,हिंसा की किताबी,लौह पुरुष में थल रही स्त्री की जमात
पुरुष अहम को टक्कर देने को तैयार हैं,लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी हैं.क्योकि
ओप्र| विनफ्रे का कथन हैं कि’एक
रानी की तरह सोचे.रानी कभी विफल होने से नहीं डरती.विफलता तो महानता की राह में
आपके कदमों के नीचे एक पायदान होती हैं.’
जारी हैं ........................