नारी महिमा –एक विश्लेष्ण
स्त्री –सुंदरी
,कांता,कलत्र,वनिता,नारी,महिला,अबला,ललना,औरत,कामिनी,रमनी,स्त्री वर्ग को दर्शाता
नारी शब्द संसार.महिला शब्द में ‘म’ अक्षर से ही उसमें
छिपे शब्दों की महिमा उजागर होती हैं-ममत्व,मानवता,म्रदुलता शब्द सभी
परिवार,समाज,देश के कल्याणकारी प्रवृतियों
के गोचर ही हैं.सुख शान्ति,सहयोगिता,सह्रदयता की सार्थक महिला ही संस्कृति क
उत्थान,उत्कर्ष सम्पूर्ण स्रष्टि में करती हैं.भारत में नारी को देवी रूपा
परम्परावादी छवि अर्थात ;यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता’इस भावनात्मक मूर्त
की बात को नकारकर अपनी ‘कठमुल्लावादी
सोच’को
ही प्राथमिकता ही दी जाती रही हैं.महिलाओं की सहजता,सहनशीलता,संकोची स्वभाव का
फायदा उठाकर आज भी महिला उत्पीडन का ग्राफ की वृद्धोतरी बनी हुई हैं.स्त्री समाज
में निह्थी व् पुरुष में निहित मर्ज हैं.पुरुष महिलाओं को ‘सजावट का गुलदस्ता’मानता
हैं.उपभोक्तावादी संस्कृति की तरह ही स्त्री को व्स्तिओं में गिना जाता हैं.’सीमोन द बोद्वर’ने अपनी प्रसिद्ध
कृति’सेकंड
सेक्स’में
लिखा हैं की ‘स्त्री
पैदा नहीं होती,बना दी जाती हैं’.संवेदनाओं
के स्तर पर बाँट देना ,सत्य नहीं बल्कि संवेदित होना व्यक्ति की पहचान हैं,न कि
पुरुष या स्त्री की.औरत और गहना एक दूसरे के पर्याय वाची हैं.प्राचीनकाल में
इन्हें परम्पराओं ने जोड़े रखा और आधुनिक काल में फैशनवृति व विज्ञापन बाजार ने
बंदी बना रखा हैं औरतों का गहना ही उनके सौन्दर्य का सामान कम,गुलामी की नकेल बनकर
रह गया हैं.पुरुषप्रधान में के सम्बन्ध
में डार्विन का सिद्धांत-‘जो
क्षमतावान होगा,वही उभरकर आयेगा,बाकी सब नष्ट हो जाएगा’,बनाये हुए हैं.
औरतों की दशा के लिए स्वयम परम्पराओं का अनियन्त्र्ण अर्थात स्वभाव से कोमल ह्रदय
व निर्मलता,जो नफा-नुक्सान देखे बिना भरोसा
कर फैसले लेकर उगती हैं और मुट्ठी भर सुख-सुविधाओं के लिए अधिकार की उम्मीद
में टिल-तिलकर अपने को नष्ट करती हैं.स्त्री संवेदनाओं को शुष्क बनाने के लिए उसका
सामाजिक संबंधनों को प्रोफेसनल दक्षता के
साथ निभाएं जाने के कारण ‘अहम
भूमिका’समाज
की हैं.
बाईबिल में स्त्री के लिए कहा गया
हैं कि-‘पुरुष
की पसली से स्त्री को निकाला गया हैं.’महिलाओं
से ज्यादती का कारण मुस्लिम समाज की सुन्नत प्रथा,पितृ समाजात्मकसमाज असुरक्षा की
भावना,अहमवादी प्रवती र्हैं.महिलाओं के सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के
अनुसार-स्त्री की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक सत्ता में हजार साल लगेगें.’पहला विचार अति
प्राचीन और दूसरा अति आधुनिक.देश की अदर्धसामंती व्यवस्था पुरुषों का महिलाओं को
अपना कट्टरपंथीमानना स्त्री शक्ति और मुक्ति के बड़ते पहलु के साथ अपराधिक
प्रव्रतिया बड़ना भी महिला दशा परिवर्तन की विरोधी हैं.
औरतों की अमूल्य-अतुलनीय ममता और
करुना की जीती जागती मूर्ति के जीवन को गुमनामी सीमित दायरे और परिवार की
चहारदीवारी में कैद करने के वाला,पुरुष प्रधान समाज और हमारी सामाजिक संरंचना की
जटिलता तो हैं ही साथ ही उनका स्वयं की भावनाओं पर अनियन्त्र्ण भी हैं.अपनी
करूनाम्यी छवि को पारदर्शी बनाने में पुरुषों के सामने वह
अबला,असहाय,वेबस,मजबूर,लज्जाशील बन जाती हैं.आर्डिश वहित्सनका कथन हैं कि-‘स्त्री पुरुष से
जितना प्यार करेगी,अपने जीवन को उतना ही सहज और स्वाभाविक पायगी,उसमे उतनी ही
स्निग्धता,मिठास एवम लय भर जायेगी,वह अधिकाधिक भली बनती जायगी.फिर पुरुष के ह्रदय
में उसका आकर्षण कभी नहीं मरेगा.पुरुष उसकी बदौलत अपने जीवन को भरा हुआ अनुभव
करेगा और उसका जीवन संतुलित होगा.
औरतों की गुलामी सबसे पहले आर्थिक
गुलामी से परिभाषित होती हैं.औरतों की भूमिका में सवाल गृहस्ती और कामयाब महिलाओं
के बीच का हैं.नारी की स्थिति ‘सजायाफ्ता
कैदी’की
तरह हैं जो पारों की दीवार वाली ठंडी जेल में अपने सबसे नजदीकी अंत की प्रतीक्षा
में हैं.महिलाओं की स्थिति के लिए प्रक्रति प्रदत्त स्वाभाविक गुण ‘आंचल में हैं
दूध,आँखों में हैं पानी’और
उसका पूरा शरीर अग्नि में जल रहा हैं.पत्नी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर अधिकार रखने
वाला पुरुष अभी भी शासक और शासित की रूडिवादी रिश्ते से अपने को प्रथक न रख सकने
में असमर्थ हैं,प्रगतिशील महिलाओं से उसके अहम को ठेस लगती हैं.और समाज की नजरों
में दीन हीन महसूस करता हैं.प्रसिद्ध फांसीसी लेखिका सीमोंन द बो उबाने अपनी
कृतिसेकंड सेक्स में लिखती हैं कि’औरत
घर की धुरी होती हैं और ता उम्र अपने आप को गला कर अपने पीटीआई व् बच्चों के घर की
ईंटे सवारती हैं.लेकिन इसके बावजूद उसके इस योगदान को कही भी रेखांकित नहीं किया
जाता.’
कानून की नजरों में औरतें-मर्द का स्थान बराबर होने पर भी औरते तर्कपूर्ण
लड़ाईयों के स्थान पर भावुकता और दूसरो की सहायता के बीच न्याय पाने के लिए छटपटा
रही हैं और उन्हें हार का सामना कर पड़ रहा हैं.नासिरा शर्मा ने औरतों की दशा पर ‘खुदा की वापसी’में नौ कहानियों के
द्वारा उल्लेख किया हैं.पितृसतात्मक समाज,मुस्लिम समाज की सुन्नत प्रथा ,अहम
ग्रस्त भावना, असुरक्षा की भावना के कारण स्त्रियाँ सदैव से ही प्रताड़ित होती रही
हैं.’तलाक’ शब्द उनकी संघर्षरत
जिन्दगी में गृहस्थी टूटने के डर से हथौड़े की तरह कार्य करता हैं.मुस्लिम औरतो की
दयनीय स्थति के लिए उन्ही की ‘शरीयत
लॉ’हैं जो
तीन-चार विवाह करने की इजाजत देता हैं.पाकिस्तान में महिलाओं की लिंग भेद स्थिति
के लिए ‘साक्ष्य
अधिनियम’
जिम्मेदार हैं,जो महिलाओं के दो गवाह को एक मानता हैं.भविष्य में इस अधिनियम के
आधार पर आशंका निराधार नहीं हैं किएक महिला वोट को आधा ही माना जाय.
जीने योग्य
बनाने के लिए.
पुरातन काल से ही नारी अंगारों
पर चलकर जलती रहती हैं.वह अंगारों की ठंडी राख की तरह हैं.जैसे राख का उपयोग
बर्तनों को संवारने में,खेतो के कीड़े मारने के लिए और अगर बेकार बच गयी तो नालियों
में सड़ने के लिए डाल देते हैं. स्त्री की यह पीड़ा प्रक्रति प्रदत्त नहीं बल्कि
अहम,हिंसा और सत्ता हैं.अब नारीवाद के तूफानी झकझोर देने वाली हवाओं की फडफडाहट
विकराल सूनामी बन रही हैं.नारी की स्थिति आजीवन कारावास की तरह हैं जो पारे की
दीवार वाली ठंडी जेल में जीवन के अंतिम क्षणों में तिल-तिलकर मरती रहती हैं.धर्म
और ईश्वर को जीवन में जीडी उत्प्रेरकताए हैं.भरतीय समाज में कुप्रथाओं के आने का
कारण अशिक्षा और कुद्रष्टिकोण हैं.विकृत हो चुकी परम्पराओं और संस्कारों की उन
अँधेरी गलियों में,जहां एक लम्बा त्रासद काल भोगा हैं उसने.लेकिन वो सब तो पीछे
छूट गया.........अब उसके लिए खिड़कियाँ हैं,दरवाजे हैं........पर भीतर की ये धूप और
हवा तो नई –नई
हैं पर भीतर की जमीन की सीलन और कई को छूटने में कितनी सरक जायगी,कौन जाने?पुरुषों
की अहंकारी प्रवर्तीऔरत जात पर राज करना हैं.औरत शोषण के लिए पैदा हुई हैं.सफल
महिलाये भी अपने जाती के दुःख-दर्द के लिए सहभागी हैं,जिनसे कभी वो दो चार हुई
हैं.हालांकि कानून की नजरों में समान स्थान होने पर भी देश की अर्द्ध साम्न्तिवादी
व्यवस्था,पुरुषों को महिलाओं को अपना कट्टरपंथी प्रतिद्वंद्वी मानता हैं.स्त्री
शक्ति और मुक्ति के बड़ते पहलु के साथ अपराधिक प्रवर्तिया बड़ना भी महिला परिवर्तन
की विरोधी हैं.आर्थिक स्वतंत्रता को सुख की पूंजी मानने वाली पावरलेस वीमेन ,अब
पावरफुल हो गयी हैं,जिसने पारम्परिक दायित्वों की जकड़ को ठीला कर दिया हैं.उसके
दायित्वों को इनसतेट बना दिया हैं.समान काम –समान
बेतन की की हवा बहने लगी हैं.स्त्री जाति की वकालत ,मेरी वूल्स्त्न क्राफ्ट ने इन
विन्दिक्सं ऑफ़ दराइट्स में की.सिमोन दवोद्वरका भी कहना हैं कि’अगर सबल होना हैं तो
सबसे पहले अर्थ पर काबू पाना होगा और आज बहुत हद तक स्थितियां काबू में हैं लेकिन
आंसू अभी चुके नहीं हैं.
नासिर शर्मा का कहना हैं कि ‘स्त्री अधिकारों का
उपभोग करना सीखे’.कानून
ही सगा हैं चाहे वो संबिधान के रूप में हो या धार्मिक नियम के रूप में या राष्ट्र
के अपने अनुशासन की शक्ल में हो.और तो बदली पर मानसिकता नहीं बदली.नारीवादी करौल
प्रमाण का कहना हैं कि’पित्रसत्तात्मक
की संरचना पौरुष और स्त्रीत्व की विभिन्नताओं के आधार पर गडी गई थी,जो किवास्तव
में शासन और दामन के बीच की एक राजनीतिक भिन्नता थी’.’नरसे
भारी नारी’कामुक
चातुकरिताही थी,क्या वह गिरा तुम्हारी’?प्रसाद
के कथन से उद्धत हैं कि नारी पुरुष से अधिक शक्तिवान हैं.स्त्री को सामाजिक माँ का
दर्जा उद्विकास की यात्रा का दिया हैं.कल तक शक्ति स्वरूपा बनी नारी आजब्ला और
अशक्त कैसे बन गयी.कारण कही उसको आदरनीय ,पूज्या,दैवीय रूप के प्रलोभन में उसने
स्वीक्रति तो दी.रक्षण ,शक्तिवान रूपी स्त्री स्वयम अपने संरक्ष्ण के लिए कही
कानून का दरवाजा तो कही पुरुषों की भीड़ में सम्मलित हूने के लिए दर-व-दर भटक रही
हैं.
बेटे-बेटियों को विश्वज्ञान में
विशेषकर विवाह और मानवीय रिश्तों के पक्ष की ओर जागरूक बनायं जिससे वह कक्षा में
प्रथम और ऑफिस में सफल कर्मचारी ही न बने बल्कि व्यक्तिगत जीवन में अपने रिश्तो और
उसकी मर्यादा को पहचानकर एक सफल जीवन जीने की कोशिस करे जिससे धैर्य
,विशवास,बलिदान एवं मानवता हो,न किएक छोड़ दुसरे को पाने की भटकन.वैश्याव्रती में
लिप्त उपाय.लेकिन पुरुषों की अहंकारी प्रवर्ती जैसे-औरत जात पर राज करना,,औरत तो
शोषण के लिए पीड़ा हुई हैं,यह मानसिकता जब तक नहीं बदलेगी ,तब तक कुछ नहीं हो सकता
,चाहे जितने दिवस बना लो,कानून बना लो या उत्थान कार्यक्रम सत्ताधारियो के सामने
समस्या रखना केवल हल नहीं बल्कि उन्हें कर्तव्यो के प्रति सचत करना हैं,वैचारिक
धरातल की विवेचना करना,विचारों या पार्टी को समर्थन के अलावा अहम भूमिका निभाएं
तभी उत्थान कार्यक्रमों की सार्थकता होगी.ऐन.क्रित्तेंदें ने दप्रिसे ऑफ़ मदर हुड’ में लिखा कि-‘परम्पराओं को तोड़ने
का रास्ता दिखाती,स्त्रियों के नाम पर अधिकारों से वंचित किया जाता हैं और उनकी
आत्मनिर्भरता चिनकर उन्हें पल-पल समाज पर बोझ होने का एहसास कराया जाता हैं,वो भी
तब जबकि वे समाज की सबसे बड़ी आने वाले कल के निर्माण में अपने आप को भुलाए रखती
हैं’.’स्त्री विमर्श’ के तमाम शोरगुल ने
बेशक एक हद तक स्त्री को मुक्त किया भी हैं लेकिन माताओं को नहीं.
अरस्तु ने नारी के विषय में कहा हैं कि-‘स्त्री,पुरुष के शरीर की एक अतिरिक्त
हड्डी हैं.’नारी
चहारदीवारी नहीं बल्कि मोती की तरह सहेजने वाले जीवन के रिश्तों को अपने भीतर से
गुजरने देने वाली एक दरवाजा हैं.’नारी
स्रष्टि की पर्याय,धरा सी उदार,सूर्य की दमकती किरणों की तरह उसकी नेमतों,
मेहरबानियों,सौगातों की पहुच अनंत तक हैं.नारी जीवन भर ठ्ल्कतीबूंदों से पलों की
जीती,लगाव-अलगाव के बीच डूबते,उदय होने को मजबूर होने के बावजूद स्रष्टि की
उर्जावान स्त्रोत हैं.अपनी मुट्ठी और दरवाजों पर स्त्री का ही हक हैं.यानिवित्तीय
स्वतन्त्रता और एकांत,हर एक स्त्री का पहला अधिकार होना चाहिए.उसके कार्य क्षेत्र
को घर की चहारदीवारी के बीच रखा जाता हैं,हजार निगाहेब उसकी पहेरेदारी करती हैं
.वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाह में भटकती रहती हैं.प्राचीन निर्मित सामाजिक
ठांचा में सुधारात्मक प्रयास होने के बावजूद नवयुग की निर्मात्री,घर-परिवार की
नींव ,नारी की वर्तमान में दशा कुंए से निकली खाई में गिरने जैसी हैं.स्त्री
अधिकारों और संघर्षों का अपना एक लम्बा इतिहास हैं.नाओमी वुल्फ ,’दब्यूटी मिथ’ में लिखा हैं कि-‘सौन्दर्य के
मिथक,जीवन के सभी क्षेत्रो में फैले हुए हैं.कुरूपता और रूपता का खारिज
होना.स्त्री को बडावा देने की संभावना से जुड़ा हैं.बुद्धि और सुन्दरता को अलग करके
देखना भी उसी द्रष्टि को अलग करके देखना भी उसी द्रष्टि का परिणाम हैं.सुंदर दिखने
की ऐसी ललक जी उठी हैं की स्वयम स्त्रिया जिन्दगी का जोखिम उठाने से भी पीछे नहीं
हट रही हैं ,मानों बाहरी दुनियां ही सब कुछ हैं.ऐसा ही जेसिका वालेती ने द प्यूरती
मिथ में उद्धत किया हैं कि’युवतियों
को दैहिक नैतिकता और पवित्रता के हैं.समाज को उस पर व्यर्थ का बल प्रयोग करने से
पूर्व पहले एक बार सोच लेना चाहिए कियही बल उसे बाँध तोड़ने को उकसा भी सकता हैं.’स्त्री और पुरुष में
केवल बनावट का ही अंतर नहीं हैं,उनकी सोच व चाहते भी अलग हैं.’
सामाजिक-राजनीतिक मोर्चे पर
महिलाओं को प्रमुखता देने में हिचक की ठंडी वर्फ पिघलने लगी हैं.उसकी क्षमताओं पर
भरोसा कर वह संकटमोचक ठाल के रूप में करना यह परम्परावादी समाज में स्त्री
वर्चस्वता का संकेत हैं.ऍन.माचुंग ने द सेकंड शिफ्ट में इसका साक्षात उदाहरण १६
मार्च,सन१९९९ को शिरोमणि द्वारा गुरु प्रबन्धक कमेटी की नव निर्वाचित अध्यक्षता
बीबी जागीर कौर जो ७४ वर्षो के इतिहास में प्रथम महिला चुनी गई,सं १९९१ की
जनगणनामें औरतो को जबाव देने की अधिक्रत किया गया.सं २००१ की जनगणना में ज्घु करने वाली महिलाओं का अलग से कालम दिया गया.७०-८०
के दशक में ऐतिहासिक अध्ययन में बताया गया किआज भी दोहरी आय वाले परिवार की
वास्तविकता बताती हैं कि कैसे आज भी ७०%स्त्रियाँ दोहरी जिम्मेदारी का बोझ उठा रही
हैं.उनकी आर्थिक स्वतन्त्रता को स्वीकार कर तो लिया गया हैं ,लेकिन घरेलू
जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया.एक और घरेलू जिम्मेदारियां बच्चों की देखभाल और
दूसरी ओर आर्थिक सम्बल होने का अहसास उन्हें जकड़े रखता हैं.
धर्म और ईश्वर तो जीवन से जुडी
जाग्रत उत्प्रेरकता हैं फिर भी ये कुप्रथाएँ हिन्दू समाज में कहा से आई,जबकि
मुस्लिम,पारसी,ईसाई समाज में स्त्रियाँ चीखों ,लपटों ,दर्दनाक मौत से महफूज
हैं.कुप्रथाओं का कारण अशिक्षा ,कुदृष॒टिकोण,नासमझी की आग जिस पर शिक्षा विस्त्रत
द्रष्टिकोण का पानी डालकर श्राप मुक्त करना होगा.गैर सरकारी ‘वुमन पोलिटिकल वाच’की अध्यकक्षा श्री
मति मीरा नायर कहती हैं किस्त्रियों की हिदायतों को बंधन मानने का कारण,पुरुष
प्रधान समाज में निर्णय होने,आदेश देने का कार्य पुरुषो का होना हैं.साहित्य में
स्त्री की स्वाधीनता ज्यादा दर्शाई गई हैं.स्त्री की स्वतन्त्रता केवल सम्बिधान
में दी गयी आयतों से समाधान नहीं क्योंकि स्म्बिधाब में लिंग समानता,मताधिकार दिए
जाने पर भी क्रान्ति की धरा मंधिम पड़ी हुई हैं,जिसमें एक कारण आर्थिक विकास की
मद्धिमता ,जिसमे पुरुषों का एक बड़ा वर्ग भी वंचित हैं.जिससे स्त्री विकास की
यात्रा अवरुद्ध हुई .स्त्री –पुरुषों
का विश्लेष्ण करने में अंग्रेजी मुहावरा दोहराया जाता हैं कि ‘पर्सनल इस पोलिटिकल’जबकि यह थी तो कहा
जा सकता हैं कि ‘पोलिटिकल
इस पर्सनल’
स्त्री ही हें.स्त्री का अमानवीय रूप अर्थात ग्लोबल शोषण का शिकार ग्लोबल स्त्री
ही हैं.इसका कारण ग्लैमर हैं.आदुनिकता की पैदाईश महत्वाकान्क्षायं हैं.प्राचीनकाल
से यह जघन्य सच ही हैं जिसे आधुनिकता का नांदिया जाता हैं कि पूरी जगत में स्त्री
स्वेच्छा से एक मुद्दत से इजाजत देती रही और दे रही हैं.
आधुनिकता के नाम पर अपने को उच्च
मानने की महत्वाकान्क्षाओं में से अपने आप से पूछें किक्या ये आदिम स्त्री से एक
कदम आगे बड़ी हैं या चार कदम पीछे चली गयी.नुमाईश के नाम पर कमाना ही समझदारी का
राज नहीं बल्कि आसमान से गिरी खजूर के पेड़ पर अटक गई.औरतों का गहना ही उनका
सौन्दर्य का सामन कम, गुलामी की नकेल बन गया हैं.गहने औरतों का ब्रांड देकर उसके
साथ छलावा हो रहा हैं क्योंकि औरत और आभूष्ण एक दूसरे के पर्याय हो गये
हैं.प्राचीन समय में औरत और गहनों को परम्पराओं से जोड़े रखना तो आधूनिक काल में
फैशन परवर्ती और विज्ञापन बाज़ार मिलकर उसे बंदी बना रहे हैं.इसे मोह्बंद का प्रभाव
उसके व्यक्तित्व पर पड़ता हैं.तात्पर्य यह हैं किइस मोहपाश के छलावे के प्रति अंधी
पट्टी मानकर समझौता करना समझदारी नहीं बल्कि अपने प्रति दगाबाजी करना हैं.एटलश ऑफ़
वीमेन एंड मेन इन इंडिया में एक ऐसा हथियार साबित हो रहा हैं जिसमे औरतों को
नक्शों में दर्शाया जा रहा हैं.उनके प्रति लिंग भेद भाव ,विभिन्न प्रकार की
योजनाओं को बनाने की स्थिति सुधारने में लाभदायी हैं.क्योकि सही आकने न होने
पर,उपलब्ध आक्नो के आधार पर भविष्य की लकीरे खींच दी जाती हैं.
अदूरदर्शितापूर्ण
निर्णय और नैतिक मूल्यों का गला घोटकर भविष्य के प्रति अनिश्चता की भावना रखने
वाली महिला के सम्बन्ध में अरस्तु ने कहा हैं कि-‘औरते तो हर तरह से पुरुष से कम व कमजोर
हैं.उसके मुंह में पुरुष से कम डांट हैं क्योंकि भारत देश में ६०%महिलाये काम करने
पर भी,निर्वाचक प्रक्रिया में भागीदारी का सिर्फ २९%हैं.यह महिला स्श्क्तिक्र्ण के
नाम पर नकली लोकतांत्रिक रचना का नाटक रचा जा रहा हैं.डार्विन का सिद्धांत ‘जो क्षमतावान
होगा,वही उभरकर आयेगा,बाकी सब नष्ट हो जाएगा’,यह
मानकर भी नहीं चलना चाहिए.पद्मविभूषण सम्मानित समाजसेविका श्रीमती ईलावेन भट्ट का
विचार हैं कि-दहेज़ के महिषासुर जैसी अन्य कुप्रवर्तियो का अंत महिलाओं को आर्थिक
सत्ता की जिम्मेदारी सौपी जाएँ.हालांकि औरतो ने अपने विश्वास व कर्मठताओं से
वर्जित क्षेत्रों में कदम रखकर वर्जनाओं की ठेर सारी दीवारों को ठहाया और अपमान के
खानों में अपने लिए सम्मान अर्जित कर अँधेरे में विशवास का दिया जलाया हैं.प्रथम
आईपीएस अधिकारी श्रीमती किरण वेदी तमाम ताकतों और दबावों को झेलते हुए हासिल करवा
दिया कि ‘व्यवस्था
उतनी ही भ्रष्ट हो सकती हैं जितनी किहम उसे होने दे सकते हैं.’अगर हम सम्भलना चाहे
सम्भल सकते हैं.म्धुकिश्व्र की लोकप्रिय पत्रिका’मानुषी’महिलाओं के हक से परिचित कराके तमाम
शोषण महिलाओं की आवाज न गई हैं.चर्द्र्कांत देवताले कहते हैं कि-एक औरत का धड भीड़
में भटक रहा हैं.उसके हाथ अपना चेहरा ठुड रहे हैं.उसके पाँव जाने कब से,अपना पता
पूछ रहे हैं.बीजिंग सम्मेलन का मुख्य दर्शन यही हैं कि’विकास प्रक्रिया में
महिलाओं का स्थान वस्तुपरक न होकर ,विषयपरक होना चाहिए.’ होहई व्यर्वाला
पहली फोटोग्राफर सं १९४२ के दौरान विश्व द्वितीय युद्ध के जीवंत द्र्श्यो को लेकर
यह सिद्धा कर दिया कि’अगर
महिलाओं को स्वतन्त्रता दी जाए तो वे प्रत्येक परिस्थितियों का फायदा उठाकर पुरुषो
से आगे निकल सकती हैं.’विश्व
बैंक ने नया नारा दिया था किनारी उत्थान की द्रष्टि से किया गया निवेश अच्छा
अर्थशास्त्र होता हैं,क्योंकि स्त्री,स्त्री समाज का आधा हिस्सा और राजनितिक
शब्दावली में इसका अर्थ पचास फीसदी वोट.महिलाओं के सम्बन्ध में वशीर वद्र कहते हैं
कि’हम भी दरिया
हैं ,हमे भी अपना हुनर मालूम हैं जिस तरह भी चल पड़ेगे ,रास्ता हो जाएगा.’ऋणोंसे मुक्ति
दिलाने में समाजसेविका इला भट्ट जो सेल्फ एम्प्लोयेडवीमेन एसोसिएशन नामक संगठन की
संचालिका,जिन्होनें सं १९७४ में स्थापित संगठन ने कामकाजी और श्रमिक महिलाओं को
संगठित करने में अहम भूमिका निभाई.स्त्री मुक्ति व उत्थान में न्यायमूर्ति
वी.आर.क्रष्ण अय्यर का कथन उद्धत है कि ‘महिलाओं
की स्थिति सुधारने में विफलता के लिए समाज के शक्तिवान लोगो की कमजोर इच्छाशक्ति जिम्मेदार
हैं.प्रशासन के पाखंड और उसकी कथनी व करनी में बेहूदा अंतर हताश करता हैं.’म्रणालपांडे कहती
हैं कि’स्त्री
वामा हैं यानि स्त्री शक्ति पुरुष की विरोधी नहीं,बल्कि स्रष्टि के अधूरेपन की
पूरक हैं,स्त्री के वामा रूप की हमारे पूर्वजों ने इसलिए कल्पना भी की थी की अपनी
सारी स्वभाव और रूपगत विविधता समेत पुरुष और स्त्री मिलकर सम्पूर्णता को प्राप्त
करे.वे सच्चे अर्थो में एक दूसरे से सहचर-सहचरी बनी,लेकिन कई झमेलों के चलते
स्त्री का सह्चरी रूप अवमूल्यन का एक ऐसा शिकार हुआ किवह रह गई मात्र अनुचरी.’ संक्षेप में कहे तो
हमे दैवीय अवतार की नहीं ,मानव उत्थान की उत्क्रष्ट आवश्यकता हैं.महिलाओं को अपने
उत्थान के लिए प्रताडनाओं व अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने वाली अर्थात मानवीय
उत्थान का साक्षात उदाहरण भंवरी देवी बनना होगा,जिन्होंने के अघोषित महिला सम्मेलन
में शामिल होने के लिए जाते समय कहा था कि’अत्याचार
और अत्याचारियों से लडती रहूंगी .
भारत में १८ साल तक प्रधानमन्त्री
रही श्रीमती इंदिरा गाँधी ,महिला राज्यपाल व सांसद रही प्रतिनिधियों से आशा की
जाती रही किअब सार्थक ठोस कदम उठाया जाएगा,लेकिन इस पर श्री मनोहर लाल लोहिया जी
का वक्तव्य था कि’कितने
दुःख की बात हैं किजिस देश की प्रधानमन्त्री एक महिला हैं ,वहाँ की करोड़ो महिलाओं
के लिए शौचालयों की व्यवस्था नहीं हैं.’समाज
और राष्ट्र निर्माण में महती भूमिका
होने पर भी अर्द्ध सामन्ती व्यवस्था के कारण सामाजिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ
हैं.रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी ने कहा हैं कि’अगर
स्त्री जाती का दुखी होना अवश्यम्भावी हैं,अगर यही तुम्हारी व्यवस्था हैं तो फिर
जहाँ तक सम्भव हो,उसे अनादर में रखना उचित नहीं हैं.आदर से दुःख और व्यथा ओर बड
जाती हैं.इसका एक कारण सुश्री अंजना अनिल,विश्व विद्यालय,ल्घुकाम्कार १९८९,के
शब्दों में-‘औरत,औरत
को न मारे ,तो कभी न हारे .’
महात्मा गाँधी जी का कथन हैं कि
‘जीवन में जो
कुछ पवित्र और धार्मिक हैं,स्त्रियाँ उसकी विशेष संरक्षिकायें हैं’.पुरातन समय यानि सं
१९५२ के समय की महिलाएं आंगन भर धरती और खिड़की भर धूप की चाहरदीवारी में पुरुष
प्रधान समाज में कैद थी.आसफ अली के शब्दों में महिला अधिकार एक आभूष्ण से अधिक
महत्चपूर्ण नहीं हैं.इस अधिकार क्र साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ हैं,जिसके लिए
सचेत रहना होगा.महिलाओं को आजादी तभी मिलेगी ,जब तक वह अपनी गुलामी को अपनी नियति
न मानकर विद्रोह करे.तो यही से एक नई गूँज की तरंगे उठकर उसे आगे ले जायेगी,लेकिन
उसके व्यक्तित्व विकास के लिए उसकी कर्मठता,नैतिकता,मातार्त्वता को समाज में
सम्मान दिलाना होगा.नारी मुक्ति का झंडा न फहराकर बल्कि उसके द्वारा किये गये
कार्यो के योगदान को समाज हित में परिभाषित करने की जरूरत हैं.जैसा किअरस्तू ने
कहा हैं कि-‘नारी
की उन्नति और अवन्ती पर ही राष्ट्र की उन्नति और अवन्ती निर्भर हैं’.औरत जननी
हैं,स्रष्टि की रचयिता होने पर भी जब उसके अधिक अधिकारों की बात आती हैं तो
पुरुषों के समकक्ष दर्जा क्यों दिया जाता हैं?उसके लिए अधिकार पुरुष से ज्यादा
होने चाहिए क्योंकि उसके कर्तव्य भी तो पुरुषों से ज्यादा हैं.इस सम्बन्ध में
जायसी का कथन हैं किस्त्री और पुरुष विश्व रूपी अंकुर के दो पत्ते हैं.महिला दिवस
मानकर ही छुट्टी नहीं की जा सकती बल्कि मुक्ति के पिंजरे से निकलने के लिए महिलाओं
को नियम तोडकर स्वयम फैसले लेने की पहल करनी पड़ेगी और खुद को पड़ना पड़ेगा की वह
क्या कर सकती हैं?तभी कुछ बदलाव हो सकता हैं.विश्व भर में महिला मुक्ति को लेकर जो
हलचल मची हेनुसका परिणाम यह हुआ किपुरुष वर्चस्व वाले जो कितने भी श्रम साध्य हो
या बेकार से बेकार हो लेकिन उससे प्रवेश सिद्ध कर दिया.पूर्व आईपीएस अधिकारी
श्रीमती किरण वेदी के शब्दों में शिक्षा महिला समाज की पहली गारंटी हैं.महिलाये
अपनी स्थिति का सम्पूर्ण विश्लेष्ण कर स्वयम को पुरुष की सम्पत्ति न समझे और उसके
एकाधिकार वादी रवैये को खत्म करने की दिशा में प्रयास शुरूकर स्वयम को मानसिक स्तर
पर पुरुष की गुलामी से मुक्त करे.प्रेमचन्द जी का मत हैं कि-‘नारी सब कुछ सह सकती
हैं,दारुण से दारुण दुःख,बड़े से बड़ा संकट,अगर नहीं सह सकती तो अपने यौवन काल की
उमंगो का कुचला जाना.’प्राचीन
मिथक को तोड़े वह बच्चे पैदा करने वाली मशीन नहीं हैं और न ही पुरुष सुरक्षा की
गारंटी हैं.अनादर नाम की चीज राख की तरह होती हैं.बहार से ताप दिखाती नहीं,जब
आत्मसम्मान कम हो जाता हैं,तब अनादर भी अन्याय लगता हैं.उसे वेदना महसूस नहीं
होती,तभी तो नारी दुःख का अनुभव करने में शर्माती हैं.
शिक्षित वर्ग की महिलाओं में अपने को
पूर्णतया सिद्ध कर अप्रत्याशित परिवर्तन किये बल्कि अशिक्षित और प्राचीन अंचलों
में भी पुरातन पंथी विचार छोडकर आगे आई हैं.कदम आगे बड़करपरिवर्तन की लहर आई हैं.सं
१८५७ में नारीवाद का जिक्र पुरुष समाज के विरुद्ध छेड़ागया एक अभियान था जिसका अर्थ
था ‘वह
विचारधारा जो एक स्त्री को अपने जायज अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाती
हैं.वर्तमान में यही परिवर्तन उसी विचारधारा का परिणाम हैं विचारधारा का संकेत था
की क्रान्ति दबे पाँव आ रही हैं,जो लोग नारीवाद को ढकोसला कहते थे ,उनके लिए
चेतावनी थी.’जब
महिला आरक्षण विधेयक आने पर सांसद पुरुषों ने कहा था कि’यह संसद परकटी
महिलाओं की विरासत हो जाएगी’.महिला
आरक्षण ३०%मिलने पर भी सं १९९८ में हुए चुनावों में कुल ४५७६ उम्मीदवारों के
मुकाबले में महिलाओं की संख्या 267 थी जिससे जीती केवल ४३ महिलाये.इनमे से कुल प्रतिशत
उन महिलाओं का हैं जो राजनीति में महज डमी बनकर लाई गई.कहने का तात्पर्य –विहार में
रावड़ीदेवी,मध्यप्रदेश में छबीला नेताम,अलका नाथ,नईदिल्ली में मीरा कुमार या सोनिया
गाँधी.तात्पर्य यह हैं कितादाद में इजाफा हुआ हैं न किसुधार की संज्ञा मानी जा
सकती हैं.दोस्तोयव्स्की का कथन हैं कि’अन्तत:सुन्दरता
ही इस दुनियां को बचेगी.उनके इस वक्तव्य का अर्थ हैं किस्त्रियों की कोमलता और
सम्वेदना से था, नहीं कहा जा सकता.पर यह सच हैं किस्त्री ही दुनियां बदल सकती
हैं.उसे न्रशंसता और क्रूरता से बचाकर मानवीय समवेदना,प्रेम और जागरूकता की ओर ले
जा सकता हैं.
आज भी महिलाओं के लिए दिल्ली
दूर हैं,क्योंकि जो स्थिति हैं हैं वह ‘नक्कारखाने
की तूती’की
स्थिति बनकर रह गई हैं.अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में
वास्तिवक प्राशन्गिकताहैं की इसके जरिये महिला समाज को अभिव्यक्ति का मौक़ा मिला.’नारीवाद’का जिक्र सर्वप्रथम
सं १८७५ में एक लेख में किया गया था जिसका अर्थ था कि’वह विचारधारा जो एक
स्त्री को अपने जायज अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाती हैं.’नारीवाद हो या कोई
भी विवाद जब जड पकड़ने लगता हैं तो कुछ नकली प्रारूप और स्वयम्भू मठाधीश भी सर
उठाते जरूर हैं,लेकिन मुद्दा कभी न कभी उछल लेता जरूर ही हैं.मीडिया ने एक लतीफे
की तरह प्रस्तुत कर प्रचारित किया कि ‘महिला
पुरुष विद्वेषी हैं,अहंकार से चूर हैं,परिवार तोड़ना चाहती हैं.’नारी स्वतन्त्रता
परिवर्तन में अशिक्षा नारी के लिए अभिशाप बन गई हैं,क्योंकि अशिक्षा ही नारी को
पुरातनवादी परम्परावादी व्यवस्था पर सीधा प्रहार करने व गहराई से सूझबूझ का परिचय
देने में प्रबल कदम हैं जिससे वह अपनी व्यवहारगत द्रड़ता,योग्यता व सक्षमता के आधार
पर नारी प्रस्थिति परिवर्तन की कर्णधार बनेगी.
जेम्स स्टीफन कहते हैं कि ‘पुरुष से नारी अधिक
बुद्धिमती होती हैं क्योंकि वह पुरुष के कम जानती हैं,किन्तु समझती ज्यादा हैं.’ अशिक्षा के साथ साथ आर्थिक पराश्रिताभी
इच्छाओं,कल्पनाओं के पंख तोडकर दम घोट रही हैं.आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनकर
स्वतन्त्रता का जीवन जीने को अग्रसर हो रही हैं.साथ ही शिक्षित नारी का दायित्व
नारी अशिक्षा के अन्धकार को दूर करना,उनके सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करना जिससे
सीमित दायरे से बाहर निकले.नारी परिवर्तन तभी सम्भव हैं जब स्वयम को उठाने का
प्रयास करके स्वयम में चैतन्यता लाये तभी सभी प्रयास सफल होगे.क्योकि विवेकानंदजी
कहते है कि ‘स्त्रियों
की स्थिति में सुधार न होने तक विश्व में कल्याण का कोई मार्ग नहीं हैं.किसी पंछी
का एक पंख के सहारे उड़ना असम्भव हैं.’विकास
में महिलाये तभी साधक होगी जब उन्हें विकसित महिलाओं का रूप दिया जाएगा अर्थात
महिलाओं को प्राइमरी शिक्षा देना,स्वास्थ्य की रक्षा करना,रोजगार शुदा बनाकर
महिलाओं को विकास की मुख्य धरा के साथ जोड़ सकेगे.पूर्ववर्ती वसीयतों और विरासतों
से पहचानी जाने वाली स्त्रियाँ अबूझ और अलौकिक उदाहरण बना दी जाती हैं जिन्हें
जल्दी ही स्म्रतियों और स्मारकों में बदल दी जाती हैं.दरअसल ये स्त्रियाँ पुरुष
प्रवर्ती की पोषित और उसी से पोष्ट हैं.इसलिए इसका समुदाय दुर्भाग्य से ‘स्त्री का
नहीं,पुरुष का ही हैं,क्योंकि वे उसी की परिधि हैं’.पुरुष के रिफ्लेक्सं में हैं.घर,घराने
में और घराना श्रद्धा और परम्परा में बदल जाता हैं.राल्फ दल्फो एमर्सन का कथन हैं
कि ‘नारी
वह हैं जो अपने चारों ओर दर्द की बजाय ख़ुशी ब्खिरने की इच्छा से बदकर रूप रंग और
चरित्र को निखारने वाली कोई श्रंगार सामग्री संसार में नहीं हैं.’विशेषज्ञों की राय
और पुरुष प्रधान समाज की विचार धारा हैं कि’स्त्री
शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण वर्तमान में पंचायत विभाग में उच्च पड़ में
विराजमान होने पर भी ,उनके व्यवहारिक जीवन में निर्भीकता,दबंगता का अभाव स्पष्ट
दिखाई देता हैं.वह अपने गरिमा और पद के ठांचेमें अनुकूल महसूस नहीं कर रही हैं और
इसका प्रत्यक्ष प्रभाव विकास कार्यक्रमों पर पड़ता हैं और इसीलिए उनका अवांछित शोषण
होता हैं.शिक्षा के अनभिज्ञता ,दब्बूपन,कार्यक्षमता का अन्देखाप्न के अलावा एक ओर
अहम मुद्दा हैं.महिला पंचायत सदस्य का अपने जीवन के प्रति सकारात्मक द्रष्टि कोण नहीं रखना.ग्रामीण महिलाओं की
वास्तविकता को चरितार्थ करती कवि की यह पंक्तियाँ-‘गीली लकड़ी ,चूल्हा चौका.चिंता,बेलन और
धुआँ .भीगा अंजन,बजते कंगन,यह गोरा तन और धुआँ.मेंहदी रचे हाथों पर आजीवन बस यही
लिखा हैं.’
जारी हैं.......................